आइए, इन गूढ़ सूत्रों की कथा को श्रद्धापूर्वक, क्रमबद्ध और सहज भाषा में सुनें— शास्त्र में यह कहा गया है कि कभी-कभी, यदि हम उलटे क्रम से भी विचार करें, तो भी अनुक्रम उचित ही रहता है। यदि कोई यह कहे कि चैतन्य और मन के बीच क्रम में कोई मध्यवर्ती स्थिति है, क्योंकि कोई संकेत मिलता है—तो यह सही नहीं है, क्योंकि उनमें कोई वास्तविक भेद नहीं है। फिर यह भी विचार किया गया कि चल और अचल, इन दोनों के आधार पर कोई भिन्नता मानी जाए; परंतु वह नाम केवल प्रतीकात्मक है, क्योंकि वह उनकी उपस्थिति या अनुपस्थिति पर निर्भर करता है। आत्मा की उत्पत्ति नहीं होती, क्योंकि शास्त्र उसे नित्य बताता है, अन्य वस्तुओं के विपरीत। इसीलिए जानने वाला, अर्थात आत्मा, ऐसा ही है। जीव के प्रस्थान, गमन और पुनरागमन—इन सबका संबंध भी आत्मा से ही है। और इनमें से गमन और पुनरागमन—इन दोनों में, जीव अपने ही स्वरूप से यह करता है। यदि कोई कहे कि सूक्ष्म देह नहीं, क्योंकि किसी शास्त्र में ऐसा कहा गया है, तो यह भी उचित नहीं, क्योंकि अन्य संदर्भ लागू होते हैं। यह भी कहा गया है कि अपने नाम और माप से भी भेद किया जाता है। इसमें कोई विरोध नहीं है, जैसे चंदन में सुगंध होती है, वैसे ही। यदि कोई कहे कि अवस्था के भेद से भिन्नता है, तो वह भी उचित नहीं, क्योंकि स्वीकार नहीं होता—क्योंकि आत्मा हृदय में ही स्थित है। या, गुणों के कारण भेद समझा जाए, जैसा संसार में होता है। भेद भी वैसे ही है, जैसे सुगंध में; इस प्रकार यह स्पष्ट किया गया है। क्योंकि शास्त्र में पृथक उपदेश भी दिया गया है। परंतु, गुणों की सारता के कारण, नामकरण ऐसे ही होता है, जैसे विद्वानों के लिए। और, जब तक आत्मा में गुण विद्यमान हैं, तब तक कोई दोष नहीं, क्योंकि यह देखा गया है। जैसे पुरुषत्व आदि के साथ होता है, वैसे ही; परंतु इस विद्यमान के लिए, अभिव्यक्ति के संबंध के कारण। अन्यथा, यदि निरंतर दर्शन या अदर्शन का परिणाम हो, तो एक ही पक्ष पर प्रतिबंध हो जाएगा। कर्ता वही है, क्योंकि शास्त्र का अर्थ यही है। और, ग्रहण और प्रस्थान की भी शास्त्र में चर्चा है। और, क्रिया में नामकरण के कारण; यदि ऐसा न हो, तो उपदेश का उल्टा अर्थ हो जाएगा। जैसे प्रत्यक्ष ज्ञान में कोई प्रतिबंध नहीं है। शक्ति के भ्रम की संभावना के कारण भी यह उचित है। और क्योंकि पूर्ण लय नहीं होती। और जैसे बढ़ई दोनों प्रकार से कार्य करता है, वैसे ही। परंतु परमात्मा से ही सब होता है, क्योंकि शास्त्र ऐसा कहता है। परंतु यह तभी संभव है जब प्रयत्न किया जाए; अन्यथा, जो विधान और निषेध बताए गए हैं, वे व्यर्थ हो जाएंगे। आत्मा एक अंश है, विभिन्न नामों के कारण; और कुछ आचार्य इसे एक नौकर या जुआरी के समान भी बताते हैं। मंत्र के शब्दों से भी यह प्रमाणित होता है। और यह स्मृति में भी आया है। परंतु परमात्मा के लिए ऐसा नहीं है, जैसे प्रकाश आदि के लिए नहीं होता। और ज्ञानी भी इसे इसी प्रकार स्मरण करते हैं। अनुज्ञा और निषेध शरीर के संबंध से उत्पन्न होते हैं, जैसे प्रकाश आदि के साथ होता है। और जो सतत नहीं है, उसमें कोई मिश्रण नहीं होता। और वह केवल एक आभास है। अदृश्य के विषय में कोई निश्चित नियम नहीं है। और संकल्प आदि के विषय में भी यही बात लागू होती है। यदि कोई कहे कि स्थान के भेद के कारण भिन्नता है, तो ऐसा नहीं है, क्योंकि वह भीतर ही सम्मिलित है। इसी प्रकार प्राण भी हैं। क्योंकि मुख्य अर्थ संभव नहीं, और शास्त्र ने पूर्व में भी यही कहा है। इस प्रकार, शास्त्र के इन गूढ़ सूत्रों के अनुसार, आत्मा, मन, चैतन्य, शरीर, प्राण और परमात्मा के संबंध में जो भेद, उपदेश, और नामकरण बताया गया है, वह सब क्रमबद्ध और तर्कसंगत है—और इन सबका मर्म शास्त्र और परंपरा में प्रतिपादित है।