सूक्ष्मरूप धरि सियहि दिखावा । विकटरूप धरि लंक जरावा ॥
भीमरूप धरि असुर संहारे । रामचंद्र के काज संवारे ॥
लाय संजीवन लखन जियाये । श्रीरघुवीर हरषि वुर लाये ॥
रघुपति कीन्ही बहुत बडायी । तुम मम प्रिय भरत सम भायी ॥
सहस वदन तुम्हरो यश गावै । अस कहि श्रीपति कंठ लगावै ॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीशा । नारद शारद सहित अहीशा ॥
यम कुबेर दिगपाल जहाँ ते । कवि कोविद कहि सके कहाँ ते ॥
तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा । राम मिलाय राज पद दीन्हा ॥
तुम्हरो मंत्र विभीषण माना । लंकेश्वर भय सब जग जाना ॥
युग सहस्र योजन पर भानू । लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही । जलधि लांघि गये अचरज नाही ॥
दुर्गम काज जगत के जेते । सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ॥
राम दुवारे तुम रखवारे । होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥
सब सुख लहै तुम्हारी शरणा । तुम रक्षक काहू को डरना ॥
आपन तेज संहारो आपै । तीनोँ लोक हांक तेँ कांपै ॥
भूत पिशाच निकट नहिँ आवै । महावीर जब नाम सुनावै ॥
नासै रोग हरै सब पीरा । जपत निरंतर हनुमत वीरा ॥
संकटसे हनुमान छुडावै । मन क्रम वचन ध्यान जो लावै ॥
सब पर राम तपस्वी राजा । तिन के काज सकल तुम साजा ॥
और मनोरथ जो कोयी लावै । तासु अमित जीवन फल पावै ॥ [** सोयि **]
चारोँ युग प्रताप तुम्हारा । है परसिद्ध जगत उजियारा ॥
साधुसंतके तुम रखवारे । असुर निकंदन राम दुलारे ॥
अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता । असवर दीन्ह जानकी माता ॥
राम रसायन तुम्हरे पासा । सदा रहो रघुपति के दासा ॥
तुम्हरे भजन राम को पावै । जन्म जन्म के दुख बिसरावै ॥
अंतकाल रघुपति पुर जायी । [** रघुवर **] जहाँ जन्मि हरिभक्त कहायी ॥
और देवता चित्त न धरयी । हनुमत सेयि सर्वसुखकरयी ॥
संकट हरै मिटै सब पीरा । जो सुमिरै हनुमत बलवीरा ॥
जै जै जै हनुमान गोसायी । कृपा करहु गुरु देव की नायी ॥
यह शतवार पाठ कर जोयी । छूटहि बंदि महासुख होयी ॥