जब साधक योग के गहरे अभ्यास में स्थित हो जाता है, तब उसके भीतर के सभी क्लेश — दुःख, अशांति और कर्मों के संस्कार — शांत हो जाते हैं। अब मनुष्य के जीवन में जो भी कष्ट या कर्मजन्य बंधन थे, वे समाप्त हो जाते हैं। इस अवस्था में, साधक का ज्ञान अनंत हो जाता है। उसके चित्त से समस्त अशुद्धियाँ और आवरण हट जाते हैं। तब उसे प्रतीत होता है कि जानने योग्य वस्तु बहुत थोड़ी है, क्योंकि उसकी दृष्टि अब सर्वत्र व्याप्त ज्ञान को देख रही होती है। इसके परिणामस्वरूप, प्रकृति के गुण — सत्त्व, रज और तम — जिनका उद्देश्य साधक के अनुभव को पूर्ण करना था, वे अपना कार्य सिद्ध कर लेते हैं और उनके परिवर्तन की प्रक्रिया समाप्त हो जाती है। इन परिवर्तनों की एक स्पष्ट अनुक्रम होता है, जो क्षण-क्षण में होने वाले रूपांतरणों के रूप में देखा जा सकता है। जब यह अनुक्रम अपने अंतिम छोर पर पहुँचता है, तब सारे परिवर्तन थम जाते हैं। अंततः, यही मुक्ति है — जब प्रकृति के गुण अपने मूल में लौट जाते हैं, क्योंकि अब पुरुष (चेतना) के लिए उनका कोई प्रयोजन शेष नहीं रह जाता। या फिर, मुक्ति वह है जब चेतना अपने स्वभाव में, अपने स्वरूप में ही स्थित हो जाती है। यही योग का परम लक्ष्य है।