योगसूत्र के इन श्लोकों में एक अद्भुत यात्रा का वर्णन है, जिसमें साधक की चेतना की गहराइयों से लेकर सिद्धि और कैवल्य की परम अवस्था तक के अनुभवों को विस्तार से बताया गया है। सबसे पहले, योग में अनुभव का जन्म इसलिए होता है क्योंकि शुद्ध चेतना—जो पुरुष कहलाती है—और सत्त्व—जो बुद्धि का अत्यंत शुद्ध रूप है—इन दोनों में भेद न कर पाने की अज्ञानता बनी रहती है, जबकि ये दोनों पूर्णतः भिन्न हैं। जब साधक अपने स्वार्थ या स्वभाव पर संयम करता है, तो उसे पुरुष का ज्ञान प्राप्त होता है। इस पुरुष के ज्ञान से साधक में सहज श्रवण, स्पर्श, दृष्टि, स्वाद और गंध जैसी अंतर्दृष्टियाँ उत्पन्न होती हैं। ये अद्भुत शक्तियाँ बाह्य रूप से तो सामर्थ्य हैं, परंतु समाधि की दिशा में ये बाधाएँ बन जाती हैं। यदि साधक अपने बंधन के कारण को शिथिल कर देता है और चित्त की गति को जान लेता है, तो वह दूसरे के शरीर में प्रवेश करने में भी समर्थ हो जाता है। इसी प्रकार, उदान वायु पर सिद्धि प्राप्त करने से साधक जल, कीचड़, काँटों आदि का स्पर्श नहीं करता और ऊपर उठने की शक्ति पा लेता है। समान वायु पर संयम करने से शरीर में अग्नि प्रज्वलित करने की क्षमता आती है। जब साधक कर्ण और आकाश के संबंध पर संयम करता है, तो दिव्य श्रवण शक्ति प्राप्त करता है। इसी तरह, शरीर और आकाश के संबंध तथा कपास की भाँति हल्केपन पर संयम करने से वह आकाश में गमन कर सकता है। जब साधक बाह्य, असंस्कृत प्रक्रिया—जिसे महाविदेहता कहा जाता है—को प्राप्त कर लेता है, तब प्रकाश का जो आवरण है, वह नष्ट हो जाता है। स्थूलता, स्वभाव, सूक्ष्मता, संयोग और प्रयोजन पर संयम करने से वह महाभूतों पर अधिकार पा लेता है। इससे वह सूक्ष्म, विशाल, भारी, लघु आदि रूप धारण कर सकता है, शरीर में सिद्धि प्राप्त करता है, और भूतों के गुणों से अप्रभावित रहता है। शरीर की सिद्धियों में सौंदर्य, आकर्षण, बल और वज्र-समान कठोरता आती है। जब साधक ज्ञानेंद्रियों की प्रक्रिया, स्वभाव, अहंकार, संयोग और प्रयोजन पर संयम करता है, तो इंद्रियों पर भी उसका पूर्ण अधिकार हो जाता है। इससे मन की गति तीव्र हो जाती है, इंद्रियों से स्वतंत्रता मिलती है और प्रकृति पर भी नियंत्रण आ जाता है। जो साधक सत्त्व और पुरुष के अंतर को जान लेता है, वह सभी अवस्थाओं का स्वामी और सर्वज्ञ हो जाता है। परंतु यदि वह इन सिद्धियों में भी वैराग्य रखे और अशुद्धियों के बीज नष्ट कर दे, तो कैवल्य अर्थात् पूर्ण मुक्ति प्राप्त करता है। यदि उच्च लोकों के देवता या सिद्ध पुरुष साधक को आमंत्रित करें, तो उसे आसक्ति या अभिमान नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे अनिष्ट की संभावना रहती है। क्षण और उसके क्रम पर संयम करने से विवेकजन्य ज्ञान उत्पन्न होता है। जाति, लक्षण और देश में भेद न होने पर भी विवेक से साधक को समान वस्तुओं में भी अंतर का ज्ञान हो जाता है। यह विवेकजन्य ज्ञान ही वह ज्ञान है, जो सबसे ऊँचा, सर्वज्ञ, मुक्तिदायक और क्रमातीत है। अंत में, जब सत्त्व और पुरुष की पूर्ण समानता और पवित्रता हो जाती है, तब कैवल्य की अवस्था आती है। सिद्धियाँ जन्म, औषधि, मंत्र, तप या समाधि के द्वारा प्राप्त होती हैं। प्रकृति की वृद्धि के कारण एक योनि से दूसरी योनि में परिवर्तन होता है। जैसे किसान केवल बाधा हटाता है, वैसे ही कारण केवल रूपांतरण का निमित्त है, असली परिवर्तन तो बाधाओं के हटने से होता है। चित्त की उत्पत्ति केवल अहंकार से होती है। अनेक चित्तों में भी एक प्रधान चित्त ही प्रेरक होता है। ध्यान से उत्पन्न चित्त संस्काररहित होता है। योगियों का कर्म न तो शुभ होता है, न अशुभ; जबकि अन्य लोगों का कर्म तीन प्रकार का होता है। केवल उसी कर्म के संस्कार फलित होते हैं, जो उसके अनुरूप होते हैं। स्मृति और संस्कार एक ही प्रकार के होने से, जन्म, स्थान या काल से अलग हुए लोगों में भी उनका क्रम बना रहता है। इनका आदि नहीं है, क्योंकि वासना अनादि है। कारण, फल, आश्रय और विषय के सहारे ये संस्कार टिके रहते हैं; जब ये नहीं रहते, तो संस्कार भी नष्ट हो जाते हैं। भूत, भविष्य अपने-अपने रूप में विद्यमान रहते हैं, क्योंकि गुणों के मार्ग भिन्न-भिन्न हैं। वे प्रकट या सूक्ष्म, दोनों रूपों में गुणस्वरूप ही होते हैं। एक ही रूपांतरण से वस्तु की वास्तविकता सिद्ध होती है। मन भिन्न-भिन्न होने से, एक ही वस्तु के दो दर्शकों के अनुभव भी भिन्न होते हैं। वस्तु केवल एक मन पर निर्भर नहीं है; यदि उसका कोई प्रमाण न हो, तो वह क्या होगी? वस्तु मन के रंग से जानी या अनजानी होती है। चित्त के सभी वृत्तियाँ उसके स्वामी पुरुष के लिए सदा जानी जाती हैं, क्योंकि पुरुष अपरिवर्तनीय है। चित्त स्वयं को प्रकाशित नहीं कर सकता, क्योंकि वह स्वयं देखे जाने योग्य वस्तु है। इस प्रकार, योग की साधना में साधक अनुभव, सिद्धि, विवेक और अंत में कैवल्य की परम अवस्था को प्राप्त करता है।