आइए, मैं आपको ब्रह्मसूत्र के इन गूढ़ सूत्रों की कथा एक सुंदर, क्रमबद्ध और भावपूर्ण हिंदी गद्य में सुनाता हूँ। ऋषियों ने जब ब्रह्म के स्वरूप की खोज की, तो उन्होंने देखा कि अंतर्यामी, दैवी सत्ता, यह संसार—इन सब में एक ही परम तत्व के गुणों की प्रतिष्ठा की गई है। लेकिन यह भी स्पष्ट किया गया कि जो परंपरा में वर्णित है, वह वही नहीं है, क्योंकि उसमें वे गुण नहीं माने गए, और वह देहधारी भी है। वास्तव में, दोनों को भिन्न-भिन्न रूप में ही पढ़ा और समझा गया है। फिर यह भी कहा गया कि जिन गुणों जैसे अदृश्यता आदि का उल्लेख हुआ है, वे उसी परम तत्व के हैं। नाम और विशेषण की भिन्नता के कारण, और अन्य दो के लिए यह नहीं कहा जा सकता। साथ ही, रूप के उल्लेख के कारण भी यही निष्कर्ष निकलता है। जब वैश्वानर शब्द का सामान्य रूप में प्रयोग किया गया, तो उसका तात्पर्य भी उसी परम तत्व से है। यदि कोई कहे कि इसका अनुमान स्मृति के आधार पर किया गया है, तो यह स्वीकार्य है। और यदि यह आपत्ति उठाई जाए कि शब्द आदि के द्वारा उसके भीतर स्थित होने के कारण यह संभव नहीं है, तो यह भी सही नहीं है, क्योंकि प्रत्यक्ष अनुभव और शास्त्रीय उपदेश इसके विपरीत प्रमाण देते हैं, और इसे पुरुष के रूप में भी पढ़ा गया है। इसी कारण वह न तो कोई देवता है, न ही कोई तत्त्व (भूत)। भले ही प्रत्यक्ष रूप से हो, इसमें कोई विरोध नहीं है—ऐसा जैमिनि ऋषि कहते हैं। आश्मरथ्य ऋषि के अनुसार, यह प्रकट होने के कारण है। बादरि ऋषि स्मृति के कारण इसका समर्थन करते हैं। जैमिनि फिर कहते हैं कि प्राप्ति के कारण भी यही सत्य है, क्योंकि ऐसा ही दर्शाया गया है। और इस संदर्भ में सभी मुनि उसी की घोषणा करते हैं। अब आगे, वह परम तत्व स्वर्ग और पृथ्वी का आधार है, क्योंकि उसके लिए स्वयं का विशेष नाम प्रयुक्त हुआ है। और मुक्त आत्माएँ भी उसी की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करती हैं—इसका उल्लेख भी किया गया है। यह केवल अनुमान से नहीं जाना जा सकता, क्योंकि शब्द का प्रयोग लागू नहीं होता और वह प्राण का भी आधार है। भिन्नता के उल्लेख के कारण भी यही निष्कर्ष निकलता है। प्रसंग के अनुसार भी वही तात्पर्य है। साथ ही, उसके पालन-पोषण और भक्षण (भरण-पोषण) के कारण भी यही सिद्ध होता है। भूमान, अर्थात् पूर्णता, उसी परम शांति स्वरूप से अभिन्न रूप से सिखाई गई है। धर्म से भी उसका समर्थन होता है। वह अविनाशी है, क्योंकि वह आकाश तक फैले विस्तार का आधार है। और यह इसलिए भी है क्योंकि वही सबका नियंत्रण करता है। अन्य किसी भिन्नता का निषेध भी किया गया है। देखने और करने की शक्ति के उल्लेख के कारण भी वही परमात्मा है। वह अति सूक्ष्म है, जैसा कि आगे के शास्त्र वचन बताते हैं। ‘गमन’ और ‘वाणी’ जैसे शब्दों के कारण भी, यही संकेत मिलता है। और उसके आधार के कारण, उसकी महानता को इसमें अनुभव किया जा सकता है। यह तथ्य भी प्रसिद्ध है। यदि कोई कहे कि ‘क्योंकि दूसरे का उल्लेख हुआ है’, तो वह संभव नहीं है। यदि यह बाद में है, तो उसकी सच्ची प्रकृति प्रकट होती है। और जो उल्लेख है, वह किसी अन्य प्रयोजन के लिए है। यदि कोई कहे कि ‘कम उल्लेख के कारण’, तो वह पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है। अनुकरण के कारण, और उस अनुकरण का भी, यही तात्पर्य है। इसके अतिरिक्त, स्मृति में भी इसका उल्लेख मिलता है। वास्तव में, केवल शब्द से ही इसका निर्धारण हो जाता है। परंतु जब हृदय का संदर्भ आता है, तो इसका अधिकार मानव के लिए ही है। और इससे भी ऊपर, बादरायण ऋषि कहते हैं, क्योंकि यह संभव है। इस प्रकार, ब्रह्मसूत्र के इन सूत्रों में ऋषियों ने परमात्मा के स्वरूप और उसकी प्राप्ति के मार्ग को विभिन्न दृष्टिकोणों से स्पष्ट किया, और अंततः एक ही सत्य—परब्रह्म—की प्रतिष्ठा की।