आइए, ब्रह्मज्ञान की इस दिव्य कथा को सुनें, जिसमें ऋषियों, तत्वों और आत्मा के रहस्य एक-एक करके उजागर होते हैं। गौतम और भरद्वाज, विश्वामित्र और जमदग्नि, वशिष्ठ और कश्यप—ये महान ऋषि दो-दो होकर प्रकट होते हैं। वाणी को अत्रि कहा गया है, क्योंकि वाणी के द्वारा ही भोजन ग्रहण होता है; यही अत्रि का अर्थ है। जो इसे जानता है, वह सबका भक्षक बन जाता है और सारा भोजन उसका हो जाता है। अब ब्रह्म के दो रूप बताए गए हैं: एक साकार और एक निराकार; एक नश्वर और एक अमर; एक स्थिर और एक गतिशील; एक प्रकट और एक अप्रकट। जो साकार है, वह वायु और आकाश के अतिरिक्त है—वही नश्वर, वही स्थिर, वही प्रकट है। इस साकार, नश्वर, स्थिर और प्रकट का सार वही है जो प्रकाशित होता है; उसका सार ही उसका प्रकाश है। निराकार रूप वायु और आकाश है—वही अमर है, वही उसका सार है। इस निराकार, अमर और सार का रस वह पुरुष है जो इस मंडल में है; वही उसका रस है। यही दिव्यता का स्पष्टीकरण है। अब आत्मा की बात आती है: जो कुछ श्वास के पार है, जो आत्मा के भीतर का आकाश है—वही निराकार है; वही अमर है, वही उसका सार है। इस साकार, नश्वर, स्थिर और विद्यमान का रस नेत्र है; क्योंकि विद्यमान ही उसका रस है। निराकार रूप श्वास और आत्मा का आकाश है—वही अमर है, वही उसका सार है। इस निराकार, अमर और सार का रस वह पुरुष है जो दाहिने नेत्र में है; वही उसका रस है। उस पुरुष का रूप राजसी वस्त्र की तरह, सफेद ऊन के वस्त्र की तरह, जुगनू की तरह, अग्नि की ज्वाला की तरह, कमल की तरह, बिजली की चमक की तरह है। जैसे बिजली की चमक, वैसे ही उसकी दीप्ति है—जो इसे जानता है। अब यहाँ शिक्षा दी जाती है: "नेति, नेति"—यह नहीं, यह नहीं। इससे ऊँचा कुछ नहीं है; इसका नाम है "सत्य का सत्य"। श्वास सत्य है; इन सबका यही सत्य है। मैत्रेयी से याज्ञवल्क्य कहते हैं: "मैं यहाँ से जाने वाला हूँ; आओ, मैं तुम्हारे और कात्यायनी के लिए अंतिम व्यवस्था कर दूँ।" मैत्रेयी पूछती हैं: "यदि सारी पृथ्वी धन से भर जाए, क्या मैं उससे अमर हो सकती हूँ?" याज्ञवल्क्य उत्तर देते हैं: "जैसे धनवानों का जीवन होता है, वैसा तुम्हारा भी होगा; लेकिन धन से अमरता की कोई आशा नहीं है।" मैत्रेयी कहती हैं: "जिससे मैं अमर न हो सकूँ, उसका क्या करूँ? जो आप जानते हैं, वही मुझे बताइए।" याज्ञवल्क्य कहते हैं: "तुमने प्रिय वचन कहे हैं; आओ, बैठो, मैं तुम्हें समझाऊँगा। जब मैं समझाऊँ, तुम विचार करना।" याज्ञवल्क्य कहते हैं: "यह संबंध—उपनिषद्—बृहदारण्यक उपनिषद्—इसके विभिन्न खंड—बाहर का खंड—प्रकरण।" अब गूढ़ ज्ञान आता है: जो ब्रह्म को आत्मा से अलग जानता है, उसके लिए ब्रह्म खो जाता है; जो शक्ति को आत्मा से अलग जानता है, उसके लिए शक्ति खो जाती है; जो लोकों को, देवताओं को, प्राणियों को, सबको आत्मा से अलग जानता है, उसके लिए सब खो जाता है। यही ब्रह्म है, यही शक्ति है, यही लोक हैं, यही देवता हैं, यही प्राणी हैं, यही सब है—यही आत्मा है। जैसे ढोल बजाने पर कोई बाहर की ध्वनि नहीं पकड़ सकता, लेकिन ढोल या बजाने को पकड़कर ध्वनि को पा सकता है; वैसे ही वीणा बजाने पर, शंख बजाने पर—ध्वनि को पकड़ने का उपाय वही है। जैसे गीली लकड़ी से अग्नि प्रज्वलित होती है और अलग-अलग धुएँ निकलते हैं, वैसे ही इस महान पुरुष से उसकी श्वासें निकलती हैं—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास, पुराण, ज्ञान, उपनिषद्, मंत्र, सूत्र, व्याख्या, टीका—ये सब उसकी श्वासें हैं। जैसे सभी जल का एक लक्ष्य समुद्र है, सभी स्पर्श का लक्ष्य त्वचा है, सभी गंध का लक्ष्य नाक है, सभी स्वाद का लक्ष्य जीभ है, सभी रूप का लक्ष्य आँख है, सभी ध्वनि का लक्ष्य कान है, सभी विचार का लक्ष्य मन है, सभी वेदों का लक्ष्य वाणी है, सभी कर्म का लक्ष्य हाथ है, सभी गति का लक्ष्य पैर है, सभी सुख का लक्ष्य जननेंद्रिय है, सभी मल का लक्ष्य गुदा है, सभी ज्ञान का लक्ष्य हृदय है। जैसे नमक का टुकड़ा पानी में डालने पर पूरी तरह घुल जाता है और कहीं से भी पानी चखो, वह नमकीन ही होता है—वैसे ही यह महान, अनंत, पूर्ण ज्ञान का पिंड इन तत्वों से उत्पन्न होकर उन्हीं में विलीन हो जाता है; मृत्यु के बाद पृथक चेतना नहीं रहती। यही मैं कहता हूँ, याज्ञवल्क्य ने कहा। मैत्रेयी ने पूछा: "आपने कहा मृत्यु के बाद चेतना नहीं रहती, इससे मैं उलझ गई हूँ।" याज्ञवल्क्य बोले: "नहीं, प्रिय, मैं भ्रम नहीं बोल रहा; यही समझने के लिए पर्याप्त है।" जहाँ द्वैत है, वहाँ एक दूसरे को देखता है, सूंघता है, सुनता है, बोलता है, सोचता है, जानता है। लेकिन जहाँ सब कुछ अपने ही आत्मा बन जाता है, वहाँ किससे और कैसे कोई देखे, सूंघे, सुने, बोले, सोचे, जाने? जानने वाले को कौन जाने? जिससे सब जाना जाता है—उस जानने वाले को कैसे जाना जाए? अब बताया जाता है: यह पृथ्वी सभी प्राणियों का मधु है और सभी प्राणी पृथ्वी का मधु हैं। जो तेजस्वी, अमर पुरुष पृथ्वी में है और जो शरीर में है—वही आत्मा है, वही अमर है, वही ब्रह्म है, वही सब है। इसी तरह जल सभी प्राणियों का मधु है और सभी प्राणी जल का मधु हैं। जो तेजस्वी, अमर पुरुष जल में है और जो बीज में है—वही आत्मा है, वही अमर है, वही ब्रह्म है, वही सब है। अग्नि, आकाश, वायु, सूर्य, चंद्रमा, दिशाएँ, बिजली, गर्जन, धर्म, सत्य—इन सभी के भीतर और बाहर वही तेजस्वी, अमर पुरुष है। वही आत्मा है, वही अमर है, वही ब्रह्म है, वही सब है। इस प्रकार, ब्रह्म और आत्मा की अद्वितीयता, उसकी सर्वव्यापकता, और उसके मधुर संबंध को उपनिषद् की इस कथा में विस्तार से बताया गया है।