सुनिए, एक गूढ़ संवाद की कथा, जो उपनिषदों और ब्रह्मसूत्रों के गहरे प्रश्नों और उत्तरों के रूप में प्रकट होती है। मुनि कहते हैं: "अस्तित्व का अभाव नहीं है, क्योंकि हम उसे प्रत्यक्ष रूप से अनुभव करते हैं। यह स्वप्न की भांति नहीं है, क्योंकि उसकी प्रकृति भिन्न है। परंतु, कहीं-कहीं अस्तित्व का भी अभाव है, क्योंकि वह अनुभव में नहीं आता। और यह किसी भी प्रकार से तर्कसंगत नहीं ठहरता। एक में भी यह संभव नहीं, क्योंकि वह असंभव है। इस प्रकार आत्मा की सर्वव्यापकता सिद्ध होती है। आगे वे बताते हैं कि उत्तराधिकार या क्रम के कारण भी विरोध नहीं मिटता, क्योंकि रूपांतरण आदि होते रहते हैं। और जब अंतिम अवस्था में दोनों ही शाश्वत हैं, तो उनमें कोई भेद नहीं रहता। यह भी भगवान के लिए उपयुक्त नहीं है। और क्योंकि आधार भी तर्कसंगत नहीं है। यदि आत्मा को उपकरण के समान मानें, तो यह भी उचित नहीं, क्योंकि अनुभव आदि के कारण। इससे या तो आत्मा की सीमितता या सर्वज्ञता का अभाव होगा। और उत्पत्ति भी असंभव है। और उपकरण कर्ता नहीं होता। यदि ज्ञान आदि की बात हो, तो उसका भी निषेध नहीं है। परस्पर विरोध के कारण भी यह संभव नहीं। फिर, आकाश से उत्पत्ति नहीं है, क्योंकि ऐसा कहीं सुना नहीं गया। लेकिन उसका अस्तित्व है। शब्द और उसके गौण अर्थ से भी यह संभव है। और एक के लिए, यह 'ब्रह्म' शब्द के समान है। नियम का उल्लंघन नहीं होता, क्योंकि कोई पृथक्करण नहीं है। यह शब्दों से ही जाना जाता है। फिर वे कहते हैं, जब तक विकार है, भेद बना रहता है, जैसे संसार में होता है। इसी से वायु का भी स्पष्टीकरण होता है। परंतु, कहीं-कहीं असंभवता है, क्योंकि अस्तित्व उस पर लागू नहीं होता। इसलिए अग्नि की उत्पत्ति मानी जाती है, ऐसा कहा गया है। फिर जल की, फिर पृथ्वी की। अन्य शब्दों से प्रसंग का स्वरूप भी जाना जाता है। लेकिन केवल उस पर ध्यान करने से, संकेत के कारण, यह जाना जाता है। और यदि उलटे क्रम में सोचें, तो भी वह उपयुक्त है। यदि कोई कहे कि चैतन्य और मन क्रम में मध्यस्थ हैं, तो ऐसा नहीं है, क्योंकि उनमें कोई भेद नहीं है। यह चल और अचल पर आधारित हो सकता है; नामकरण प्रतीकात्मक है, क्योंकि यह उनके होने या न होने से उत्पन्न होता है। आत्मा उत्पन्न नहीं होती, क्योंकि शास्त्र यही कहते हैं और वह शाश्वत है, अन्य तत्वों की भांति नहीं। इसलिए ज्ञाता भी वैसा ही है। प्रस्थान, गमन और पुनरागमन—ये तीन अवस्थाएँ हैं। और अंतिम दो में, आत्मा स्वयं ही कारण है। यदि कोई तर्क करे कि 'सूक्ष्म शरीर नहीं, क्योंकि शास्त्र में ऐसा कहा गया है', तो ऐसा नहीं है, क्योंकि अन्य प्रसंग लागू होते हैं। अपने नाम और माप से भी यह जाना जाता है। इसमें कोई विरोध नहीं, जैसे चंदन के वृक्ष में होता है। इस प्रकार, उपनिषदों की यह कथा हमें सत्य के गूढ़ रहस्यों की ओर ले जाती है, जहाँ आत्मा की सर्वव्यापकता, उसकी शाश्वतता और तत्वों की उत्पत्ति के रहस्य, प्रेमपूर्वक और तर्कपूर्वक प्रकट होते हैं।