यह देवी, जो परम सत्ता हैं, अंतरात्मा का स्वरूप हैं, वही साक्षी और परमेश्वरी हैं। वे वाणी के मध्यमा और वैखरी रूपों में भी विराजमान हैं और भक्तों के मन रूपी मानसरोवर में हंस की भांति निवास करती हैं। वे कामेश्वर की प्राणवाहिनी हैं, सब कर्मों की जानकार, कामदेव द्वारा पूजित, प्रेमरस से पूर्ण, सदा विजयी और जलंधर में प्रतिष्ठित हैं। ओड्याण पीठ में, बिंदु मंडल में वे निवास करती हैं, गूढ़ विधियों द्वारा पूजित होती हैं और गुप्त अर्पण से संतुष्ट होती हैं। वे क्षणमात्र में कृपा देने वाली हैं, जगत की साक्षी होते हुए भी साक्षियों से परे हैं। षडंग देवताओं के साथ विराजमान हैं और छह दिव्य गुणों से सम्पन्न हैं। उनका स्वभाव अत्यंत कोमल है, वे अनुपम हैं, मोक्ष-सुख की दात्री हैं, सोलह कला रूपी शाश्वत स्वरूप में विराजमान और श्रीकंठ के साथ एक देह में स्थित हैं। वे प्रकाशमयी, तेजस्विनी, सर्वश्रेष्ठ साम्राज्ञी हैं, आदिस्वरूपा, अव्यक्त, और व्यक्त-अव्यक्त दोनों स्वरूपों में स्थित हैं। वे सर्वव्यापिनी, अनेकों रूपों वाली, ज्ञान और अज्ञान दोनों की अधिष्ठात्री हैं। वे कामेश्वर की आँखों के कमलों को आनंदित करने वाली चंद्रिका हैं। उनका प्रकाशमय तेज भक्तों के हृदय के अंधकार को सूर्य की तरह दूर करता है। वे शिव की दूत, शिव द्वारा पूजित, शिवस्वरूपा और मंगलदायिनी हैं। शिव की प्रिय, शिव में अनुरक्त, श्रेष्ठजनों द्वारा पूजित और वंदनीय हैं। वे अनंत, स्वप्रकाशिनी, मन और वाणी से परे हैं। वे चैतन्यशक्ति की मूर्ति, चेतनस्वरूपा, जड़शक्ति की स्वामिनी, अचेतनस्वरूपा, गायत्री, वेदवाणी, संध्या, और द्विजों के समूहों से सेवित हैं। वे सत्य के सार में स्थित, तत्त्वस्वरूपा, पंचकोशों में निवासिनी, अनंत महिमा से युक्त, सदा नवयुवती और मादक आभा से दीप्त हैं। उनकी मादकता से उनकी लाल आँखें डोलती हैं, कपोल प्रेम के तेज से दमकते हैं, अंग चंदन से सुगंधित हैं और चंपा पुष्पों में रमण करती हैं। वे कुशल, कोमल रूपवाली, कुरुकुल्ला, कुल की अधिपति, कुलकुंड में स्थित, और कौल मार्ग के भक्तों द्वारा सेवा पाती हैं। वे कुमार और गणों की माता, तृप्ति, पोषण, बुद्धि, धैर्य, शांति, शुभता, तेज, आनंद और विघ्नहर्त्री हैं। वे उज्ज्वल, त्रिनेत्री, घूर्णित नेत्रों वाली, इच्छानुसार रूप धारण करने वाली, मालाओं से विभूषिता, हंससदृश, माता और मलयाचल पर निवास करती हैं। वे सुंदर मुखवाली, कमल सदृश, मनोहारी भृकुटि वाली, तेजस्विनी, देवताओं की नायिका, श्यामकंठी, आकर्षक, चंचल और सूक्ष्म रूपवाली हैं। वे वज्र की स्वामिनी, वामभाग की शुभा, कालचक्र से अछूती, सिद्धों की अधीश्वरी, सिद्धि का ज्ञान, सिद्धों की माता और विख्यात हैं। वे विशुद्धि चक्र में स्थित, रक्तवर्णा, त्रिनेत्री, खट्वांगादि शस्त्रधारिणी, एकमुखी हैं। उन्हें दूध-भात का भोग प्रिय है, वे त्वचा में निवास करती हैं, पशुजगत के लिए भयावह हैं, अमृतादि शक्तियों से घिरी हुई, डाकिनियों की अधिपति हैं। अनाहत कमल में स्थित, श्याम प्रभा वाली, द्विमुखी, दंष्ट्रायुक्त, माला आदि वस्त्रधारिणी, रक्त में प्रतिष्ठित हैं। वे कालरात्रि जैसी शक्तियों से घिरी हुई हैं, घी युक्त भात में रमण करती हैं, वीरों को वरदान देती हैं, और राकिनी स्वरूपा हैं। मणिपूर कमल में स्थित, त्रिमुखी, वज्रादि शस्त्रों से युक्त, डामरी आदि से परिवेष्ठित हैं। वे रक्तवर्णा, मांस में प्रतिष्ठित, गुड़-भात में आसक्त, भक्तों को सुख देने वाली, लाकिनी स्वरूपा हैं। स्वाधिष्ठान कमल में स्थित, चार मुखों से मोहित करने वाली, त्रिशूलादि शस्त्रधारिणी, पीतवर्णा, अत्यंत अभिमानी हैं। वे वसा के क्षेत्र में स्थित, मधुरता में आनंदित, बंधिनी आदि से घिरी, दही-भात में आसक्त, काकिनी रूप धारण करती हैं। मूलाधार कमल में स्थित, पंचमुखी, अस्थि में प्रतिष्ठित, अंकुशादि शस्त्रधारिणी, वरदाताओं द्वारा सेवित हैं। उनका मन मूंग-भात में आसक्त है, वे साकिनी स्वरूपा, आज्ञा चक्र में स्थित, श्वेतवर्णा, षडमुखी हैं। वे मज्जा में निवास करती हैं, हंसवती नामक प्रधान शक्ति से युक्त, केवल हल्दीयुक्त भोजन में रमण करती हैं, हाकिनी रूप धारण करती हैं। सहस्रदल कमल पर स्थित, सर्ववर्णाभूषिता, सर्वशस्त्रधारिणी, शुद्धि में प्रतिष्ठित, सर्वदिशाओं में स्थित हैं। उनका मन सभी भोज्य पदार्थों में रमण करता है, वे याकिनी स्वरूपा, स्वाहा, स्वधा, बुद्धि, ज्ञान, वेद, स्मृति और अद्वितीया हैं। पुण्य से प्राप्त, पुण्य की कीर्ति वाली, जिनकी स्तुति और श्रवण से पुण्य मिलता है, पुलोमजा द्वारा पूजित, बंधनमुक्ति की दात्री, सुंदर केशवाली हैं। वे मुक्तिदात्री, घुंघराले बालों वाली, विवेक और ज्ञान की मूर्ति, आकाशादि सृष्टिकर्त्री, समस्त रोगों की नाशिनी और मृत्यु की रोकथाम करने वाली हैं। वे सर्वश्रेष्ठ, अकल्पनीय रूपवाली, कलियुग के पापों की संहारिणी, कात्यायनी की पुत्री, काल की संहारिणी, कमलनयनी द्वारा पूजित हैं। उनके मुख में तांबूल भरा है, वे अनार के पुष्प जैसी दीप्तिमान, मृगनयनी, मनोहर, श्रेष्ठ, शिव की प्रिया और सखी रूप में प्रकट होती हैं। वे सदा संतुष्ट, भक्तों की निधि, नियंता, सर्वेश्वरी, मैत्री आदि गुणों से प्राप्त होती हैं, महाप्रलय की साक्षी हैं। वे परमशक्ति, परमगति, घनचैतन्य स्वरूपा, अमृतमाधुर्य से म्लान, मदमस्त, मातृबीजाक्षरों की स्वरूपा हैं। वे महाकैलास पर निवास करती हैं, उनके भुजाएं कमल-दंड जैसी कोमल, वंदनीय, करुणामूर्ति, परम साम्राज्ञी हैं। वे आत्मज्ञान, परमज्ञान, शुभज्ञान, कामदेव द्वारा पूजित, सोलह शुभाक्षरों के ज्ञान, त्रिवर्ग समूह की ज्ञाता, अनंत इच्छाओं की जननी हैं। करोड़ों कमल सेविकाओं से सेवित, सिर पर चंद्रमा सम दीप्ति लिए, इंद्रधनुष सी भौंह से शोभायमान हैं। हृदय में स्थित, सूर्य के समान प्रकाशमान, त्रिकोण में दीपक रूपी, दक्षकन्या, असुरसंहारिणी, और दक्षयज्ञ का अंत करने वाली हैं। इस प्रकार, देवी का यह दिव्य स्वरूप, उनके विविध रूप, शक्तियां, स्थान-स्थान पर निवास, भक्तवत्सलता, और समस्त जगत पर उनकी कृपा का विस्तार, शाश्वत रूप से प्रकट होता है। वे सच्चिदानंद की मूर्ति, समस्त शक्तियों की अधिष्ठात्री, और भक्तों के हृदय में सदा विराजमान हैं।