आइए, ब्रह्मसूत्र के इन गूढ़ सूत्रों की शृंखला को एक सहज और सजीव कथा के रूप में समझें। वेदों और उपनिषदों में जिस परम सत्य की खोज की गई है, उसके मार्ग में अनेक प्रश्न और शंकाएँ उठती हैं। सबसे पहले, यह कहा गया कि आत्मा और ब्रह्म के मार्ग में बड़ी समानता है, इसलिए दोनों का स्वरूप एक ही है। शास्त्रों में भी इसकी स्पष्ट घोषणा की गई है। बार-बार यह भी कहा गया है कि वह ब्रह्म आनंद से पूर्ण है—यह बात बारंबार प्रतिपादित हुई है। यदि कोई यह कहे कि कुछ शब्दों में परिवर्तन या विकार के अर्थ आते हैं, तो भी मुख्यता ब्रह्म की ही है, इसलिए विरोध नहीं है। शास्त्रों में कारण भी स्पष्ट किया गया है और वेद-मंत्रों में उसी ब्रह्म का ही गान हुआ है। इसके अतिरिक्त कोई अन्य तर्कसंगत नहीं है, क्योंकि अन्य किसी की संभावना नहीं बनती। शास्त्रों में भिन्नता का भी संकेत दिया गया है, और इच्छा के कारण अनुमान की आवश्यकता नहीं पड़ती, क्योंकि शास्त्र स्वयं ही उसके संबंध को सिखाता है। भीतर की बातों में भी ब्रह्म के गुणों की ही चर्चा है। और जब भिन्नता का उल्लेख आता है, तो वह अन्य वस्तु के लिए है। आकाश का भी स्वरूप संकेतों से जाना जाता है, और इसी प्रकार प्राण—वह भी उसी कारण से समझा जाता है। प्रकाश का भी उल्लेख उसके मार्ग के कारण हुआ है। यदि कोई छंद के उल्लेख से विरोध करे, तो वह उचित नहीं, क्योंकि मन की आहुति का वर्णन है, और वैसा ही दृष्टांत मिलता है। तत्वों आदि के कारण के रूप में जिस नाम का उल्लेख हुआ है, वह भी उचित है। यदि कोई कहे कि उपदेश में भिन्नता है, तो वह भी विरोध नहीं करता, क्योंकि दोनों ही स्थितियों में कोई असंगति नहीं है। प्राण का उल्लेख भी उसके बाद के संबंध के कारण हुआ है। यदि कोई यह कहे कि गुरु अपने ही आत्मा की बात करता है, तो भी वह उचित नहीं, क्योंकि वहां आत्मा से संबंध ही आधार है। उपदेश शास्त्र के दृष्टिकोण से ही होता है, जैसे वामदेव ऋषि के संदर्भ में देखा जाता है। यदि कोई कहे कि इसमें जीव और प्रधान प्राण के लक्षण हैं, तो भी विरोध नहीं, क्योंकि त्रैविध्य ध्यान दोनों पर आधारित है और यहां संबंध स्थापित है। जहां-जहां भी उपदेश मिलता है, वह सर्वत्र प्रसिद्ध है। और जिस गुण का आशय है, वह भी उपयुक्त है। परंतु यह देहधारी जीव नहीं हो सकता, क्योंकि उसमें असंभवता है। और वह कर्ता और कर्मकर्ता के रूप में भी निर्दिष्ट है। शब्दों के विशेष प्रयोग से भी यह भेद स्पष्ट होता है। जो स्मृति में आया है, वह भी इसी को पुष्ट करता है। यदि कोई कहे कि बाल्यावस्था या अन्य नामों के कारण यह उचित नहीं, तो भी वह ठीक नहीं, क्योंकि जैसा आकाश के साथ होता है, वैसा ही इसमें भी उपदेश संभव है। यदि कोई कहे कि भोग की प्राप्ति होती है, तो वह भी ठीक नहीं, क्योंकि भेद स्पष्ट है। जो सबको ग्रहण करता है—चल और अचल—वही भोक्ता है। प्रसंग भी इसी का समर्थन करता है। दो आत्माएँ गुफा में प्रवेश करती हैं—ऐसा देखा गया है। विशेषण के कारण भी यह पुष्ट होता है। अंतर्यामी के रूप में भी उसका सन्निवेश है। स्थान आदि के नाम से भी उसका निर्देश है। सुख से भिन्नता का भी उल्लेख है, इसलिए वही ब्रह्म है। और उपनिषदों में जिस मार्ग का वर्णन है, उसी का उल्लेख भी मिलता है। अन्य कोई नहीं हो सकता, क्योंकि उसमें अनंतता और असंभवता है। इस प्रकार, शास्त्रों के इन सूत्रों के माध्यम से, ब्रह्म की सर्वव्यापकता, आनंदमय स्वरूप, कारणत्व, और भिन्नता के संकेतों को एक सूत्र में गूंथकर, उपनिषदों की गूढ़ता को स्पष्ट किया गया है। यही वह दिव्य कथा है, जिसमें साधक को ब्रह्म की पहचान होती है, और समस्त शास्त्रों का सार प्रतिध्वनित होता है।