एक बार महान ऋषि याज्ञवल्क्य विद्वानों की सभा में बैठे थे। वहाँ अनेक जिज्ञासु ब्राह्मण और ब्रह्मवादिनी गार्गी भी उपस्थित थीं। उस समय ब्रह्मा-विद्या का गूढ़ संवाद चल रहा था। याज्ञवल्क्य ने उपनिषद् के गूढ़ रहस्य को प्रकट करते हुए कहा— "जो जल के भीतर स्थित है, किन्तु जल से भिन्न है, जिसे जल जान नहीं पाता, जिसका शरीर ही जल है, और जो भीतर से जल का नियंत्रण करता है—वह तुम्हारा आत्मा है, वही अंतर्यामी, वही अमर है। इसी प्रकार, जो अग्नि के भीतर स्थित है, फिर भी अग्नि से भिन्न है, जिसे अग्नि जान नहीं पाती, जिसका शरीर अग्नि है, और जो भीतर से अग्नि को नियंत्रित करता है—वह तुम्हारा आत्मा है, वही अंतर्यामी, वही अमर है। जो मध्य-आकाश में स्थित है, पर उससे भिन्न है, जिसे मध्य-आकाश नहीं जानता, जिसका शरीर मध्य-आकाश है, और जो भीतर से उसे नियंत्रित करता है—वह तुम्हारा आत्मा है, वही अंतर्यामी, वही अमर है। जो वायु के भीतर स्थित है, पर वायु से भिन्न है, जिसे वायु नहीं जानती, जिसका शरीर वायु है, और जो भीतर से वायु का नियंत्रण करता है—वह तुम्हारा आत्मा है, वही अंतर्यामी, वही अमर है। जो आकाश के भीतर स्थित है, पर आकाश से भिन्न है, जिसे आकाश नहीं जानता, जिसका शरीर आकाश है, और जो भीतर से आकाश का नियंत्रण करता है—वह तुम्हारा आत्मा है, वही अंतर्यामी, वही अमर है। जो सूर्य के भीतर स्थित है, पर सूर्य से भिन्न है, जिसे सूर्य नहीं जानता, जिसका शरीर सूर्य है, और जो भीतर से सूर्य का नियंत्रण करता है—वह तुम्हारा आत्मा है, वही अंतर्यामी, वही अमर है। जो चंद्रमा और तारों के भीतर स्थित है, पर उनसे भिन्न है, जिन्हें चंद्रमा और तारे नहीं जानते, जिसका शरीर चंद्रमा और तारे हैं, और जो भीतर से उनका नियंत्रण करता है—वह तुम्हारा आत्मा है, वही अंतर्यामी, वही अमर है। जो अंतरिक्ष के भीतर स्थित है, पर अंतरिक्ष से भिन्न है, जिसे अंतरिक्ष नहीं जानता, जिसका शरीर अंतरिक्ष है, और जो भीतर से उसे नियंत्रित करता है—वह तुम्हारा आत्मा है, वही अंतर्यामी, वही अमर है। जो दिशाओं के भीतर स्थित है, पर दिशाओं से भिन्न है, जिन्हें दिशाएँ नहीं जानतीं, जिसका शरीर दिशाएँ हैं, और जो भीतर से दिशाओं का नियंत्रण करता है—वह तुम्हारा आत्मा है, वही अंतर्यामी, वही अमर है। जो विद्युत (बिजली) के भीतर स्थित है, पर उससे भिन्न है, जिसे बिजली नहीं जानती, जिसका शरीर बिजली है, और जो भीतर से बिजली का नियंत्रण करता है—वह तुम्हारा आत्मा है, वही अंतर्यामी, वही अमर है। जो गर्जन (बादल की गड़गड़ाहट) के भीतर स्थित है, पर उससे भिन्न है, जिसे गर्जन नहीं जानता, जिसका शरीर गर्जन है, और जो भीतर से गर्जन का नियंत्रण करता है—वह तुम्हारा आत्मा है, वही अंतर्यामी, वही अमर है। जो समस्त लोकों के भीतर स्थित है, पर उनसे भिन्न है, जिन्हें लोक नहीं जानते, जिसका शरीर सारे लोक हैं, और जो भीतर से लोकों का नियंत्रण करता है—वह तुम्हारा आत्मा है, वही अंतर्यामी, वही अमर है। जो समस्त वेदों के भीतर स्थित है, पर उनसे भिन्न है, जिन्हें वेद नहीं जानते, जिसका शरीर सारे वेद हैं, और जो भीतर से वेदों का नियंत्रण करता है—वह तुम्हारा आत्मा है, वही अंतर्यामी, वही अमर है। जो समस्त यज्ञों के भीतर स्थित है, पर उनसे भिन्न है, जिन्हें यज्ञ नहीं जानते, जिसका शरीर सारे यज्ञ हैं, और जो भीतर से यज्ञों का नियंत्रण करता है—वह तुम्हारा आत्मा है, वही अंतर्यामी, वही अमर है। जो समस्त प्राणियों के भीतर स्थित है, पर उनसे भिन्न है, जिन्हें प्राणी नहीं जानते, जिसका शरीर सारे प्राणी हैं, और जो भीतर से प्राणियों का नियंत्रण करता है—वह तुम्हारा आत्मा है, वही अंतर्यामी, वही अमर है।" इतना तत्वों का उपदेश हुआ। अब याज्ञवल्क्य ने आत्मा के विषय में कहा— "जो प्राण के भीतर स्थित है, पर प्राण से भिन्न है, जिसे प्राण नहीं जानता, जिसका शरीर प्राण है, और जो भीतर से प्राण का नियंत्रण करता है—वह तुम्हारा आत्मा है, वही अंतर्यामी, वही अमर है। जो वाणी के भीतर स्थित है, पर वाणी से भिन्न है, जिसे वाणी नहीं जानती, जिसका शरीर वाणी है, और जो भीतर से वाणी का नियंत्रण करता है—वह तुम्हारा आत्मा है, वही अंतर्यामी, वही अमर है। जो नेत्र के भीतर स्थित है, पर नेत्र से भिन्न है, जिसे नेत्र नहीं जानता, जिसका शरीर नेत्र है, और जो भीतर से नेत्र का नियंत्रण करता है—वह तुम्हारा आत्मा है, वही अंतर्यामी, वही अमर है। जो कर्ण के भीतर स्थित है, पर कर्ण से भिन्न है, जिसे कर्ण नहीं जानता, जिसका शरीर कर्ण है, और जो भीतर से कर्ण का नियंत्रण करता है—वह तुम्हारा आत्मा है, वही अंतर्यामी, वही अमर है। जो मन के भीतर स्थित है, पर मन से भिन्न है, जिसे मन नहीं जानता, जिसका शरीर मन है, और जो भीतर से मन का नियंत्रण करता है—वह तुम्हारा आत्मा है, वही अंतर्यामी, वही अमर है। जो त्वचा के भीतर स्थित है, पर त्वचा से भिन्न है, जिसे त्वचा नहीं जानती, जिसका शरीर त्वचा है, और जो भीतर से त्वचा का नियंत्रण करता है—वह तुम्हारा आत्मा है, वही अंतर्यामी, वही अमर है। जो ज्ञान के भीतर स्थित है, पर ज्ञान से भिन्न है, जिसे ज्ञान नहीं जानता, जिसका शरीर ज्ञान है, और जो भीतर से ज्ञान का नियंत्रण करता है—वह तुम्हारा आत्मा है, वही अंतर्यामी, वही अमर है। जो प्रकाश के भीतर स्थित है, पर प्रकाश से भिन्न है, जिसे प्रकाश नहीं जानता, जिसका शरीर प्रकाश है, और जो भीतर से प्रकाश का नियंत्रण करता है—वह तुम्हारा आत्मा है, वही अंतर्यामी, वही अमर है। जो अंधकार के भीतर स्थित है, पर अंधकार से भिन्न है, जिसे अंधकार नहीं जानता, जिसका शरीर अंधकार है, और जो भीतर से अंधकार का नियंत्रण करता है—वह तुम्हारा आत्मा है, वही अंतर्यामी, वही अमर है। जो बीज के भीतर स्थित है, पर बीज से भिन्न है, जिसे बीज नहीं जानता, जिसका शरीर बीज है, और जो भीतर से बीज का नियंत्रण करता है—वह तुम्हारा आत्मा है, वही अंतर्यामी, वही अमर है। जो आत्मा के भीतर स्थित है, पर आत्मा से भिन्न है, जिसे आत्मा नहीं जानता, जिसका शरीर आत्मा है, और जो भीतर से आत्मा का नियंत्रण करता है—वह तुम्हारा आत्मा है, वही अंतर्यामी, वही अमर है।" याज्ञवल्क्य आगे कहते हैं, "यह आत्मा अदृश्य है, परंतु देखता है; अश्रव्य है, परंतु सुनता है; अचिंत्य है, परंतु सोचता है; अज्ञेय है, परंतु जानता है। इसके अतिरिक्त कोई अन्य द्रष्टा, श्रोता, चिन्तक या ज्ञाता नहीं है। यही तुम्हारा आत्मा है, वही अंतर्यामी, वही अमर है। अन्य सब दुःख के अधीन हैं।" इतना कहकर अरुण के पुत्र उद्दालक मौन हो गए। तब वाचक्नवी गार्गी ने कहा, "आदरणीय ब्राह्मणों! मैं याज्ञवल्क्य से दो प्रश्न पूछना चाहती हूँ। यदि ये उत्तर देंगे, तो आपमें से कोई भी इनसे ब्रह्म विषयक संवाद में विजय नहीं पा सकेगा। यदि उत्तर न दे सके, तो इनका सिर गिर जाएगा।" ब्राह्मणों ने कहा, "पूछो, गार्गी।" गार्गी ने कहा, "जैसे काशी या विदेह का कोई वीर धनुष-बाण लेकर युद्ध के लिए सज्ज हो, वैसे ही मैं दो प्रश्नों के साथ आपके समक्ष आई हूँ। उत्तर दीजिए।" याज्ञवल्क्य बोले, "पूछो, गार्गी।" गार्गी ने पूछा, "याज्ञवल्क्य! वह जो स्वर्ग के ऊपर, पृथ्वी के नीचे, स्वर्ग-पृथ्वी के बीच, और जो था, है और होगा—लोग इनकी चर्चा करते हैं। ये सब किसमें गुँथे और गुंफित हैं?" याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया, "गार्गी! ये सब आकाश (स्पेस) में गुँथे और गुंफित हैं।" गार्गी ने कहा, "आपने इसका उत्तर दिया। अब दूसरा प्रश्न सुनिए।" याज्ञवल्क्य ने कहा, "पूछो, गार्गी।" गार्गी ने फिर वही प्रश्न किया, "याज्ञवल्क्य! वह जो स्वर्ग के ऊपर, पृथ्वी के नीचे, स्वर्ग-पृथ्वी के बीच, और जो था, है और होगा—लोग इनकी चर्चा करते हैं। ये सब किसमें गुँथे और गुंफित हैं?" याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया, "ये सब आकाश में ही गुँथे हैं। परंतु आकाश स्वयं किसमें गुँथा है?" फिर याज्ञवल्क्य बोले, "गार्गी! ब्रह्मज्ञानी इसे 'अक्षर' (अविनाशी) कहते हैं। यह न स्थूल है, न सूक्ष्म; न छोटा, न बड़ा; न लाल, न तरल; न छाया, न अंधकार; न वायु, न आकाश; यह असंग, अस्पृश्य, गंधहीन, रसहीन, नेत्रहीन, कर्णहीन, वाणीहीन, मनहीन, तेजहीन, प्राणहीन, मुखहीन, नाम-वंशहीन, अविनाशी, अमर, निर्भय, मृत्युहीन, मलरहित, अशब्द, अव्यक्त, सीमाहीन, अनादि, अनंत, भीतर-बाहर से रहित है। कोई इसे प्राप्त नहीं कर सकता, कोई इसे पकड़ नहीं सकता।" "इसी अविनाशी के आदेश से, गार्गी, स्वर्ग और पृथ्वी स्थित हैं; इसी के आदेश से सूर्य और चंद्रमा स्थित हैं; इसी के आदेश से दिन-रात, मास, ऋतु और वर्ष टिके हैं; इसी के आदेश से पूर्व की नदियाँ पूर्व, पश्चिम की पश्चिम, दक्षिण की दक्षिण बहती हैं; इसी के आदेश से लोग दानवीरों की स्तुति करते हैं, देवता यजमान की, पितर तर्पण की आशा करते हैं।" "जो, गार्गी, इस अविनाशी को जाने बिना यज्ञ, दान या तप करता है, उसका फल सीमित है, चाहे वह हजारों वर्षों तक ही क्यों न करे। जो, गार्गी, इस अविनाशी को जाने बिना संसार से जाता है, वह दयनीय है। किंतु जो इसे जानकर जाता है, वही ब्रह्मज्ञानी है।" याज्ञवल्क्य ने आगे कहा, "गार्गी! वही अविनाशी है—जो अदृश्य होते हुए भी द्रष्टा है, अश्रव्य होते हुए भी श्रोता है, अचिन्त्य होते हुए भी चिन्तक है, अज्ञेय होते हुए भी ज्ञाता है। इसके अतिरिक्त कोई अन्य द्रष्टा, श्रोता, चिन्तक या ज्ञाता नहीं है। इसी में, गार्गी, आकाश गुँथा हुआ है।" यह सुनकर गार्गी ने ब्राह्मणों से कहा, "आप सबको चाहिए कि याज्ञवल्क्य का सम्मान करें, क्योंकि इनके उत्तरों से आप सबका प्रश्न-बंधन छूट गया। आपमें से कोई भी ब्रह्म-वाद में इन्हें पराजित नहीं कर सकेगा।" इतना कहकर गार्गी ने प्रश्न करना बंद कर दिया। इसके बाद विदग्ध शाकल्य ने याज्ञवल्क्य से पूछा, "याज्ञवल्क्य! देवता कितने हैं?" याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया, "तीन और तीन सौ, तीन और तीन हजार।" फिर शाकल्य ने पूछा, "वास्तव में कितने?" याज्ञवल्क्य बोले, "तैंतीस।" फिर पूछा, "कितने?" उत्तर मिला, "छः।" फिर पूछा, "कितने?" उत्तर मिला, "तीन।" फिर पूछा, "कितने?" उत्तर मिला, "दो।" फिर पूछा, "कितने?" उत्तर मिला, "डेढ़।" फिर पूछा, "कितने?" उत्तर मिला, "एक।" शाकल्य ने पूछा, "ये तीन और तीन सौ, तीन और तीन हजार कौन हैं?" याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया, "ये सब उनकी महिमा की अभिव्यक्तियाँ हैं, वास्तव में देवता तैंतीस ही हैं। कौन-कौन हैं ये तैंतीस? आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य—ये इकतीस हुए—इंद्र और प्रजापति मिलाकर तैंतीस।" शाकल्य ने पूछा, "वसु कौन-कौन हैं?" याज्ञवल्क्य बोले, "अग्नि, पृथ्वी, वायु, अंतरिक्ष, सूर्य, स्वर्ग, चंद्रमा और तारे—ये आठ वसु हैं। इन सबमें ही सब कुछ स्थित है, इसलिए इन्हें वसु कहा जाता है।" फिर पूछा, "रुद्र कौन हैं?" याज्ञवल्क्य ने कहा, "मनुष्य के दस प्राण और ग्यारहवाँ आत्मा—ये ग्यारह रुद्र हैं। जब ये शरीर छोड़ते हैं, तो रोदन (रोना) होता है, इसलिए इन्हें रुद्र कहा गया।" फिर पूछा, "आदित्य कौन हैं?" याज्ञवल्क्य बोले, "वर्ष के बारह महीने—ये बारह आदित्य हैं। क्योंकि ये सब कुछ हर लेते हैं, इन्हें आदित्य कहा जाता है।" फिर पूछा, "इंद्र और प्रजापति कौन हैं?" याज्ञवल्क्य ने कहा, "गर्जन (बिजली) इंद्र है, यज्ञ प्रजापति है।" "गर्जन क्या है?" "बिजली।" "यज्ञ क्या है?" "पशु।" इस प्रकार याज्ञवल्क्य ने ब्रह्म के गूढ़ रहस्यों को प्रकट किया, और सभा में सभी श्रोताओं को आत्मा और ब्रह्म की दिव्य महिमा का बोध कराया।