आइए, इन महत्त्वपूर्ण सूत्रों की गूढ़ बातों को एक सुगम कथा के रूप में समझते हैं। आदि में, यह प्रश्न उठता है कि क्या आत्मा भी किसी साधन (इंद्रिय आदि) के समान है? इस पर शास्त्र कहता है—नहीं, आत्मा साधन जैसी नहीं है, क्योंकि आत्मा भोग आदि का अनुभव करती है, जबकि साधन केवल उपकरण मात्र हैं। यदि आत्मा साधन जैसी मानी जाए, तो उसमें सीमितता आ जाएगी या सर्वज्ञता का अभाव हो जाएगा, क्योंकि साधन सीमित होते हैं। और फिर, आत्मा का उत्पन्न होना असंभव है, क्योंकि आत्मा अनादि और नित्य है, जबकि साधनों की उत्पत्ति होती है। साथ ही, साधन कभी भी कर्ता नहीं होते, वे केवल सहायक होते हैं। यदि कहा जाए कि आत्मा में ज्ञान आदि की क्रिया होती है, तो भी इसका निषेध नहीं है, परंतु आत्मा और साधनों में परस्पर विरोधाभास है, इसलिए आत्मा साधन के समान नहीं हो सकती। फिर चर्चा आती है कि क्या आत्मा आकाश से उत्पन्न होती है? शास्त्र कहता है—नहीं, क्योंकि ऐसा कहीं श्रुति में नहीं सुना गया। लेकिन आकाश का अस्तित्व अवश्य है। शब्द और उसके गौण अर्थ के कारण, आकाश के अस्तित्व को स्वीकार किया जाता है, जैसे 'ब्रह्म' शब्द से ब्रह्म का बोध होता है। इसमें कोई विरोधाभास नहीं है, क्योंकि आकाश और ब्रह्म में कोई पृथकता नहीं मानी गई है; शब्द के द्वारा ही उनका भेद प्रकट होता है। परंतु यह भेद केवल विकार (परिवर्तन) के समय तक ही रहता है, जैसे संसार में अन्य चीज़ों के साथ होता है। इसी प्रकार वायु के विषय में भी यही तर्क लागू होता है। किन्तु कुछ तत्त्वों के लिए यह असंभव है, क्योंकि वहाँ अस्तित्व का मेल नहीं बैठता। इसलिए, शास्त्र कहता है—आग, जल और पृथ्वी की उत्पत्ति भी इसी क्रम में होती है। ये क्रम संदर्भ के अनुसार अन्य शब्दों से भी समझे जाते हैं। परंतु ध्यान केवल उसी पर केंद्रित होता है, जिसके लिए कोई संकेत मिलता है। यदि कोई उल्टे क्रम का विचार करे, तो भी सुसंगतता बनी रहती है। यदि कोई कहे कि चित्त और मन के कारण क्रम में मध्यवर्ती स्थिति होनी चाहिए, तो शास्त्र कहता है—ऐसा नहीं है, क्योंकि इनमें कोई भेद नहीं है। हाँ, चर और अचर के आधार पर नामकरण किया जाता है, और यह नामकरण केवल उनकी उपस्थिति या अनुपस्थिति के कारण है। आत्मा की उत्पत्ति नहीं होती, क्योंकि शास्त्र और उसकी नित्यता इस बात की पुष्टि करते हैं; आत्मा अन्य तत्त्वों के समान नहीं है। इसलिए, आत्मा ही ज्ञाता है। जब आत्मा देह का त्याग करती है, गमन करती है या लौटती है, तो ये सब उसकी ही क्रियाएँ हैं। विशेषकर गमन और प्रत्यागमन आत्मा के अपने स्वरूप से होते हैं। यदि कोई कहे कि 'सूक्ष्म' का अर्थ यहाँ नहीं है, क्योंकि शास्त्र में ऐसा कहा गया है, तो भी यह आपत्ति नहीं है, क्योंकि संदर्भ बदल जाता है। आत्मा का अपना नाम और उसकी माप से भी यही बात सिद्ध होती है। इसमें कोई विरोध नहीं है, जैसे चंदन में सुगंध का होना स्वाभाविक है। यदि कोई कहे कि भिन्न-भिन्न अवस्थाओं के कारण आत्मा में भेद है, तो ऐसा नहीं है, क्योंकि आत्मा का निवास हृदय में ही स्वीकार किया गया है। या, गुणों के कारण भेद माना जाए, तो यह भी संसार में सामान्य है। सुगंध के भेद की तरह ही आत्मा में भी भिन्नता दिखती है—यह शास्त्र में स्पष्ट किया गया है। पृथक-पृथक उपदेशों से भी यह बात जानी जाती है। लेकिन आत्मा के गुणों के कारण उसका नामकरण वैसे ही होता है, जैसे ज्ञानी पुरुष का नामकरण उसके गुणों के अनुसार होता है। और जब तक आत्मा में वे गुण विद्यमान हैं, तब तक उसका नामकरण भी वैसा ही रहता है—यह संसार में देखा जाता है। जैसे पुरुषत्व आदि के साथ संबद्धता के कारण विशेषण होते हैं, वैसे ही आत्मा के अस्तित्व के कारण भी नामकरण होता है, क्योंकि उसका संबंध प्रकट रूप से होता है। यदि ऐसा न मानें, तो निरंतर अनुभव या अननुभव की समस्या आ जाएगी, या एक ही पक्ष में सीमितता आ जाएगी। आत्मा ही कर्ता है, क्योंकि शास्त्र का यही तात्पर्य है। और शास्त्र में आत्मा के ग्रहण और गमन का उल्लेख भी है, जिससे यह बात और पुष्ट होती है। इस प्रकार, इन सूत्रों के माध्यम से शास्त्र आत्मा, उसके गुण, उसकी नित्यता, और उसके कार्यों का रहस्य भली-भांति स्पष्ट करता है।