जब इस विषय में यह प्रश्न उठता है कि क्या केवल प्रत्यक्ष उपदेश ही मुक्ति का कारण है, तो शास्त्र स्पष्ट करते हैं कि ऐसा नहीं है। उपदेश का जो विधान है, वह केवल उसी क्षेत्र के लिए है, जिनके लिए वह उपयुक्त है—सभी के लिए समान रूप से नहीं। इसके आगे, शास्त्र यह भी बताते हैं कि जीव की स्थिति का वर्णन उस परिवर्तन के साथ किया गया है, जो उसमें होता है। यह परिवर्तन प्रत्यक्ष अनुभव और तर्क—दोनों से प्रमाणित होता है। इसके साथ ही, आनंद की समानता ही इसके चिह्न के रूप में मानी जाती है—यानी उस अवस्था का आनंद, जो मुक्ति में मिलता है, वही इसका संकेत है। अंत में, शास्त्र दृढ़ता से कहते हैं कि वहाँ से लौटना नहीं होता—मुक्ति प्राप्त करने के बाद जीव वापस संसार में नहीं आता, क्योंकि शास्त्रों का यही स्पष्ट वचन है: “वहाँ से कोई लौटता नहीं।