आइए, मैं आपको छांदोग्य उपनिषद् के इन दिव्य उपदेशों की एक सुंदर और सहज कथा सुनाता हूँ। सत्यकाम ने अपने गुरु, महात्मा सनत्कुमार से ब्रह्मविद्या का ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा प्रकट की। सनत्कुमार ने उसे बताया कि संकल्प से भी श्रेष्ठ है — "विज्ञान" या जागरूकता। जब मनुष्य जागरूक होता है, तभी संकल्प करता है, फिर विचार करता है, फिर वाणी बोलता है, फिर नाम लेता है, और नाम में ही समस्त मन्त्र एक हो जाते हैं; मन्त्रों में सभी कर्म समाहित हैं। इस प्रकार, सबका मूल विज्ञान में ही है, सब विज्ञान से ही उत्पन्न होते हैं, विज्ञान में ही स्थित रहते हैं। यदि कोई बहुत जागरूक है, परंतु ज्ञान नहीं रखता, तो लोग कहते हैं कि वह उपस्थित नहीं है। और यदि ज्ञान है, पर जागरूकता कम है, तो लोग उतना ही उसका ध्यान रखते हैं, जितनी उसकी जागरूकता है। इसीलिए विज्ञान ही सबका आधार है, विज्ञान ही आत्मा है, विज्ञान ही सबका आश्रय है। इसलिए विज्ञान का ध्यान करो। जो विज्ञान को ब्रह्म स्वरूप मानकर ध्यान करता है, वह उन लोकों को प्राप्त करता है जो अडिग और स्थिर हैं, और स्वयं भी अडिग और अचल हो जाता है। जहाँ तक उसकी विज्ञान की पहुँच है, वहाँ तक वह अपनी इच्छा से जा सकता है। फिर जिज्ञासु शिष्य पूछता है, "भगवन्, क्या विज्ञान से भी श्रेष्ठ कुछ है?" गुरु कहते हैं, "हाँ, विज्ञान से भी श्रेष्ठ कुछ है," और शिष्य विनती करता है, "कृपया मुझे वह बताइए।" गुरु समझाते हैं कि "ध्यान" विज्ञान से भी श्रेष्ठ है। पृथ्वी, आकाश, जल, पर्वत, देवता, मनुष्य — सब ध्यान करते प्रतीत होते हैं। मनुष्यों में भी जो महान बनते हैं, वे ध्यान के द्वारा ही बनते हैं; जो छोटे, कलहप्रिय, निंदा करने वाले और अधिक बोलने वाले होते हैं, वे ध्यान से रहित होते हैं; जो शक्तिशाली होते हैं, वे ध्यान के कारण होते हैं। इसलिए ध्यान का ध्यान करो। जो ध्यान को ब्रह्म मानकर ध्यान करता है, जहाँ तक ध्यान की पहुँच है, वहाँ तक वह अपनी इच्छा से जा सकता है। फिर वह पूछता है, "भगवन्, ध्यान से भी श्रेष्ठ कुछ है?" गुरु उत्तर देते हैं, "हाँ, ध्यान से भी श्रेष्ठ कुछ है," और शिष्य फिर विनती करता है। गुरु आगे बताते हैं, "बुद्धि" ध्यान से भी श्रेष्ठ है। बुद्धि के द्वारा ही ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास, पुराण, वेदों का वेद, पितरों के कर्म, देवताओं के संग्रह, धन, वाणी, एकता, देवज्ञान, ब्रह्मज्ञान, प्राणियों का ज्ञान, राजाओं का ज्ञान, तारों, सर्पों, दिव्य प्राणियों, स्वर्ग, पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी, घास, वृक्ष, जंगली पशु, कीट, पतंग, चींटी, धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य, शुभ-अशुभ, रुचिकर-अरुचिकर, भोजन और उसका स्वाद, यह लोक और परलोक — सब बुद्धि से ही जाना जाता है। इसलिए बुद्धि का ध्यान करो। जो बुद्धि को ब्रह्म मानकर ध्यान करता है, वह बुद्धिमानों के लोक को प्राप्त करता है, मूर्खों के लोक को नहीं। जहाँ तक बुद्धि की पहुँच है, वहाँ तक वह अपनी इच्छा से जा सकता है। फिर शिष्य पूछता है, "भगवन्, क्या बुद्धि से भी श्रेष्ठ कुछ है?" गुरु कहते हैं, "हाँ, बुद्धि से भी श्रेष्ठ कुछ है," और शिष्य फिर निवेदन करता है। गुरु आगे बताते हैं कि "बल" बुद्धि से भी श्रेष्ठ है। सौ बुद्धिमान मिलकर भी एक बलवान को विचलित नहीं कर सकते। बल के रहते ही मनुष्य उठता है, चलता है, पहुँचता है, बैठता है, देखता है, सुनता है, विचार करता है, जानता है, कार्य करता है, समझता है। पृथ्वी, आकाश, पर्वत, देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी, घास, वृक्ष, जंगली पशु, कीट, पतंग, चींटी — सब बल से ही स्थिर हैं। संसार भी बल से ही स्थिर है। इसलिए बल का ध्यान करो। जो बल को ब्रह्म मानकर ध्यान करता है, जहाँ तक बल की पहुँच है, वहाँ तक वह अपनी इच्छा से जा सकता है। फिर वह पूछता है, "भगवन्, क्या बल से भी श्रेष्ठ कुछ है?" गुरु कहते हैं, "हाँ, बल से भी श्रेष्ठ कुछ है," और शिष्य फिर निवेदन करता है। गुरु कहते हैं, "अन्न" बल से भी श्रेष्ठ है। यदि कोई दस रात तक भोजन न करे, लेकिन जीवित रहे, तो भी वह देख सकता है, सुन सकता है, सोच सकता है, जान सकता है, कर सकता है, समझ सकता है; परंतु जब भोजन करता है, तो वह सब कुछ भोजन के लिए ही करता है। इसलिए अन्न का ध्यान करो। जो अन्न को ब्रह्म मानकर ध्यान करता है, वह अन्न और पेय से सम्पन्न लोकों को प्राप्त करता है; जहाँ भी अन्न है, वहाँ अपनी इच्छा से जा सकता है। फिर शिष्य पूछता है, "भगवन्, क्या अन्न से भी श्रेष्ठ कुछ है?" गुरु कहते हैं, "हाँ, अन्न से भी श्रेष्ठ कुछ है," और शिष्य फिर निवेदन करता है। गुरु कहते हैं, "जल" अन्न से भी श्रेष्ठ है। जब वर्षा नहीं होती, तो प्राणी दुखी हो जाते हैं, सोचते हैं कि अन्न की कमी होगी; जब अच्छी वर्षा होती है, तो सब प्रसन्न होते हैं, सोचते हैं कि अन्न बहुत होगा। पृथ्वी, आकाश, स्वर्ग, पर्वत, देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी, घास, वृक्ष, जंगली पशु, कीट, पतंग, चींटी — सब जल के ही रूप हैं। इसलिए जल का ध्यान करो। जो जल को ब्रह्म मानकर ध्यान करता है, वह सभी इच्छाओं को प्राप्त करता है, तृप्त रहता है; जहाँ जल है, वहाँ अपनी इच्छा से जा सकता है। फिर शिष्य पूछता है, "भगवन्, क्या जल से भी श्रेष्ठ कुछ है?" गुरु कहते हैं, "हाँ, जल से भी श्रेष्ठ कुछ है," और शिष्य फिर निवेदन करता है। गुरु कहते हैं, "अग्नि" जल से भी श्रेष्ठ है। जब अग्नि वायु को पकड़ती है, तो आकाश को भेदती है; तब लोग कहते हैं, "बिजली चमकी, बादल गरजे, वर्षा होगी।" पहले अग्नि प्रकट होती है, फिर जल उत्पन्न करती है। बिजली की चमक और गरज के साथ जल की वर्षा होती है। इसलिए अग्नि का ध्यान करो। जो अग्नि को ब्रह्म मानकर ध्यान करता है, वह तेजस्वी हो जाता है; उज्ज्वल और अंधकाररहित लोकों को प्राप्त करता है; जहाँ अग्नि है, वहाँ अपनी इच्छा से जा सकता है। फिर शिष्य पूछता है, "भगवन्, क्या अग्नि से भी श्रेष्ठ कुछ है?" गुरु कहते हैं, "हाँ, अग्नि से भी श्रेष्ठ कुछ है," और शिष्य फिर निवेदन करता है। गुरु आगे बताते हैं कि "आकाश" अग्नि से भी श्रेष्ठ है। सूर्य, चंद्रमा, बिजली, तारे, अग्नि — सब आकाश में स्थित हैं। आकाश से ही पुकारा जाता है, सुना जाता है, उत्तर दिया जाता है, आकाश में ही आनंदित होते हैं, आकाश में ही जन्म लेते हैं और आकाश में ही विलीन होते हैं। इसलिए आकाश का ध्यान करो। जो आकाश को ब्रह्म मानकर ध्यान करता है, वह विशाल, उज्ज्वल, अवरोधहीन लोकों को प्राप्त करता है; जहाँ आकाश है, वहाँ अपनी इच्छा से जा सकता है। फिर शिष्य पूछता है, "भगवन्, क्या आकाश से भी श्रेष्ठ कुछ है?" गुरु कहते हैं, "हाँ, आकाश से भी श्रेष्ठ कुछ है," और शिष्य फिर निवेदन करता है। गुरु कहते हैं, "स्मृति" आकाश से भी श्रेष्ठ है। यदि बहुत लोग उपस्थित हों, पर उन्हें स्मरण न हो, तो वे न सुन सकते हैं, न सोच सकते हैं, न जान सकते हैं। जब स्मरण होता है, तभी वे सुनते हैं, सोचते हैं, जानते हैं। पुत्र, पशु — सब स्मृति से ही पहचाने जाते हैं। इसलिए स्मृति का ध्यान करो। जो स्मृति को ब्रह्म मानकर ध्यान करता है, जहाँ स्मृति है, वहाँ अपनी इच्छा से जा सकता है। फिर शिष्य पूछता है, "भगवन्, क्या स्मृति से भी श्रेष्ठ कुछ है?" गुरु कहते हैं, "हाँ, स्मृति से भी श्रेष्ठ कुछ है," और शिष्य फिर निवेदन करता है। गुरु बताते हैं कि "आशा" स्मृति से भी श्रेष्ठ है। यदि कोई वेदों को भी भूल जाए, तो भी आशा के बल पर ही यज्ञ करता है, पुत्र और पशु की कामना करता है, इस लोक और परलोक की इच्छा करता है। इसलिए आशा का ध्यान करो। जो आशा को ब्रह्म मानकर ध्यान करता है, उसकी सभी इच्छाएँ पूरी होती हैं, उसकी अभिलाषाएँ विफल नहीं होतीं; जहाँ आशा है, वहाँ अपनी इच्छा से जा सकता है। फिर शिष्य पूछता है, "भगवन्, क्या आशा से भी श्रेष्ठ कुछ है?" गुरु कहते हैं, "हाँ, आशा से भी श्रेष्ठ कुछ है," और शिष्य फिर निवेदन करता है। गुरु कहते हैं, "प्राण" आशा से भी श्रेष्ठ है। जैसे पहिए की सारी तीलियाँ धुरी में स्थित होती हैं, वैसे ही सब कुछ प्राण में स्थित है। प्राण से ही प्राण चलता है, प्राण ही प्राण को देता है, प्राण ही प्राण के लिए देता है। प्राण ही पिता, माता, भाई, बहन, आचार्य और ब्राह्मण है। यदि कोई अपने पिता, माता, भाई, बहन, आचार्य या ब्राह्मण से कठोर वचन कहे, तो लोग उसे निंदित करते हैं। लेकिन यदि कोई उन्हें प्राण रहते हुए भी भौतिक रूप से आघात पहुँचाए, तो लोग उसे उनका घातक नहीं मानते। क्योंकि प्राण ही सबका सार है। जो ऐसा देखता, सोचता और जानता है, वह दूसरों से श्रेष्ठ बोलता है। यदि कोई उससे कहे, "तुम दूसरों से श्रेष्ठ बोलते हो," तो उसे स्वीकार करना चाहिए। लेकिन वास्तव में, वही दूसरों से श्रेष्ठ बोलता है, जो सत्य के साथ बोलता है। शिष्य कहता है, "भगवन्, मैं सत्य के साथ श्रेष्ठ बोलना चाहता हूँ।" गुरु कहते हैं, "सत्य को जानने की इच्छा करो।" शिष्य कहता है, "भगवन्, मैं सत्य को जानना चाहता हूँ।" गुरु आगे बताते हैं, "जब जानता है, तभी सत्य बोलता है; न जानने से सत्य नहीं बोला जाता। केवल जानकर ही सत्य बोला जाता है। इसलिए ज्ञान को जानने की इच्छा करो।" शिष्य कहता है, "भगवन्, मैं ज्ञान को जानना चाहता हूँ।" गुरु कहते हैं, "जब सोचता है, तभी जानता है; केवल नाम लेकर नहीं, बल्कि सोचने से ही जानता है। इसलिए मनन को जानने की इच्छा करो।" शिष्य कहता है, "भगवन्, मैं मनन को जानना चाहता हूँ।" गुरु आगे समझाते हैं, "जब श्रद्धा होती है, तभी मनन होता है; बिना श्रद्धा के मनन नहीं होता। केवल श्रद्धा से ही मनन होता है। इसलिए श्रद्धा को जानने की इच्छा करो।" शिष्य कहता है, "भगवन्, मैं श्रद्धा को जानना चाहता हूँ।" गुरु कहते हैं, "जब धैर्य होता है, तभी श्रद्धा होती है; बिना धैर्य के श्रद्धा नहीं होती। केवल धैर्य से ही श्रद्धा होती है। इसलिए धैर्य को जानने की इच्छा करो।" शिष्य कहता है, "भगवन्, मैं धैर्य को जानना चाहता हूँ।" गुरु आगे बताते हैं, "जब कर्म करता है, तभी धैर्य होता है; बिना कर्म के धैर्य नहीं होता। केवल कर्म से ही धैर्य होता है। इसलिए कर्म को जानने की इच्छा करो।" शिष्य कहता है, "भगवन्, मैं कर्म को जानना चाहता हूँ।" फिर गुरु कहते हैं, "जब सुख प्राप्त होता है, तभी कर्म करता है; बिना सुख प्राप्त किए कर्म नहीं करता। केवल सुख प्राप्त करके ही कर्म करता है। इसलिए सुख को जानने की इच्छा करो।" शिष्य कहता है, "भगवन्, मैं सुख को जानना चाहता हूँ।" गुरु आगे कहते हैं, "जो व्यापक है, वही सुख है; छोटे में सुख नहीं है। केवल व्यापक ही सुख है। इसलिए व्यापक को जानने की इच्छा करो।" शिष्य कहता है, "भगवन्, मैं व्यापक को जानना चाहता हूँ।" गुरु समझाते हैं, "जहाँ कोई दूसरे को न देखता है, न सुनता है, न जानता है — वही व्यापक है। जहाँ कोई दूसरे को देखता, सुनता, जानता है — वह छोटा है। व्यापक अमर है; छोटा नश्वर है।" शिष्य पूछता है, "भगवन्, यह किसमें स्थित है?" गुरु उत्तर देते हैं, "अपने ही महत्त्व में, या फिर महत्त्व में भी नहीं।" यहाँ लोग महत्त्व को पशु, घोड़े, हाथी, सोना, सेवक, पत्नी, खेत, घर में मानते हैं। लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता।" शिष्य पूछता है, "तो आप क्या मानते हैं?" गुरु कहते हैं, "एक वस्तु दूसरी में स्थित है।" गुरु आगे बताते हैं, "वह नीचे है, ऊपर है, पीछे है, आगे है, दाएँ है, बाएँ है; वही सब कुछ है। इसलिए आत्मा के संबंध में शिक्षा है: मैं नीचे हूँ, मैं ऊपर हूँ, मैं पीछे हूँ, मैं आगे हूँ, मैं दाएँ हूँ, मैं बाएँ हूँ; मैं ही सब कुछ हूँ।" "इसलिए आत्मा के संबंध में शिक्षा है: आत्मा नीचे है, आत्मा ऊपर है, आत्मा पीछे है, आत्मा आगे है, आत्मा दाएँ है, आत्मा बाएँ है; आत्मा ही सब कुछ है। जो ऐसा देखता, सोचता और जानता है — वह आत्मा में ही आनंदित होता है, आत्मा में ही रमण करता है, आत्मा में ही संयोग करता है, आत्मा में ही हर्षित होता है — वह स्वामी बन जाता है। वह सब लोकों में अपनी इच्छा से विचरण करता है। जो ऐसा नहीं जानते, वे दूसरों के अधीन रहते हैं; उनके लोक नश्वर होते हैं, और वे सब लोकों में अपनी इच्छा से नहीं जा सकते।" "ऐसा जो देखता, सोचता और जानता है, उसके लिए आत्मा से ही प्राण, आशा, स्मृति, आकाश, अग्नि, जल, प्रकट और अप्रकट, अन्न, बल, ज्ञान, ध्यान, बुद्धि, संकल्प, मन, वाणी, नाम, मन्त्र, कर्म — सब उत्पन्न होते हैं; वास्तव में, सब आत्मा ही है।" इस विषय में एक ऋचा है: "वह मृत्यु, रोग, शोक नहीं देखता; जो देखता है, वह सब कुछ देखता है, सब कुछ प्राप्त करता है। वह एक, त्रैगुण्य, पंचगुण्य, सप्तगुण्य, नवगुण्य और फिर एकादशगुण्य, सौ, दस, एक, और बीस हजार तक कहा जाता है। जब अन्न शुद्ध होता है, तो मन शुद्ध होता है; जब मन शुद्ध होता है, तो स्मृति स्थिर होती है; जब स्मृति स्थिर होती है, तो हृदय के सभी बंधन खुल जाते हैं। जिसके दोष धुल जाते हैं, उस पर पूज्य सनत्कुमार अज्ञान के पार का मार्ग दिखाते हैं। उसे स्कन्द कहते हैं, उसे स्कन्द कहते हैं।" अंत में, गुरु कहते हैं, "अब ब्रह्मपुर — इस शरीर — में एक छोटा कमल सदृश निवास है, और उसमें एक छोटा सा आकाश है। उसमें जो है, वही जानने योग्य है, वही प्राप्त करने योग्य है।" इस प्रकार, सनातन सत्य की यह महान कथा, उपनिषद् के वचनों के अनुसार, हमें आत्मा और ब्रह्म के परम रहस्य की ओर ले जाती है।