आइए, मैं आपको ऐतरेय उपनिषद् की प्रथम अध्याय की दिव्य कथा सुनाता हूँ— प्रारंभ में एक प्रार्थना होती है—मेरी वाणी मेरे मन में स्थित हो, और मेरा मन मेरी वाणी में स्थित हो। हे तेजस्वी आत्मा, तू मेरे सामने प्रकट हो; मेरी रक्षा कर, वक्ता की रक्षा कर। तीन बार “शांति” की कामना के साथ यह मंगलाचरण सम्पन्न होता है। अब उपनिषद् की कथा आरंभ होती है: सृष्टि के आरम्भ में केवल आत्मा ही था, और कुछ भी नहीं था। उस आत्मा ने विचार किया—“मैं संसारों की सृष्टि करूँ।” तब उसने विविध लोकों की रचना की—जल (जो स्वर्ग के ऊपर है), ज्योतिरमय लोक (आकाश), मृत्यु लोक (पृथ्वी), और नीचे का जललोक। इन लोकों की रचना के बाद आत्मा ने सोचा—“अब ये लोक तो हैं, पर इनकी रक्षा के लिए रक्षक भी चाहिए।” तब आत्मा ने जल से एक पुरुष को आकार देकर उत्पन्न किया। आत्मा ने उस पुरुष को तप्त किया। तप्त होने पर उसके अंग-प्रत्यंग खुले—सबसे पहले मुख फूटा, जिससे वाणी निकली और वाणी से अग्नि की उत्पत्ति हुई। नासिका से प्राण निकला और प्राण से वायु; नेत्रों से दृष्टि और दृष्टि से सूर्य; कर्णों से श्रवण और श्रवण से दिशाएँ; त्वचा से रोम और रोम से वनस्पति एवं वृक्ष; हृदय से मन और मन से चंद्रमा; नाभि से अपानवायु और अपान से मृत्यु; शिश्न से वीर्य और वीर्य से जल की उत्पत्ति हुई। इन सब देवताओं की रचना के बाद वे सभी एक महान सागर में गिर पड़े। वहाँ भूख और प्यास ने उन्हें घेर लिया। वे देवता आत्मा से बोले—“हमें ऐसा स्थान दो जहाँ हम निवास कर सकें और आहार प्राप्त कर सकें।” आत्मा ने उनके लिए पहले एक गाय बनाई, पर देवताओं ने कहा—“यह पर्याप्त नहीं।” फिर उसने घोड़ा बनाया, परंतु वह भी उन्हें संतुष्ट नहीं कर सका। अंत में आत्मा ने मनुष्य का शरीर प्रस्तुत किया। देवताओं ने प्रसन्न होकर कहा—“बहुत अच्छा, यह उत्तम है!” आत्मा ने देवताओं को आदेश दिया—“अपने-अपने स्थानों में प्रवेश करो।” तब अग्नि वाणी बनकर मुख में प्रविष्ट हुआ, वायु प्राण बनकर नासिका में, सूर्य दृष्टि बनकर नेत्रों में, दिशाएँ श्रवण बनकर कर्णों में, वनस्पति रोम बनकर त्वचा में, चंद्रमा मन बनकर हृदय में, मृत्यु अपान बनकर नाभि में, और जल वीर्य बनकर शिश्न में प्रविष्ट हुए। भूख और प्यास ने भी स्थान माँगा। आत्मा ने कहा—“मैं तुम्हें इन देवताओं के साथ जोड़ता हूँ, तुम इनके भागीदार बनो।” इसलिए जब भी किसी देवता को आहुति दी जाती है, भूख और प्यास भी उसके साथ रहती हैं। इसके बाद आत्मा ने विचार किया—“अब लोक और उनके रक्षक तो हैं, पर इनके लिए आहार भी बनाऊँ।” उसने जल को तप्त किया, और उस तप्त जल से एक रूप प्रकट हुआ—वही आहार (अन्न) है। आत्मा ने उसे वाणी से, प्राण से, दृष्टि से, श्रवण से, स्पर्श से, मन से, शिश्न से पकड़ने का प्रयास किया, पर वह किसी से पकड़ नहीं सका। यदि पकड़ लेता, तो मात्र वाणी, श्वास, दृष्टि, श्रवण, स्पर्श, विचार या उत्सर्जन से ही तृप्त हो जाता। अंत में जब अपानवायु (नीचे की वायु) से पकड़ने का प्रयास किया, तब उसने उसे ग्रहण किया। यही वायु, यही प्राण, आहार को ग्रहण करता है। फिर आत्मा ने सोचा—“यह सब मेरे बिना कैसे रहेगा?” उसने विचार किया—“मैं किस मार्ग से प्रवेश करूँ?” वह सोचता है—“यदि वाणी बोले, प्राण श्वास ले, नेत्र देखें, कान सुनें, त्वचा छुए, मन सोचे, अपान आहार ग्रहण करे, शिश्न वीर्य त्यागे—तो मैं कौन हूँ?” तब उसने इस सीमा को फाड़कर प्रवेश किया। यह द्वार ‘विदृति’—आनंद का द्वार—कहलाता है। उसके तीन निवास हैं, तीन स्वप्न हैं—“यह एक निवास है, यह एक निवास है, यह एक निवास है।” जन्म लेकर उस आत्मा ने सब प्राणियों को देखा और उन्हें नाम दिया। उसने सोचा—“अब मैं और क्या कहूँ?” उसने केवल उस पुरुष, सर्वव्यापी ब्रह्म को देखा और कहा—“यही मेरा साक्षात्कार है।” इसलिए उसे इन्द्र (वास्तव में इदंद्र) कहा जाता है, पर देवता अप्रत्यक्ष रूप में बोलना पसंद करते हैं, इसलिए उसे इन्द्र कहते हैं। फिर यह आत्मा पुरुष के बीज से, जो सारे अंगों का सार है, स्त्री में प्रवेश करता है—वही उसका प्रथम जन्म है। वह बीज स्त्री के अंग का अंग बन जाता है, इसलिए उसे कोई हानि नहीं होती। स्त्री उस आत्मा का पालन-पोषण करती है, जो उसमें आया है। वह स्त्री पालक है, इसलिए उसका भी पालन करना चाहिए। वह गर्भ को धारण करती है; पुरुष गर्भस्थ शिशु का पालन करता है—इस प्रकार, अपने वंश की निरंतरता के लिए, वह आत्मा का पालन करता है। यही उसका दूसरा जन्म है। फिर यह आत्मा शुभ कर्मों में समर्पित हो जाती है। जब दूसरा आत्मा, अपने कर्म पूरे करके, वृद्धावस्था में यहाँ से प्रस्थान करता है, तो वह पुनः जन्म लेता है—यह उसका तीसरा जन्म है। ऋषि वामदेव ने गर्भ में रहते हुए कहा—“मैंने देवताओं के सारे जन्म जान लिए; सौ लोहे के दुर्गों के बंधन में बँधा था, फिर भी बाज की तरह उन्हें भेद डाला।” गर्भ में रहते हुए, वामदेव ने यह कहा था। इस प्रकार, जो इस ज्ञान को जानता है, वह देह का त्याग करके ऊपर उठता है, और उस दिव्य लोक में सभी इच्छाएँ प्राप्त कर अमर हो जाता है, अमर हो जाता है। अब प्रश्न उठता है—यह आत्मा कौन है जिसकी हम उपासना करते हैं? वह कौन है जिससे हम देखते, सुनते, सूँघते, बोलते, सुख-दुःख का अनुभव करते हैं? वही हृदय और मन—विवेक, आज्ञा, ज्ञान, बुद्धि, दृष्टि, स्थिरता, स्मृति, इच्छा, संकल्प, जीवन, नियंत्रण—ये सब चैतन्य के ही नाम हैं। वही ब्रह्म है, वही इन्द्र है, वही प्रजापति है; सारे देवता, पाँच महाभूत—पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, तेज—और जितने भी छोटे-बड़े, मिश्रित पदार्थ हैं; अंडज, जरायुज, स्वेदज, उद्भिज्ज; घोड़े, गाय, मनुष्य, हाथी—जो कुछ भी यहाँ चलता-फिरता, उड़ता या स्थिर है—सब चैतन्य से ही प्रेरित और स्थित है। यह जगत् चैतन्य से ही चलता है, चैतन्य ही इसका आधार है, चैतन्य ही ब्रह्म है। ऐसे ज्ञानी आत्मा से युक्त होकर, जब वह इस लोक को त्यागता है, तब स्वर्ग लोक में पहुँचकर सभी इच्छाओं की प्राप्ति कर, वह अमर हो जाता है, अमर हो जाता है।