आइए, ब्रह्मसूत्र के इन गूढ़ सूत्रों की एक सजीव कथा के रूप में यात्रा करें। जब किसी विषय में प्रश्न उठता है कि क्या केवल संबंध के कारण ही कोई बात निश्चित मानी जाए, तो उत्तर मिलता है कि हाँ, ऐसा हो सकता है, क्योंकि वहाँ विशेषता का भी निर्देश है। फिर यह विचार आता है कि जब कोई परिणाम या कार्य पहले ही ग्रंथों में वर्णित है, तो वह कोई नई बात नहीं है; वह पहले से ही स्थापित है। इसी प्रकार, जब कोई भेद नहीं है, तो वह वस्तु वही रहती है, उसमें कोई नवीनता नहीं आती। यह संबंध अन्य स्थानों पर भी इसी प्रकार लागू होता है। फिर कभी-कभी ऐसा भी हो सकता है कि भिन्नता के कारण संबंध न स्थापित हो; यह भी शास्त्रों में दिखाया गया है। जब किसी विषय में संग्रह और व्यापकता का निर्देश मिलता है, तो वहाँ भी यही सिद्धांत लागू होता है। जैसे जब पुरुष (पुरुष-उपासना) का ध्यान किया जाता है और अन्य बातों का भी उल्लेख होता है, तो उनसे भी यही तात्पर्य निकलता है। पर जब अर्थ में भिन्नता होती है, जैसे सृष्टिकर्ता से आरंभ होने वाले विचारों में, तब वह भिन्नता महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि कभी किसी अंग या सामग्री का उल्लेख न हो, और केवल ‘उपायन’ शब्द रह जाए, तो कुशा और छंद आदि केवल स्तुति या गीत के समान माने जाते हैं, जैसा पहले कहा गया है। जब श्राद्ध-क्रिया की बात आती है, तो वहाँ पारगमन (अर्थात आगे बढ़ना) नहीं होता; अन्य आचार्य भी यही मत रखते हैं। कभी-कभी इच्छा के अनुसार भी कार्य किया जा सकता है, क्योंकि दोनों ही स्थितियों में कोई विरोधाभास नहीं है। दोनों मार्गों से उद्देश्य की सिद्धि हो जाती है, अन्यथा विरोध उत्पन्न होता। यह उचित है, क्योंकि जिस विशेष उद्देश्य की प्राप्ति होनी चाहिए, वह सामान्य जीवन में भी इसी प्रकार होती है। यज्ञ के कर्ताओं का कार्य तब तक चलता है, जब तक उनकी नियुक्ति बनी रहती है। सभी के लिए कोई विशेष बंधन नहीं है, और शास्त्र तथा तर्क दोनों से कोई विरोधाभास नहीं होता। लेकिन जो अविनाशी (अक्षर) का ध्यान करते हैं, उनके लिए कुछ विशेष नियम हैं, क्योंकि वहाँ सामान्य और विशेष दोनों प्रकार के विधान हैं, जैसे उपर्युक्त कर्मों में होता है। यह सब मनन करने पर स्पष्ट होता है। यदि कोई कहे कि पंचमहाभूतों के समूह की तरह, मध्यकाल में आत्मा का कोई विशेष भेद नहीं रह जाता, तो ऐसा नहीं है, क्योंकि शास्त्र स्पष्ट रूप से उसका निर्देश करते हैं। कभी-कभी अदम्य (हीन) वस्तुओं की तरह अदल-बदल की भी घोषणा की जाती है। परंतु सत्य आदि गुण वही रहते हैं, उनमें कोई भेद नहीं आता। इच्छा आदि (काम, क्रोध आदि) यहाँ और वहाँ, इंद्रियों आदि से उत्पन्न होते हैं। कभी-कभी श्रद्धा के कारण त्याग भी किया जाता है। जब कोई वस्तु उपस्थित हो, तो उसका उल्लेख भी शास्त्रों में मिलता है। किसी एक निश्चित नियम का निर्धारण नहीं है, क्योंकि जैसा देखा जाता है, वैसे ही फल मिल जाता है; पृथकता से भी फल में बाधा नहीं आती। यह ठीक वैसे ही है, जैसे दान के मामले में कहा गया है। जहाँ संकेत प्रधान होता है, वहाँ वही अधिक प्रभावशाली होता है, चाहे वह कोई भी हो। कभी-कभी पूर्ववर्ती विकल्प संदर्भ से उत्पन्न होते हैं, जैसा कि किसी कार्य के आरंभ में होता है। और कभी यह विस्तार के कारण भी होता है। परंतु अंततः, यह केवल ज्ञान ही है, जो निश्चितता देता है, जैसा कि देखा भी जाता है। और जब शास्त्र का कथन प्रबल होता है, तब कोई विरोधाभास नहीं रहता। संबंध आदि के कारण, और जैसा अन्य प्रकार के ज्ञान में भेद देखा जाता है, यह बात पहले भी कही जा चुकी है। केवल सामान्यता से भी विरोध नहीं होता, क्योंकि प्रत्यक्ष अनुभव होता है, जैसे मृत्यु के प्रसंग में; संसार में इसका कोई विरोध नहीं है। और क्योंकि बाद के भाग में शब्द अधिक प्रधान होता है, वहाँ संबंध लागू होता है। शरीर में एक ही आत्मा का अस्तित्व है, इसी से भेद उत्पन्न होता है, न कि प्रत्यक्ष अनुभव की तरह। परंतु जो अंगों से जुड़े हैं, वे शाखाओं में नहीं होते, यह सभी वेदों में कहा गया है। इसमें कोई विरोध नहीं है, जैसे मंत्र आदि के मामले में भी विरोध नहीं होता। महत्ता के कारण, वह श्रेष्ठ है, जैसे कोई यज्ञ; ग्रंथ भी यही दिखाते हैं। और शब्दों आदि की विविधता के कारण भी भिन्नता आती है। इस प्रकार, शास्त्रों के इन सूत्रों में संबंध, भेद, नियम, ज्ञान और उद्देश्य की विविध स्थितियों का गूढ़ विवेचन किया गया है, जो साधक को उचित मार्गदर्शन प्रदान करता है।