आइए, ब्रह्मसूत्र के इन गूढ़ सूत्रों के आधार पर एक सुसंगत कथा के रूप में उनके अर्थ को समझते हैं। इन सूत्रों के अनुसार, पहले यह स्पष्ट किया गया है कि योग के संबंध में भी शंका का समाधान हो जाता है। परंतु तुरंत यह आपत्ति उठाई जाती है कि ऐसा नहीं है, क्योंकि योग की प्रकृति भिन्न है, और शब्दों से भी इसका भिन्न होना स्पष्ट होता है। आगे कहा गया कि एकरूपता की संज्ञा केवल भेद के कारण ही दी जाती है—यदि भेद न हो, तो यह पहचान ही संभव नहीं। लेकिन, यह भी देखा जाता है कि कुछ भेद प्रत्यक्ष अनुभव में आते हैं। यदि कोई यह कहे कि कुछ का अस्तित्व नहीं है, तो यह भी स्वीकार्य नहीं, क्योंकि यह केवल निषेध है, वास्तविकता नहीं। यदि भोजन के उदाहरण से समझाया जाए, तो वही समस्या उत्पन्न होगी—जो तर्कसंगत नहीं है। अतः, यह भी मान्य नहीं, क्योंकि ऐसा कोई उपयुक्त उदाहरण नहीं मिलता। इसके अलावा, प्रतिपक्षी के अपने मत में भी दोष पाए जाते हैं। साथ ही, तर्क का कोई ठोस आधार नहीं है। यदि कोई अन्य प्रकार से अनुमान लगाए, तो भी परिणाम केवल अनिश्चितता ही रहेगा। इसी से अन्य शेष मतों की स्वीकृति का भी स्पष्टीकरण हो जाता है। यदि अनुभवकर्ता का अभाव अद्वैत के कारण मान लिया जाए, तो यह संसार के समान ही हो जाएगा। लेकिन 'उत्पत्ति' आदि शब्दों से यह सिद्ध होता है कि पूर्ण अद्वैत नहीं है। और, प्रत्यक्ष ज्ञान भी साक्षात उपस्थिति में ही संभव होता है। साथ ही, 'दूसरा' का अस्तित्व भी पाया जाता है। यदि कोई आपत्ति करे कि उसे अस्तित्वहीन कहा गया है, तो भी यह उचित नहीं, क्योंकि वाक्य के शेष भाग और अन्य शब्दों से अन्य गुणों का संकेत मिलता है। जैसे वस्त्र का उदाहरण है, वैसे ही प्राण आदि का भी। 'दूसरे' के रूप में संबोधन के कारण, कर्म असंभव हो जाते हैं—यह भी दोष है। लेकिन, कोई अतिरिक्त तत्व अवश्य है, क्योंकि भेद का उल्लेख किया गया है। पत्थर आदि के समान यह संभव नहीं है। यदि कोई कहे कि लय (विलयन) का अनुभव होता है, तो भी यह दूध के समान है—अर्थात, वह पूर्ण नाश नहीं है, केवल रूपांतर है। देवताओं आदि में जैसी स्थितियाँ हैं, वैसे ही संसार में भी हैं। यदि यह स्वीकार किया जाए, तो या तो सब कुछ ही उसका विस्तार हो जाएगा, या फिर 'अखंड' कथन का विरोध होगा। परंतु, शास्त्र ही प्रमाण है, क्योंकि उसका मूल शब्द (शब्द-प्रमाण) है। और, आत्मा में विभिन्न गुण भी वास्तव में पाए जाते हैं। प्रतिपक्षी के मत में भी दोष हैं। और, जैसा देखा जाता है, वैसे ही सभी गुण भी उसमें पाए जाते हैं। यदि कोई कहे कि 'ऐसा नहीं, क्योंकि उसमें इंद्रियाँ नहीं हैं', तो इसका उत्तर पहले ही दिया जा चुका है। नहीं, क्योंकि सृष्टि का कोई उद्देश्य है। परंतु, संसार में भी सृजन केवल क्रीड़ा (खेल) के लिए होता है। यह भी नहीं कि इसमें पक्षपात या क्रूरता है, क्योंकि यह अन्य कारणों पर निर्भर करता है—जैसा कि शास्त्र में भी दर्शाया गया है। यदि कोई कहे कि 'कर्मों का वितरण नहीं होता', तो उत्तर है कि अनादित्व के कारण, यह उचित है और व्यवहार में भी ऐसा देखा जाता है। और, सभी गुणों की संभावना भी पाई जाती है। अब, आगे कहा गया कि व्यवस्था संभव न होने के कारण अनुमान भी प्रमाण नहीं है, और न ही कोई क्रिया संभव है। यदि कोई कहे कि 'यह दूध और जल के समान है', तो वहाँ भी वही आपत्ति बनी रहती है। और, पृथक्करण सिद्ध नहीं होता, और कोई परस्पर निर्भरता भी नहीं है। साथ ही, अन्यत्र ऐसा नहीं पाया जाता, अतः यह घास आदि के समान भी नहीं है। यदि कोई कहे कि 'मनुष्य और पत्थर के समान है', तो वहाँ भी वही आपत्ति बनी रहती है। और, प्रधान सत्ता का संबंध भी संभव नहीं है। इस प्रकार, इन सूत्रों के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि आत्मा, ब्रह्म और जगत के संबंध में जो विविध शंकाएँ, आपत्तियाँ और तर्क प्रस्तुत किए जाते हैं, उनका समाधान शास्त्रानुसार, युक्तियुक्त और प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर क्रमवार किया गया है।