एक बार एक महान ज्ञानी ने गहन विचार किया: “किसके चले जाने पर मैं भी चला जाऊँगा? किसमें टिके रहने पर मैं स्थिर रहूँगा?” इस गहरे चिंतन के बाद उसने जीवन शक्ति की रचना की। जीवन शक्ति से श्रद्धा उत्पन्न हुई, फिर आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, इंद्रियाँ और मन की उत्पत्ति हुई। इसके बाद भोजन बना, भोजन से वीर्य, तप, वेदों के मंत्र, कर्म, लोकों और उन लोकों में नामों की रचना हुई। जैसे बहती हुई नदियाँ समुद्र की ओर जाती हैं और समुद्र में पहुँचकर उनका नाम और रूप मिट जाता है, केवल समुद्र ही रह जाता है—वैसे ही ये सोलह विभाग, जो व्यक्ति की ओर अग्रसर हैं, उसमें पहुँचकर विलीन हो जाते हैं। उनके नाम और रूप समाप्त हो जाते हैं, केवल व्यक्ति ही शेष रह जाता है। तब वह व्यक्ति निर्भाग और अमर हो जाता है। इस विषय में एक उपदेश है: जैसे पहिए की धुरी में उसकी तीलियाँ जुड़ी होती हैं, वैसे ही ये सभी विभाग उस व्यक्ति में स्थित हैं। उस व्यक्ति को जानो, ताकि मृत्यु तुम्हें परेशान न करे। फिर उस ज्ञानी ने शिष्यों से कहा: “मैं इस परम ब्रह्म को यहीं तक जानता हूँ; इससे ऊपर कुछ नहीं है।” शिष्यगण श्रद्धा से उसे प्रणाम करते हुए बोले: “आप ही हमारे पिता हैं, जिन्होंने हमें अज्ञान से पार कर परम सत्य तक पहुँचाया। महान ऋषियों को नमस्कार, महान ऋषियों को नमस्कार।