एक समय की बात है, जब एक जिज्ञासु ब्राह्मण ने अपने कर्मों द्वारा प्राप्त संसारों का गहन निरीक्षण किया। उसने देखा कि कर्मों से जो भी फल मिलता है, वह सब नश्वर है—क्योंकि कोई भी ऐसा अमर, अजन्मा तत्व कर्मों से प्राप्त नहीं होता। यह जानकर उसके मन में वैराग्य उत्पन्न हुआ। वह समझ गया कि जिसे जानना वास्तव में आवश्यक है, उस परम सत्य को कोई सामान्य उपाय नहीं दे सकता। तब वह श्रद्धा और विनम्रता के साथ, हाथ में समिधा लेकर, उस गुरु के पास गया जो वेदों का ज्ञाता था, और स्वयं ब्रह्म में स्थित था। जब वह शिष्य सही रीति से गुरु के पास पहुँचा, उसका मन शांत, संयमित और एकाग्र था, तब वह ज्ञानी गुरु उसे ब्रह्म का सच्चा ज्ञान बताता है—वह ज्ञान जिससे उस अविनाशी, सत्य पुरुष को जाना जा सकता है। गुरु ने कहा—हे सौम्य! यह सत्य है, ठीक वैसे ही जैसे एक प्रज्वलित अग्नि से असंख्य चिंगारियाँ निकलती हैं, वैसे ही उस अविनाशी से अनेक जीव प्रकट होते हैं और अंत में उसी में विलीन हो जाते हैं। वह दिव्य, निराकार पुरुष सर्वत्र है—अंदर भी, बाहर भी; वह अजन्मा है, प्राण और मन से रहित, पूर्णतः पवित्र, अविनाशी से भी परे, सबसे उच्च है। उसी से प्राण, मन, सभी इंद्रियाँ, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी—यह सम्पूर्ण जगत का आधार—प्रकट होते हैं। उसके लिए अग्नि सिर है, सूर्य और चंद्रमा उसकी आँखें, दिशाएँ उसके कान, वाणी और वेद उसके मुख, वायु उसका प्राण, जगत उसका हृदय, और पृथ्वी उसके चरण हैं—वही समस्त प्राणियों में अंतर्यामी है। उसी से वह अग्नि उत्पन्न होती है जिसका इंधन सूर्य है; चंद्रमा से वर्षा होती है; वर्षा से पृथ्वी पर वनस्पतियाँ उगती हैं। पुरुष नारी में बीज का सिंचन करता है और उसी पुरुष से अनेकों जीव उत्पन्न होते हैं। उसी से ऋक्, साम और यजुर्वेद, दीक्षा, यज्ञ, अनुष्ठान, हवि, वर्ष, यजमान, वे लोक उत्पन्न होते हैं जहाँ चंद्रमा शुद्ध होता है और सूर्य चमकता है। उसी से अनेक रूपों में देवता, साध्य, मनुष्य, पशु, पक्षी, प्राण और अपान, धान्य, तप, श्रद्धा, सत्य, ब्रह्मचर्य और धर्म उत्पन्न होते हैं। उसी से सात प्राण, सात ज्वालाएँ, सात हवियाँ, सात लोक उत्पन्न होते हैं—सभी प्राण, गुफा में छिपे हुए, सात-सात के समूह में स्थित हैं। उसी से सभी समुद्र और पर्वत प्रवाहित होते हैं; सभी नदियाँ, विविध रूपों में, उसी से निकलती हैं; सभी वनस्पतियाँ और उनका सार उसी से उत्पन्न होता है—वही अंतर्यामी प्राणियों के भीतर स्थित है। संपूर्ण जगत—कर्म, तप, ब्रह्म, परम अमृत—सब वही पुरुष है। जो इसे जानता है, वह हृदय की अज्ञानग्रंथि को चीर देता है, हे सौम्य! यह जो महान, प्रकट, गुफा में स्थित, परम निवास है—यह यहीं प्रस्तुत है। वही चलता है, साँस लेता है, पलक झपकता है—इसे जानो, जो सत् और असत् दोनों है, प्राणियों में सर्वोत्तम ज्ञान यही है। जो तेजस्वी, अत्यंत सूक्ष्म है, जिसमें यह सारा जगत और उसके निवासी स्थित हैं—वही अविनाशी ब्रह्म है, वही प्राण, वाणी, मन, सत्य, अमरता है—हे सौम्य, उसी को जानो। उपनिषद को महान धनुष मानो, मनन की तीक्ष्ण बाण को उस पर रखो, और मन को उसी में एकाग्र करके अविनाशी को लक्ष्य मानो, हे सौम्य! ओम् वह धनुष है, आत्मा बाण है, ब्रह्म लक्ष्य है—अविचलित चित्त से उसे भेदो और उसी में एकरूप हो जाओ, जैसे बाण लक्ष्य में विलीन हो जाता है। जिस आत्मा में स्वर्ग, पृथ्वी और अंतरिक्ष, मन और प्राण—all कुछ गुँथे हैं, उसी आत्मा को जानो, और अन्य सभी शब्दों को त्याग दो—यही अमरता का सेतु है। जैसे चक्के की नालियाँ धुरी में जुड़ी होती हैं, वैसे ही सब नाड़ियाँ उस एक में मिलती हैं; वही भीतर चलता है, अनेक रूपों में प्रकट होता है। आत्मा का ध्यान ओम् के रूप में करो—तुम अंधकार से पार हो जाओगे। जो सर्वज्ञ है, सब कुछ जानता है, जिसकी महिमा पृथ्वी पर प्रकट है—वह आत्मा ब्रह्मपुरी के दिव्य नगर में, परम आकाश में स्थित है। मन से बना, प्राणों का नेता, अन्न में स्थित, हृदय में उसका निवास है—जो उसे जानता है, वे ज्ञानी उस आनंदमय, अमर रूप को देखते हैं, जो प्रकाशमान है। जब वह परम—ऊपर और नीचे दोनों—देख लिया जाता है, तब हृदय की गाँठ खुल जाती है, सभी संदेह कट जाते हैं, और उसके कर्म नष्ट हो जाते हैं। उस उच्चतम स्वर्णमय आवरण में ब्रह्म स्थित है—शुद्ध, कलंक रहित, अविभाज्य; वही प्रकाश का प्रकाश है, जिसे आत्मज्ञानी देखते हैं। वहाँ न सूर्य चमकता है, न चंद्रमा, न तारे, न बिजली, न अग्नि—वह स्वयं ही सबको प्रकाशित करता है; उसी के प्रकाश से सब जगत प्रकाशित होता है। ब्रह्म ही यह अमर है, आगे भी, पीछे भी, दाएँ-बाएँ, ऊपर-नीचे—संपूर्ण जगत में वही ब्रह्म व्याप्त है। अब गुरु ने एक सुंदर उपमा दी—दो पक्षी, जो अभिन्न मित्र हैं, एक ही वृक्ष पर बैठे हैं। उनमें से एक मीठे फल का स्वाद लेता है, दूसरा केवल देखता है, स्वयं नहीं खाता। उसी वृक्ष पर जीवात्मा अज्ञान में डूबा रहता है, शोक करता है और भ्रमित होता है। लेकिन जब वह दूसरे, ईश्वर को और उसकी महिमा को देखता है, तो वह शोक से मुक्त हो जाता है। जब ज्ञानी उस स्वर्णमय स्रष्टा, प्रभु, पुरुष, ब्रह्म का मूल देखता है, तब वह पुण्य और पाप दोनों से ऊपर उठकर निर्मल हो जाता है और परम समता को प्राप्त करता है। वही प्राण है, जो सब प्राणियों में चमकता है। जिसे यह ज्ञात हो जाता है, वह विवाद नहीं करता, आत्मा में ही रमण करता है, आत्मा में ही आनंदित रहता है, और कर्म करता हुआ भी—वह ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ होता है। यह आत्मा सत्य, तप, सही ज्ञान और निरंतर ब्रह्मचर्य से प्राप्त होती है। जब अंतःकरण शुद्ध और प्रकाशमय हो जाता है, तब तपस्वी उसे अपने भीतर देखते हैं। सत्य की ही विजय होती है, असत्य की नहीं। सत्य से ही देवयान मार्ग बनता है, जिस पर चलकर वे ऋषि, जिनकी सभी इच्छाएँ पूर्ण हो चुकी हैं, उस परम सत्य के खजाने तक पहुँचते हैं। वह विशाल, दिव्य, अकल्पनीय स्वरूप है; सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर, वह चमकता है। वह दूर से भी दूर है, और यहीं, हृदय की गुफा में निकट भी है। न तो आँख से, न वाणी से, न अन्य इंद्रियों से, न तप से, न कर्म से उसे जाना जा सकता है। जब मन ज्ञान से शुद्ध होता है, तब ध्यान द्वारा उस अविभाज्य सत्ता को देखा जाता है। यह सूक्ष्म आत्मा मन द्वारा ही जानी जाती है, जिसमें प्राण पाँच रूपों में स्थित है। सभी प्राणियों के मन उसी में गुँथे हैं; जब वह शुद्ध हो जाता है, तब वही आत्मा प्रकाशित होती है। जिस शुद्धचित्त व्यक्ति का मन जिस लोक की, जिस इच्छा की कामना करता है, वह उसे प्राप्त कर लेता है। इसलिए जो समृद्धि चाहता है, वह आत्मज्ञानी की उपासना करे। जो उस ब्रह्म के परम धाम को जानता है, जिसमें सारा जगत स्थित है, जो प्रकाशमय और शुद्ध है—वे ज्ञानी, जो पुरुष की निःस्वार्थ उपासना करते हैं, वे इस शुद्ध लोक से भी आगे बढ़ जाते हैं। जो स्वयं को कर्ता मानकर, इच्छाओं की ओर आकर्षित होता है, वह उन्हीं इच्छाओं के साथ बार-बार जन्म लेता है; लेकिन जिसका मन तृप्त है, आत्मा में स्थित है, उसकी सभी इच्छाएँ यहीं नष्ट हो जाती हैं। यह आत्मा न तो उपदेश से, न बुद्धि से, न बहुत सुनने से प्राप्त होती है; केवल वही इसे प्राप्त करता है, जिसे आत्मा स्वयं चुनता है—उसके लिए आत्मा अपना स्वरूप प्रकट करती है। यह आत्मा न तो दुर्बलता से, न प्रमाद से, न अनुचित तप से प्राप्त होती है; पर जो ज्ञानयुक्त पुरुष प्रयत्न करता है, उसके लिए यह आत्मा ब्रह्मधाम में प्रविष्ट हो जाती है। इसे प्राप्त कर वे ऋषि, ज्ञान में तृप्त, आत्मसंयमी, रागरहित, शांत—वे ज्ञानी, सर्वव्यापी में एकाकार होकर, सब में समाहित हो जाते हैं। वे तपस्वी, जिनका मन शुद्ध है, जो वेदांत के ज्ञान में स्थित हैं, त्याग के अनुशासन से—अपने समय के अंत में, ब्रह्मलोक में, पूर्णतः मुक्त और अमर हो जाते हैं। जब पंद्रह कलाएँ और सभी देवता, उनके अधिष्ठाता देवताओं सहित, लीन हो जाते हैं, तब सभी कर्म और विज्ञानमय आत्मा उस परम, अविनाशी में एक हो जाते हैं। इस प्रकार, उपनिषद् की यह कथा हमें सिखाती है कि सत्य, ब्रह्मज्ञान, और आत्मसाक्षात्कार ही परम लक्ष्य हैं—और वह केवल गुरु के मार्गदर्शन, तप, सत्य और शुद्धता से ही प्राप्त होता है। अंत में, सब कुछ उसी एक में विलीन हो जाता है—यही अमरता का सेतु है।