इन शास्त्र वाक्यों के क्रम में, ब्रह्मसूत्रकार यह स्पष्ट करते हैं कि जब एक मत की व्याख्या हो जाती है, तो अन्य शेष मतों का भी स्वीकार और स्पष्टीकरण इसी से हो जाता है। यदि अनुभवकर्ता का अभाव केवल अविवेक के कारण माना जाए, तो वह संसार की तरह ही हो जाएगा—अर्थात्, उसमें भी विविधता और अनुभव की संभावना बनी रहेगी। फिर, यह बताया जाता है कि वस्तुओं का अभेद शब्दों जैसे "उत्पत्ति" आदि से सिद्ध होता है। अनुभव केवल उपस्थिति में ही होता है, अतः जब तक कोई वस्तु विद्यमान है, तब तक उसका अनुभव संभव है। अन्य वस्तु का अस्तित्व भी इसी प्रकार सिद्ध है। यदि कोई आपत्ति करे कि उसे "अस्तित्वहीन" कहा गया है, तो ऐसा नहीं है, क्योंकि शेष वाक्य और अन्य शब्दों द्वारा अन्य गुणों की भी सूचना दी जाती है। यह प्रक्रिया वस्त्र की तरह है—जैसे कपड़े में धागे का संबंध होता है, वैसे ही अन्य वस्तुओं में भी संबंध पाया जाता है। श्वास आदि के उदाहरण से भी यही सिद्ध होता है। जब किसी वस्तु को "अन्य" कहा जाता है, तो उसमें कर्म की असंभवता जैसी दोष उत्पन्न हो जाती है। फिर भी, कुछ अतिरिक्त है, क्योंकि भेद की स्पष्टता बताई गई है। पत्थर आदि के उदाहरण से स्पष्ट होता है कि वह संभव नहीं है। यदि कोई आपत्ति करे कि संसार का विलय देखा जाता है, तो ऐसा नहीं है, क्योंकि यह दूध के विलय की भांति है—दूध जब अन्य वस्तु में विलीन होता है, तो उसका स्वरूप बदलता है, परंतु उसका अस्तित्व बना रहता है। देवताओं आदि के उदाहरण से यह सिद्ध होता है कि संसार में भी यही प्रक्रिया है। यदि सब कुछ एक ही हो जाए, तो या तो अति विस्तार हो जाएगा, या फिर "अविभाज्य" होने के शास्त्र वाक्य का विरोध होगा। परंतु शास्त्र से ही इसका स्रोत शब्द (श्रुति) है, अतः प्रमाण वही है। आत्मा में विविध गुणों का पाया जाना भी इसी प्रकार है। विरोधी मत में दोष स्पष्ट है। और देखा जाता है कि सभी गुणों की संभावना आत्मा में है। यदि कोई कहे कि आत्मा निर्अंग है, तो इसका उत्तर पहले ही दिया जा चुका है। यह नहीं माना जा सकता कि उद्देश्य नहीं है, क्योंकि सृजन का कोई प्रयोजन है। संसार में भी, रचना केवल लीला के लिए होती है। यह पक्षपात या क्रूरता के कारण नहीं है, क्योंकि यह अन्य कारकों पर निर्भर करता है—जैसा कि शास्त्र में कहा गया है। यदि कोई कहे कि कर्मों का वितरण नहीं होता, तो उत्तर है: क्योंकि कर्मों का कोई आदि नहीं है, यह उचित है और देखा भी जाता है। सभी गुणों की संभावना पाई जाती है। फिर, व्यवस्था की असंभवता के कारण अनुमान भी मान्य नहीं है, न ही कोई क्रिया संभव है। यदि कोई कहे कि दूध और पानी की तरह है, तो वहां भी आपत्ति बनी रहती है। पृथक्करण सिद्ध नहीं है, और कोई निर्भरता भी नहीं है। अन्यत्र ऐसा उदाहरण नहीं मिलता, अतः यह घास आदि की तरह नहीं है। यदि कोई कहे कि मनुष्य और पत्थर की तरह है, तो वहां भी आपत्ति बनी रहती है। प्रधानता का संबंध भी असंभव है। अनुमान में भी ज्ञान की शक्ति का अभाव है। यदि मान भी लिया जाए, तब भी वस्तु का अस्तित्व नहीं है। विरोध के कारण यह तर्कसंगत नहीं है। या, जैसे बड़ा और लंबा, छोटा और छोटा—इन दोनों में भी कोई क्रिया नहीं है, अतः उसकी अनुपस्थिति है। आश्रय के स्वीकार के कारण, समानता के कारण, कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकलता। अस्तित्व वास्तव में शाश्वत है। रूप आदि के धारक होने के कारण, विपरीत परिणाम भी देखा जाता है। दोनों ही पक्षों में दोष है। और पूर्ण अभाव के कारण, पूर्ण स्वतंत्रता है। इस प्रकार, ब्रह्मसूत्रकार ने विविध आपत्तियों, उदाहरणों और शास्त्र प्रमाणों के माध्यम से आत्मा, ब्रह्म और संसार के संबंध में गहन विवेचना की है, और सिद्ध किया है कि शास्त्र के अनुसार आत्मा शाश्वत, स्वतंत्र, और विविध गुणों से युक्त है; विरोधी मतों में दोष हैं, और अंतिम सत्य वही है जो शास्त्र द्वारा प्रमाणित है।