एक बार, वेदांत के गूढ़ रहस्यों पर विचार करते हुए ऋषियों के बीच एक गहन संवाद चला। वे जीवन-शक्ति, प्रकाश, आकाश और अन्य तत्त्वों की चर्चा कर रहे थे, क्योंकि शास्त्रों में इनके उल्लेख का विस्तार से वर्णन मिलता है। कुछ ने कहा कि प्रकाश को भोजन के रूप में नहीं माना जा सकता, जबकि शास्त्रों में आकाश आदि को कारण रूप में बताया गया है। यह चर्चा इसलिए थी क्योंकि सृष्टि की उत्पत्ति और उसके कारणों के विषय में स्पष्टता आवश्यक थी। ऋषियों ने देखा कि आकर्षण के कारण भी सृष्टि की चर्चा की गई है, और यह भी कि जब संसार की बात आती है, तो आत्मा और प्राण की विशेषताओं का उल्लेख होता है। यदि कोई कहे कि ये लक्षण केवल जीवात्मा और प्रधान प्राण के हैं, तो इसका समाधान पहले ही दिया जा चुका है। परंतु जैमिनि जैसे मुनि मानते हैं कि प्रश्न और उत्तर के आधार पर इसका कोई अन्य प्रयोजन भी है, और अन्य कुछ मुनि भी उनसे सहमत हैं। वाक्यांशों की आपसी कड़ी के कारण, आश्मरथ्य ने कहा कि प्रस्तावना के आधार पर लक्षण की पुष्टि होती है। औदुलोमी ने कहा कि आत्मा के प्रस्थान की स्थिति के कारण यह चर्चा की गई है। काशकृत्स्न ने कहा कि आत्मा के निरंतर अस्तित्व के कारण यह सिद्धांत है। और मूल स्वरूप की बात इसलिए भी है क्योंकि प्रस्तावना और दृष्टांत से कोई विरोध नहीं होता। फिर, उन्होंने यह भी कहा कि शास्त्रों में जो अभिप्राय की शिक्षा दी गई है, वह भी इसी ओर संकेत करती है, और दोनों परंपराएँ भी इसी बात की प्रत्यक्ष घोषणा करती हैं। यह सब आत्मा के लिए ही है, क्योंकि परिवर्तन के कारण भी ऐसा कहा गया है। और वास्तव में, मूल स्रोत का भी उल्लेख मिलता है। इन सब बातों से सभी शंकाओं का समाधान हो जाता है, सभी विषय स्पष्ट हो जाते हैं। आगे, यदि कोई आपत्ति करे कि इससे स्मृति-शास्त्रों के लिए स्थान नहीं बचेगा, तो ऐसा नहीं है, क्योंकि यह समस्या केवल अन्य स्मृतियों में आती है। और अन्य तत्त्वों का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं होता। इसी से योग के सिद्धांत का भी समाधान हो जाता है। परंतु यह भिन्न है, और शब्द भी इसी भिन्नता को दर्शाते हैं। जब नाम और रूप की पहचान की जाती है, तो वह भेद के कारण ही होती है, फिर भी प्रत्यक्ष में यह देखा जाता है। यदि कोई कहे कि अस्तित्व ही नहीं है, तो यह केवल निषेध है, उसका कोई स्वतंत्र आधार नहीं। भोजन के उदाहरण में भी यही असंगति आ जाती, जो तर्कसंगत नहीं है। और कोई उपयुक्त दृष्टांत भी नहीं मिलता। अपने ही मत में दोष उत्पन्न हो जाते हैं, और तर्क का कोई दृढ़ आधार नहीं है। यदि अन्य प्रकार से अनुमान किया जाए, तो भी अंतहीन अनिश्चितता बनी रहती है। इसी से अन्य शेष मतों की भी व्याख्या हो जाती है। यदि अनुभवकर्ता का अभाव अद्वैत के कारण माना जाए, तो वह संसार के समान हो जाएगा। परंतु 'उत्पत्ति' आदि शब्दों से उसका अभेद स्थापित होता है। और प्रत्यक्ष अनुभव भी उपस्थिति में ही होता है। अन्य का अस्तित्व भी प्रत्यक्ष है। यदि कोई कहे कि उसे 'अस्तित्वहीन' कहा गया है, तो ऐसा नहीं है, क्योंकि वाक्य के शेष भाग और अन्य शब्दों से अन्य गुण का संकेत मिलता है। यह ठीक वैसा ही है जैसे वस्त्र के विषय में, या प्राण आदि के विषय में कहा जाता है। 'अन्य' के रूप में नाम दिए जाने से कर्म की असंभवता जैसे दोष उत्पन्न होते हैं। परंतु अंतर के निर्देश के कारण वहाँ कुछ अतिरिक्त है। इस प्रकार, ऋषियों के संवाद में उपनिषदों और वेदांत के गूढ़ रहस्य एक-एक कर प्रकट होते गए, और शास्त्रार्थ की यह धारा आत्मा के परम सत्य की ओर प्रवाहित हुई।