आइए अब ब्रह्मसूत्र के इन सूत्रों की शृंखला को एक सुसंगत कथा के रूप में समझें, जिसमें साधना, शास्त्र, विधि और उनके गूढ़ अर्थों का विस्तार से विवेचन किया गया है। शास्त्र में यह देखा गया है कि किसी विशेष साधना या अभ्यास का निरंतर पालन किया जाता है। यह केवल परंपरा से नहीं, बल्कि शास्त्रों में भी उसका स्पष्ट उल्लेख मिलता है। अभ्यास की शुरुआत और उसकी बार-बार पुनरावृत्ति से भी उसकी महत्ता सिद्ध होती है। जो साधक उस विशेष स्थिति में पहुँच चुका है, उसके लिए भी शास्त्रों में विधि का निर्देश दिया गया है। साथ ही, कुछ सीमाएँ भी निर्धारित की गई हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि हर कोई स्वतःस्फूर्त रूप से इनका पालन नहीं कर सकता, बल्कि शास्त्रीय मर्यादा आवश्यक है। बादरायण के मतानुसार, श्रेष्ठता की शिक्षा दी गई है, क्योंकि इसका प्रत्यक्ष प्रमाण भी मिलता है। हालांकि, कुछ स्थानों पर अभ्यास की समानता भी दिखाई देती है, परंतु यह सर्वत्र नहीं है; हर जगह समान नियम लागू नहीं होते। भेद उसी प्रकार है जैसे सैकड़ों में भिन्नता होती है। उदाहरण के लिए, किसी ने केवल अध्ययन किया है, तो उसमें और अन्य में अंतर है, किंतु कहीं-कहीं कोई भेद नहीं भी पाया जाता। यह भिन्नता कभी प्रशंसा के लिए होती है, तो कभी केवल अनुमति देने के लिए। कुछ आचार्य मानते हैं कि साधक अपनी इच्छा से भी इनका पालन कर सकता है, वहीं कुछ स्थानों पर दमन या नियंत्रण की बात भी कही गई है। जिनमें प्राणों की ऊर्ध्वगति है, उनके लिए भी शास्त्रों में विशिष्ट निर्देश मिलते हैं। जैमिनि का मत है कि जब तक विधि न हो, तब तक संपर्क नहीं होना चाहिए, क्योंकि वहाँ कोई शास्त्रीय आज्ञा नहीं है। लेकिन बादरायण मानते हैं कि जहाँ शास्त्रों में समान कथन है, वहाँ वह कृत्य करना चाहिए। या फिर, जैसा कि धारण के विषय में कहा गया है, वहाँ विधि का होना भी संभव है। यदि कोई कहे कि यह केवल प्रशंसा के लिए कहा गया है, क्योंकि वह अन्य बातों के साथ सम्मिलित है, तो यह उचित नहीं, क्योंकि यह पहले कभी नहीं कहा गया था। साथ ही, वहाँ अस्तित्व को सूचित करने वाला शब्द भी प्रयुक्त है। यदि अर्थ के मिश्रित होने की बात कही जाए, तो वह भी उचित नहीं, क्योंकि वहाँ स्पष्ट रूप से उसका उल्लेख किया गया है। और, एक ही वाक्य में संबंध होने के कारण भी ऐसा ही है। इसलिए, यहाँ अग्नि, ईंधन आदि पर निर्भरता नहीं है। लेकिन, यज्ञ के उदाहरण में जैसे घोड़े का उल्लेख हुआ है, उसी प्रकार सब पर निर्भरता भी बताई गई है। साधक को शांति, आत्मसंयम आदि से युक्त होना चाहिए; फिर भी, क्योंकि ये सहायक रूप में निर्धारित किए गए हैं, अतः इनका भी अनिवार्य रूप से पालन करना चाहिए। सभी के लिए अनुमति नहीं है, केवल प्राण संकट की स्थिति में ही छूट दी गई है, जैसा कि देखा गया है। साथ ही, कोई निषेध भी नहीं है। परंपरा में भी इसका स्मरण किया गया है। और, शास्त्रों में भी ऐसे कर्मों का अधिकार बताया गया है जो इच्छा से प्रेरित नहीं हैं। जीवन के आश्रमों के कर्तव्यों का भी अनिवार्य रूप से पालन करने का निर्देश मिलता है। सहयोग के कारण भी ऐसा ही कहा गया है। हर प्रकार से, केवल वही, क्योंकि दोनों पक्षों से संकेत मिलता है। यह भी दिखाता है कि कोई एक दूसरे पर हावी नहीं होता। साथ ही, मध्यवर्ती समय में भी ऐसा ही देखा गया है। परंपरा में भी इसका स्मरण मिलता है और एक विशेष अनुग्रह की बात भी कही गई है। इसलिए, दूसरे का श्रेष्ठ होना चिह्नों के कारण स्वीकार किया गया है। परंतु जो उस अवस्था को प्राप्त कर चुका है, उसके लिए उसकी अनुपस्थिति नहीं होती; जैमिनि भी यही मानते हैं, क्योंकि नियम है और उस रूप का अभाव भी है। और, जो अधिकारी है, उसके लिए भी ऐसा नहीं है, क्योंकि पतन की संभावना का अनुमान करना उचित नहीं है। कुछ आचार्य कहते हैं कि पूर्व में किए गए कर्मों के साथ भी ऐसा ही है, जैसा कि भोजन के संदर्भ में कहा गया है। इस प्रकार, शास्त्रों के इन सूत्रों में साधना, विधि, अनुशासन, अनुमति और श्रेष्ठता के गूढ़ रहस्यों का विवेचन किया गया है, जिससे साधक को मार्गदर्शन मिलता है कि किस प्रकार अभ्यास, शास्त्र, और जीवन के विभिन्न आश्रमों के कर्तव्यों का पालन करते हुए वह अपने लक्ष्य की ओर बढ़ सकता है।