आइए, श्रुति के इन गूढ़ सूत्रों की कथा को श्रद्धा और स्पष्टता के साथ सुनें। सृष्टि के मूल में, जो सत्ता है, वही सबका आधार है, वही सबका भरण-पोषण करता है और सबमें अन्न के रूप में प्रवेश करता है। यही कारण है कि उसे 'भूमान' कहा गया है, और उपनिषदों में यह स्पष्ट रूप से सिखाया गया है कि भूमान ही शांत स्वरूप है। धर्म के आधार से भी उसी सत्ता का समर्थन होता है। यही अविनाशी तत्त्व है, क्योंकि वही आकाश तक फैली इस समग्र सृष्टि का आधार है। यह भी सत्य है कि वही सत्ता सबका आदेश देती है, उसी के आदेश से सब चलता है। अन्य किसी तत्त्व की संभावना नहीं है, क्योंकि शास्त्रों में स्पष्ट रूप से भिन्नता का निषेध किया गया है। जब शास्त्रों में देखने और करने की बात आती है, तो वह भी उसी परमात्मा की ओर संकेत करती है। शास्त्रों के आगे के वचनों से यह भी स्पष्ट होता है कि वही अत्यंत सूक्ष्म है। जब 'गमन' और 'वाणी' जैसे शब्द आते हैं, तो वे भी उसी का संकेत देते हैं, क्योंकि ऐसे लक्षण देखे जाते हैं। उसी की महानता के कारण उसका आधारत्व प्रकट होता है, और यह सर्वत्र प्रसिद्ध भी है। यदि कोई कहे कि शास्त्रों में किसी अन्य की ओर संकेत है, तो यह संभव नहीं, क्योंकि आगे के वचनों से तत्त्व का स्वरूप प्रकट होता है। कभी-कभी संदर्भ किसी अन्य प्रयोजन के लिए होता है, न कि उसके स्वरूप के लिए। यदि कोई कहे कि किसी बात का उल्लेख बहुत कम है, तो उसका समाधान पहले ही हो चुका है। अनुकरण और उसके भी अनुकरण के कारण भी वही तत्त्व सिद्ध होता है। इसके साथ-साथ स्मृति में भी यही बात आती है। केवल शब्द से ही तत्त्व का निर्णय हो जाता है। जब हृदय का संदर्भ आता है, तो यह इसलिए है क्योंकि मनुष्यों के लिए ही वह अधिकार है। परंतु बादरायण का मत है कि इससे भी ऊपर सत्ता संभव है। यदि कोई कहे कि इससे कर्मों का विरोध होता है, तो ऐसा नहीं है, क्योंकि विविध प्रकार के प्रयोग देखे जाते हैं। अगर कोई कहे कि यह केवल शब्द है, तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि प्रत्यक्ष और अनुमान से उसके मूल की स्थापना हो जाती है। अतः वह तत्त्व नित्य है। नाम और रूप की समानता के कारण, पुनरावृत्ति में भी कोई विरोध नहीं है, जैसा देखा और स्मरण किया गया है। जैमिनि का मत है कि 'मधु' जैसी स्थितियों में अधिकार नहीं है, क्योंकि वह असंभव है। परंतु ज्योतिष्टोम यज्ञ में उसका अस्तित्व है, इसलिए बादरायण का मत है कि वहाँ अधिकार है। शास्त्रों में चीनी के पिघलने और उपेक्षा के संदर्भ आते हैं, और चीनी के पिघलने से भी यही संकेत मिलता है। क्षत्रिय की स्थिति प्राप्त होने का भी उल्लेख है। इसके बाद चित्ररथ द्वारा संकेत मिलने से भी यही बात सिद्ध होती है। शुद्धि के संदर्भ और अभाव की बात भी शास्त्रों में आती है। जब कोई कार्य निषेध किया जाता है, तो उससे भी उस कर्म का स्वरूप निश्चित होता है। शास्त्रों में श्रवण और अध्ययन का निषेध भी मिलता है, और यह परंपरा से भी प्रमाणित होता है। कभी-कभी कांपने का भी उल्लेख है, और कहीं प्रकाश के देखे जाने का भी। आकाश को भिन्न रूप में और अन्य नामों से संबोधित किया गया है। गहन निद्रा और प्रस्थान के समय भेद का भी उल्लेख है। 'स्वामी' आदि शब्दों से भी वही परम तत्त्व सिद्ध होता है। यदि कोई कहे कि कुछ के लिए अनुमान से भी सिद्ध होता है, तो ऐसा नहीं है, क्योंकि शरीर के उपमा से उसका स्वीकार प्रमाणित है, और शास्त्रों में भी यही दिखाया गया है। इस प्रकार, शास्त्रों के इन सूत्रों के माध्यम से परमात्मा का स्वरूप, उसके गुण, कार्य, और अधिकार का निर्णय बड़े ही सुंदर और गूढ़ ढंग से होता है, और श्रद्धालु साधक को मार्गदर्शन प्राप्त होता है।