एक बार, महान ऋषि याज्ञवल्क्य और उनकी धर्मपत्नी मैत्रेयी के बीच आत्मज्ञान की गूढ़ चर्चा हो रही थी। याज्ञवल्क्य ने उस परम पुरुष का स्वरूप समझाते हुए कहा—वह पुरुष राजसी वसन के समान, उज्ज्वल ऊनी वस्त्र के समान, जुगनू की चमक के समान, अग्नि की लौ के समान, कमल के समान, और बिजली की चमक के समान है। उसकी दीप्ति ठीक वैसी ही है जैसे क्षणिक बिजली की चमक। जो इसे जानता है, वह स्वयं उस तेज का भागी बनता है। फिर याज्ञवल्क्य ने उपदेश दिया, “सुनो, इसका उपदेश यही है—‘नेति, नेति’—यह नहीं, यह नहीं। इससे ऊपर कुछ नहीं है। इसका नाम है ‘सत्य का सत्य’। प्राण ही सत्य है, और इन सबका यही सत्य है।” इसके बाद याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी से कहा, “मैत्रेयी, मैं अब इस स्थान को छोड़ने का विचार कर रहा हूँ। आओ, मैं तुम्हारे और कात्यायनी के लिए अंतिम व्यवस्था कर दूँ।” मैत्रेयी ने प्रश्न किया, “भगवन्, यदि पूरी पृथ्वी धन-सम्पत्ति से भर जाए, तो क्या मैं उससे अमर हो सकती हूँ?” याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया, “धन से जितना सुख सांसारिक लोगों को मिलता है, उतना तुम्हें भी मिलेगा; परंतु धन से अमरत्व की कोई आशा नहीं है।” मैत्रेयी ने फिर पूछा, “जो वस्तु मुझे अमर न कर सके, उसका मैं क्या करूँ? जो भी आप जानते हैं, कृपया वही मुझे बताइए।” याज्ञवल्क्य ने स्नेहपूर्वक कहा, “तुमने प्रिय की भाँति प्रिय वचन कहे हैं। आओ, बैठो, मैं तुम्हें समझाऊँगा। जब मैं समझाऊँ, तो मनन करना।” मैत्रेयी बोली, “कृपया, भगवन्, आप कहें।” याज्ञवल्क्य ने कहा, “यह है वह संबंध—यह उपनिषद् है, बृहदारण्यक उपनिषद्—और इसके विभिन्न अध्याय, भाग—सब इसी से जुड़े हैं।” फिर उन्होंने गहन सत्य प्रकट किया, “जो ब्रह्म को आत्मा से भिन्न जानता है, उससे ब्रह्म खो जाता है; जो शक्ति को आत्मा से भिन्न जानता है, उससे शक्ति खो जाती है; जो लोकों को आत्मा से भिन्न जानता है, उससे लोक खो जाते हैं; जो देवताओं को आत्मा से भिन्न जानता है, उससे देवता खो जाते हैं; जो समस्त प्राणियों को आत्मा से भिन्न जानता है, उससे वे प्राणी खो जाते हैं; जो सब कुछ आत्मा से भिन्न जानता है, उससे सब कुछ खो जाता है। यही ब्रह्म है, यही शक्ति है, यही लोक हैं, यही देवता हैं, यही प्राणी हैं, यही सब कुछ है—यही आत्मा है।” याज्ञवल्क्य ने उदाहरण देकर समझाया, “जैसे वाद्य बजाने पर उसकी ध्वनि बाहर से पकड़ में नहीं आती, परंतु वाद्य या बजाने वाले को पकड़ने से उसकी ध्वनि मिलती है; वैसे ही, सब कुछ आत्मा में ही स्थित है। जैसे वीणा, शंख, या अग्नि में विविध धुएँ—सब उसी के प्रकट रूप हैं; वैसे ही, इस महान् पुरुष से ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास, पुराण, विद्या, उपनिषद्, श्लोक, सूत्र, व्याख्या, भाष्य—सब उसकी ही श्वासें हैं।” फिर उन्होंने आगे समझाया, “जैसे सारी नदियाँ समुद्र में मिलती हैं, सारे स्पर्श त्वचा में, सारी गंध नाक में, सारे रस जिह्वा में, सारे रूप नेत्र में, सारी ध्वनियाँ कान में, सारे संकल्प मन में, सारे वेद वाणी में, सारे कर्म हाथों में, सारी गतियाँ पैरों में, सारे सुख जननेंद्रिय में, सारी निष्क्रियता गुदा में, और समस्त ज्ञान हृदय में—वैसे ही, सब कुछ आत्मा में ही लीन होता है।” याज्ञवल्क्य ने आगे कहा, “जैसे नमक का ढेला पानी में डालने पर सर्वत्र घुल जाता है, और कहीं से भी पानी चखो, वह नमकीन ही रहता है—वैसे ही, यह महान्, असीम, अनंत, पूर्ण ज्ञानराशि पंचमहाभूतों से उत्पन्न होकर उन्हीं में लीन हो जाती है। मृत्यु के बाद कोई पृथक् चेतना नहीं रहती—मैं यही कहता हूँ।” मैत्रेयी ने जिज्ञासा से पूछा, “भगवन्, आपने यह कहकर कि मृत्यु के बाद पृथक् चेतना नहीं रहती, मुझे उलझन में डाल दिया है।” याज्ञवल्क्य बोले, “नहीं, प्रिये, मैं तुम्हें उलझा नहीं रहा; यही समझने के लिए पर्याप्त है।” फिर उन्होंने द्वैत-अद्वैत का रहस्य बताया, “जहाँ द्वैत है, वहाँ एक दूसरे को देखता है, सूँघता है, सुनता है, बोलता है, सोचता है, जानता है। पर जहाँ सब कुछ अपने ही आत्मा में लीन हो गया, वहाँ किससे और किसको देखेगा, सूँघेगा, सुनेगा, बोलेगा, सोचेगा, जानेगा? जानने वाले को कौन जानेगा? जिससे सब कुछ जाना जाता है, उसे कौन जानेगा?” फिर उन्होंने आत्मा का सर्वव्यापक स्वरूप प्रकट किया—“यह पृथ्वी सभी प्राणियों के लिए मधु (आनंद) है, और सभी प्राणी पृथ्वी के लिए मधु हैं। जो तेजस्वी, अमर पुरुष पृथ्वी में है, और वही शरीर में है—वही आत्मा है, वही अमर है, वही ब्रह्म है, वही सब कुछ है।” इसी प्रकार, जल, अग्नि, आकाश, वायु, सूर्य, चंद्रमा, दिशाएँ, बिजली, गर्जन, धर्म, सत्य, मानव, और स्वयं आत्मा—इन सबके भीतर वही तेजस्वी, अमर पुरुष है, वही आत्मा है, वही ब्रह्म है, वही सब कुछ है। याज्ञवल्क्य ने आगे कहा, “यह आत्मा ही सब प्राणियों का स्वामी, राजा है। जैसे पहिए की सारी तीलियाँ धुरी और घेरे में स्थित होती हैं, वैसे ही सब प्राणी, देवता, लोक, प्राण, और आत्माएँ इसी आत्मा में स्थित हैं।” फिर उन्होंने प्राचीन ऋषि दध्यच अथर्वण द्वारा अश्विनीकुमारों को दिए गए मधुप्रकरण का उल्लेख किया और बताया कि कैसे वह रहस्य, जो घोड़े के सिर के माध्यम से दिया गया था, समस्त रूपों में व्याप्त है—इंद्र की तरह, जो अनेकों रूपों में विचरण करता है। यही ब्रह्म है—न आदि, न अंत, न बाहर, न भीतर। यही आत्मा ब्रह्म है, सर्वव्यापक है—यही उपदेश है। इसके बाद याज्ञवल्क्य ने इस ज्ञान की गुरु-शिष्य परंपरा (श्रृंखला) का विस्तार से उल्लेख किया—कई महान ऋषियों के नामों के माध्यम से, जो ब्रह्मा से प्रारंभ होकर, एक के बाद एक, इस दिव्य ज्ञान का संचार करते आए। अंत में, उन्होंने कहा—ब्रह्मा स्वयंभू है। ब्रह्म को बार-बार प्रणाम। इस प्रकार, याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी को आत्मा और ब्रह्म के अद्वैत, सर्वव्यापक, अमर स्वरूप का महाउपदेश दिया।