देखो, योगदर्शन के इन सूत्रों में ऋषि पतंजलि हमें आत्मा और संसार के गूढ़ रहस्यों को समझाते हैं। वे बताते हैं कि देखने वाला—द्रष्टा—शुद्ध चैतन्य स्वरूप है, जो मन के माध्यम से संसार को देखता है। यह जो दृश्य जगत है, इसका अस्तित्व केवल द्रष्टा के अनुभव के लिए ही है। जब किसी साधक ने अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लिया, तब उसके लिए यह दृश्य जगत समाप्त हो जाता है, परंतु दूसरों के लिए यह बना रहता है, क्योंकि वह सबके लिए सामान्य है। द्रष्टा और दृश्य का संयोग ही आत्मा की शक्ति और उसके स्वामी के वास्तविक स्वरूप की पहचान का कारण बनता है। लेकिन इस संयोग का मूल कारण अज्ञान है। जब अज्ञान समाप्त हो जाता है, तब यह संयोग भी समाप्त हो जाता है और द्रष्टा को मुक्ति प्राप्त होती है। इस मुक्ति के लिए अविचल विवेक—निरंतर भेदबुद्धि—ही उपाय है। जो साधक इस विवेक में स्थित हो जाता है, उसकी बुद्धि सात अवस्थाओं में पूर्णता को प्राप्त करती है। फिर ऋषि बताते हैं कि जब योग के अंगों का अभ्यास किया जाता है और अशुद्धियाँ नष्ट हो जाती हैं, तब ज्ञान का प्रकाश प्रकट होता है, जो विवेकज्ञान तक पहुँचता है। योग के आठ अंग हैं—यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। यम में अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह आते हैं। ये महाव्रत हैं, जिनका पालन जाति, स्थान, काल या परिस्थिति की परवाह किए बिना हर किसी को करना चाहिए। नियम में शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान हैं। जब मन में कोई अशुभ विचार उत्पन्न हो, तब उसके विपरीत शुभ विचारों का स्मरण करना चाहिए। हिंसा आदि कुविचार, चाहे वे स्वयं किए जाएँ, दूसरों से कराए जाएँ या अनुमोदित किए जाएँ, लोभ, क्रोध या मोह से उत्पन्न हों, और चाहे वे हल्के, मध्यम या तीव्र हों—वे अंतहीन दुःख और अज्ञान का कारण बनते हैं। इसलिए उनके विपरीत विचारों का अभ्यास करना चाहिए। जब साधक अहिंसा में स्थिर हो जाता है, तो उसके पास शत्रुता समाप्त हो जाती है। जब वह सत्य में स्थित हो जाता है, तो उसके वचन फलित होते हैं। अस्तेय में स्थित होने पर सब रत्न उसकी ओर आकर्षित होते हैं। ब्रह्मचर्य से उसे महान तेज प्राप्त होता है। अपरिग्रह में दृढ़ता से जन्म के कारण और प्रयोजन का ज्ञान होता है। शौच से अपने शरीर के प्रति विरक्ति और दूसरों के संसर्ग से बचाव उत्पन्न होता है। इससे मन की शुद्धि, प्रसन्नता, एकाग्रता, इंद्रियों पर नियंत्रण और आत्मदर्शन की योग्यता प्राप्त होती है। संतोष से परम आनंद की प्राप्ति होती है। तप से अशुद्धियाँ नष्ट होती हैं और शरीर तथा इंद्रियों की सिद्धि होती है। स्वाध्याय से अपने इष्ट देवता के साथ एकत्व की अनुभूति होती है। ईश्वरप्रणिधान से समाधि की सिद्धि प्राप्त होती है। आसन वह है, जिसमें स्थिरता और सुख की अनुभूति हो। यह प्रयत्न के शिथिल होने और अनंत में लीन होने से सिद्ध होता है। तब साधक द्वंद्वों से अप्रभावित रहता है। जब आसन सिद्ध हो जाता है, तब श्वास-प्रश्वास के प्रवाह का नियमन—प्राणायाम—किया जाता है। प्राणायाम के बाह्य, आभ्यंतर और स्तंभन रूपों को देश, काल और संख्या के अनुसार अभ्यास किया जाता है, जिससे वे दीर्घ और सूक्ष्म हो जाते हैं। चौथा प्रकार इन सब से परे है, जो बाह्य और आंतरिक वस्तुओं का अतिक्रमण करता है। तब ज्ञान के प्रकाश पर पड़ा आवरण हटने लगता है और मन ध्यान के योग्य बनता है। प्रत्याहार में इंद्रियाँ अपने-अपने विषयों में प्रवृत्त न होकर मन की गति का अनुकरण करने लगती हैं। तब साधक को इंद्रियों पर परम नियंत्रण प्राप्त हो जाता है। अब धारणा का वर्णन आता है—मन को एक स्थान पर बांधना ही धारणा है। जब उस बंधन में चित्त की वृत्तियाँ बिना रुके एक ही विषय की ओर प्रवाहित होती हैं, तो उसे ध्यान कहते हैं। और जब केवल वही विषय प्रकाशित रहता है, और साधक का अहंभाव विलीन हो जाता है, तब वह समाधि की अवस्था होती है। इन तीनों को जब एक ही बिंदु पर लगाया जाता है, तो उसे संयम कहा जाता है। इस प्रकार, पतंजलि के इन सूत्रों में योग के पथ की गहराई से व्याख्या की गई है, जिससे साधक आत्मा की स्वतंत्रता और परम ज्ञान की ओर अग्रसर होता है।