एक समय की बात है, जब योगी अपने मन की गहराइयों में उतरता है, उसे यह अनुभव होता है कि एक ही क्षण में दोनों—देखने वाला और देखा जाने वाला—संपूर्ण रूप से समझे नहीं जा सकते। यदि एक मन दूसरे मन को जानने का प्रयास करे, तो बुद्धियों की संख्या अत्यधिक बढ़ जाएगी और स्मृतियों में भ्रम उत्पन्न हो जाएगा। यह इसलिए है क्योंकि चेतना दोनों के बीच में प्रवाहित नहीं होती; जब चेतना किसी विशेष रूप को ग्रहण करती है, तब वह केवल अपने ही बुद्धि के अनुभव को जानती है। मन, जो देखने वाले और देखे जाने वाले दोनों से रंगा हुआ है, हर प्रकार के अनुभव करने में सक्षम होता है। यद्यपि मन अनगिनत संस्कारों से विविध रूपों में ढला हुआ है, फिर भी उसका कार्य किसी अन्य के लिए होता है, क्योंकि वह अनेक तत्वों का संयोग है। लेकिन जब कोई विवेकपूर्ण दृष्टि से देखता है, तब आत्मा के कल्पना करने की प्रवृत्ति समाप्त हो जाती है। उस स्थिति में मन पूरी तरह विवेक की ओर झुक जाता है और मुक्ति की ओर आकर्षित होता है। फिर भी, इस यात्रा के दौरान, मन के भीतर छिपी हुई प्रवृत्तियों के कारण नए संस्कारों का उदय होता रहता है। इन संस्कारों की निवृत्ति भी उसी प्रकार बताई गई है जैसे क्लेशों की निवृत्ति। जब साधक पूर्ण रूप से विवेकज्ञान से भी निर्लिप्त हो जाता है, तब उसके भीतर ‘धर्ममेघ समाधि’ का उदय होता है। इस समाधि से क्लेश और कर्मों का पूर्ण रूप से अंत हो जाता है। अब, जब ज्ञान अनंत हो जाता है और सब अशुद्धियाँ तथा आवरण दूर हो जाते हैं, तब जानने योग्य वस्तु बहुत ही कम रह जाती है। उस अवस्था में, गुणों के परिवर्तनों की श्रृंखला—जो अपने उद्देश्य को पूर्ण कर चुकी है—समाप्त हो जाती है। यह क्रम उन क्षणों की पहचान है, जिसमें परिवर्तन होता है और अंत आ जाता है। अंततः, मुक्ति का अर्थ है—गुणों का अपने स्रोत में लौट जाना, जब पुरुष के लिए उनका कोई प्रयोजन नहीं रह जाता, या फिर चेतना का अपने ही स्वरूप में स्थित हो जाना। यही योग का परम लक्ष्य है।