सब कुछ भोग लिया गया है, ऐसा कुछ भी नहीं बचा जो मैंने न देखा हो, न किया हो, न भोगा हो—चाहे वह दृश्य सुखद हो या दुःखद। अब जो कुछ जानने योग्य था, वह सब जान लिया गया है; जो कुछ देखने योग्य था, वह सब देख लिया गया है—वह भी बिना किसी हानि के। दीर्घकाल तक थक जाने के बाद मुझे विश्राम मिला है और मेरे भीतर की सारी मोह-माया दूर हो गई है। अब, हे प्रिय, उठो। चलो, उस शरीर को देखें जो मंदार पर्वत पर पड़ा है, जो अब सूखी हुई लता के समान निर्जीव हो गया है। यहां अब मुझे न तो कुछ चाहिए, न ही किसी वस्तु से कोई परहेज है; मैं बस भाग्य के खेल को देखता हुआ विचरण करता हूं। भला मैं क्यों उन बातों के पीछे भागूं जिन्हें सज्जन लोग श्रेष्ठ मानते हैं, जब मेरा मन एकत्व में स्थित हो चुका है? मेरे मन में जो भी मत या विचार हैं, वे जैसे हैं वैसे ही रहें; मैं तो केवल सहज स्वभाव में ही रहता हूं। फिर वे दोनों धीरे-धीरे आकाश में ऊपर उठे और बादलों के बीच से होते हुए सिद्ध मार्ग द्वारा मंदार, उस स्वर्णिम गुफाओं वाले पर्वत तक पहुंच गए। उस पर्वत की तलहटी में, भृगु ने एक सूखे हुए शरीर को देखा, जो गीली पत्तियों से ढका हुआ था—वह शरीर पिछले जन्म से उत्पन्न हुआ था। भृगु ने कहा, ‘‘हे प्रिय, यह वही पतला शरीर है जिसे तुमने कभी सुख-संपत्ति से पाला था। यह वही मदमस्त शरीर है जिसके लिए मेरु के उद्यानों में मंदार पुष्पों के ढेर से शीतल शय्या बनाई जाती थी। यह वही शरीर है, जिसे कभी दिव्य स्त्रियों के समूह ने दुलारा था; अब वही शरीर भूमि पर पड़ा है और रेंगने वाले जीवों के मुंह से दबा हुआ है। इसी शरीर के साथ मैं नंदन कानन के उपवनों में क्रीड़ा करता था; अब यह एक सूखी हड्डियों का ढांचा बन गया है।’’ ‘‘स्वर्गीय स्त्रियों के अंग-स्पर्श से, जब मन परम सुख में डूबा रहता था, अब उन विचारों के अभाव में यही शरीर यहां सूख गया है। हे शरीर, उन विविध भोगों और अवस्थाओं में, जब तुमने स्वयं को उन विचारों से बांध रखा था, अब तुम कैसे शांत हो गए हो? हाय, हे शरीर, अब तुम कहां गिर पड़े हो—वैराग्य की इस सूखी दशा में? अब तो तुम केवल एक कंकाल रह गए हो और मुझे सोचने पर मजबूर करते हो।’’ ‘‘इसी शरीर से कभी मैं सुखों में रमा रहता था; अब, जब यह कंकाल बन गया है, तो इससे मुझे भय लगता है। कभी मेरे वक्षस्थल को तारों के गुच्छे जैसे हार से सजाया जाता था; अब देखो, वहां चींटियां बिल बना रही हैं। मेरे शरीर की स्वर्ण-सी आभा कभी सुंदर स्त्रियों को आकर्षित करती थी; अब वही शरीर हड्डियों का ढांचा बनकर उपहास का कारण बन गया है।’’ ‘‘देखो, मेरा मुंह खुला है, तपस्या की गर्मी से त्वचा सूख गई है, और वन्य पशु मेरे इस भयंकर मुख वाले कंकाल को देखकर डरते हैं। अत्यधिक सूखेपन के कारण, मेरे शव की पेट की गुफा सूर्य-किरणों से प्रकाशित सी प्रतीत होती है, जैसे वह विवेक का प्रकाश हो। मेरा शरीर, जो अब वन में पीठ के बल पड़ा है, अपनी शून्यता से देखने वालों में वैराग्य उत्पन्न करता है, जैसे वह आकाश में लटका हो।’’ ‘‘ध्वनि, रूप, रस, स्पर्श और गंध—इनकी तृष्णा से मुक्त होकर मेरा शरीर पर्वत पर अडोल समाधि में स्थित है। जब मन रूपी पिशाच शांत हो जाता है, तो शरीर को ऐसा आनंद मिलता है जो समस्त पृथ्वी के राज्य से भी प्राप्त नहीं हो सकता। देखो, मैं पूर्ण विश्राम में हूं, जिज्ञासा समाप्त हो गई है; शरीर कल्पनाओं के जाल से मुक्त होकर सुखपूर्वक पड़ा है।’’ ‘‘यह शरीर रूपी वृक्ष, चंचल बंदर जैसे मन से विक्षुब्ध होकर, इतनी तीव्र गति से हिलता है कि अपनी ही जड़ों को काट डालता है। जब मन की दुर्भाग्य से मुक्ति मिल जाती है, तो शरीर हाथी, मेघ या सिंह जैसी उलझनों में नहीं पड़ता; वह परम आनंद में स्थित रहता है। मनशून्यता की अवस्था को छोड़कर—जो शरद् ऋतु के सूर्य के समान तृष्णा और मोह के कुहासे को दूर करती है—जीवों के लिए और कोई कल्याण नहीं है।’’ ‘‘जो महात्मा, शांतचित्त होकर मनशून्यता को प्राप्त कर लेते हैं, वे ही वास्तव में परम सुख और परम भोग की पराकाष्ठा को प्राप्त करते हैं। सौभाग्य से, मैं इस शरीर को वन में देख रहा हूं, जो समस्त दुःख की अवस्थाओं से मुक्त, पूर्णतः शांत, ज्वररहित और मनशून्य अवस्था में है।’’ ‘‘हे धर्मज्ञ प्रभु, उन दिनों भृगु द्वारा अनेक शरीरों का बार-बार भोग किया गया था। हे मुनिवर, उस शरीर में, जो भृगु से उत्पन्न हुआ था, भृगु के लिए कौन-सा महान आश्चर्य या शोक हुआ?’’ ‘‘हे राम, शुक्र का वह सूक्ष्म तत्व, जीवन की अवस्था को प्राप्त कर, क्रिया के रूप में प्रकट हुआ और भृगु से भृगव स्वरूप में उत्पन्न हुआ। वह तत्व, पहले परम अवस्था से एकीकृत होकर, आकाश तत्व की दशा को प्राप्त हुआ और वायु से प्रेरित होकर, प्राण और अपान के प्रवाह के द्वारा भृगु के हृदय में प्रविष्ट हुआ। वहां धीरे-धीरे शक्ति प्राप्त कर उसने उशना (शुक्र) का शरीर धारण किया।’’ ‘‘ब्राह्मण के संस्कारों से सम्पन्न होकर, वह अपने पिता की संतानों में श्रेष्ठ बनी और कालक्रम में वह भी सूखे कंकाल की अवस्था को प्राप्त हो गई। जब उस ब्राह्मण शरीर का अंत हुआ, तब शुक्र ने उसके लिए शोक किया। यद्यपि वह राग-द्वेष से रहित, शांत और ब्राह्मण-सदृश स्वरूप में स्थित था, फिर भी शुक्र ने अपने ही शरीर के लिए शोक किया; क्योंकि यह देहधारियों का स्वाभाविक धर्म है।’’ ‘‘किन्तु, उस शोक के प्रदर्शन द्वारा, उसने विवेकीजनों के लिए देह और देही का भेद स्पष्ट किया, जिससे वैराग्य की स्थापना हो सके। यही शरीर का क्रम है—चाहे वह ज्ञानी हो या अज्ञानी—जब तक प्राण है। जैसे संसार में कोई व्यक्ति अपनी सामर्थ्य या असमर्थता के अनुसार ही व्यवहार करता है। जो तत्व को जानते हैं और जो अज्ञानी जन पशुओं के समान व्यवहार करते हैं, वे दोनों ही संसार के व्यवहार में जाल में फंसे कमलों के समान रहते हैं।’’ ‘‘जैसे अज्ञानी व्यक्ति आचरण करता है, वैसे ही ज्ञानी भी करता है; यहां केवल प्रवृत्तियों का अंतर ही बंधन या मुक्ति का कारण बनता है।