महादेवी दुर्गा के रणभूमि में, उनका पराक्रम देखते ही बनता था। देवी के हाथों में तलवार और गदा थी। कुछ असुरों को उन्होंने अपनी तलवार से काट गिराया, कुछ को गदा से मारा, और कई असुर तो उनके दांतों की धार से ही युद्धभूमि में ढेर हो गए। पल भर में ही असुरों की विशाल सेना नष्ट हो गई। यह देखकर महाबली असुर चंडा क्रोध से भर उठा और देवी की ओर बढ़ा। उसके साथ ही, महादैत्य मुंडा ने भी देवी पर भयानक बाणों की वर्षा कर दी और हजारों चक्र उनके ऊपर बरसाए। वे घूमते हुए चक्र देवी के मुख की ओर बढ़ते हुए ऐसे प्रतीत हो रहे थे जैसे काले बादल के पेट पर अनेक सूर्य चमक रहे हों। तभी, काली ने भयंकर गर्जना की, उनका मुख विकराल और खुला हुआ था, उनके दांत अग्नि के समान चमक रहे थे। वे प्रचंड क्रोध में हँस पड़ीं। देवी अपने सिंह पर सवार होकर चंडा पर झपटीं, उसके केश पकड़कर अपनी तलवार से उसका सिर काट दिया। चंडा का सिर कटते ही वह असुर भयंकर चीख मार उठा, जिसकी गूंज से तीनों लोक कांप उठे। यह देखकर मुंडा देवी पर टूट पड़ा, पर देवी ने उसे भी क्रोधपूर्वक तलवार से काट गिराया। जब शेष असुर सेना ने देखा कि चंडा और मुंडा दोनों मारे गए और उनकी सेना नष्ट हो चुकी है, तो वे भयभीत होकर चारों दिशाओं में भाग गए। तब काली, चंडा और मुंडा के सिर लेकर चंडिका के पास पहुँचीं और प्रचंड हास्य के साथ बोलीं, ‘‘यहाँ मैं आपके लिए चंडा और मुंडा, इन महादैत्यों को युद्ध-यज्ञ की भेंट स्वरूप लाई हूँ; शुम्भ और निशुम्भ का वध आप स्वयं करेंगी।’’ चंडिका ने जब देखा कि चंडा और मुंडा, ये महाबली असुर, लाए गए हैं, तो उन्होंने काली से कोमल वाणी में कहा, ‘‘चूंकि तुम चंडा और मुंडा को यहाँ लाई हो, अतः अब संसार में तुम्हारा नाम ‘चामुंडा’ के रूप में प्रसिद्ध होगा।’’ अब जब चंडा और मुंडा मारे गए, और असुरों की सेना बहुत कम हो गई, तब असुरों के स्वामी शुम्भ का मन क्रोध और अपमान से भर गया। उसने अपनी समस्त असुर सेनाओं को युद्ध के लिए एकत्र होने का आदेश दिया। उसने कहा, ‘‘आज छियासी सेना नायक, चौरासी कंबु सेनापति अपनी-अपनी सेनाओं के साथ प्रस्थान करें। मेरे आदेश से पचास महाबली असुर कुल और सौ धौम्र कुल के असुर भी युद्ध के लिए आगे बढ़ें। कालक, दौर्हृद, मौर्य, कालकेय आदि असुर भी युद्ध की तैयारी करें और मेरे आदेश पर शीघ्र बढ़ें।’’ शुम्भ के इस आदेश पर वह स्वयं हजारों विशाल सेनाओं से घिरा हुआ युद्धभूमि की ओर बढ़ा। जब चंडिका ने उस भयंकर सेना को आते देखा, तो उन्होंने अपने धनुष की प्रत्यंचा की टंकार से पृथ्वी और आकाश के बीच की सारी जगह भर दी। देवी का सिंह भी भयंकर गर्जना करने लगा और अम्बिका ने अपनी घंटी की ध्वनि से उस गर्जना को और बढ़ा दिया। आकाश के सभी दिशाएँ धनुष की टंकार, सिंह की गर्जना और घंटी की आवाज़ से गूंज उठीं। काली ने अपनी विकराल मुख से शत्रु सेना को अपने चीत्कार से आतंकित कर दिया। इस महान कोलाहल को सुनकर असुरों की सेनाएँ क्रोध से भरकर चारों ओर से देवी, सिंह और काली को घेरने लगीं। उसी समय, देवताओं के शत्रुओं के विनाश और अमर सिंहों के कल्याण के लिए, ब्रह्मा, शिव, गुह (कार्तिकेय), विष्णु और इन्द्र के तेजस्वी अंश उनके शरीर से निकलकर अपने-अपने रूप में चंडिका के पास पहुँचे। प्रत्येक देवता की जैसी आकृति, आभूषण और वाहन था, वैसे ही उनकी शक्ति प्रकट हुई और असुरों से युद्ध के लिए तैयार हुई। हंसों से खींचे जाने वाले विमान के आगे, कमंडलु और जपमाला लिए ब्रह्मा की शक्ति ब्राह्मणी पहुँचीं। महेश्वरी, वृषभ पर सवार, त्रिशूल और वरमुद्रा धारण किए, महान नागों और चंद्रकलाधारी होकर आईं। कौमारी, शस्त्र-धारी, सर्वश्रेष्ठ मयूर पर सवार होकर युद्ध के लिए आईं। विष्णु की शक्ति गरुड़ पर सवार, शंख, चक्र, गदा, धनुष और तलवार लिए वहाँ पहुँचीं। हरि की शक्ति वराह के रूप में वराही बनकर आईं। नरसिंह के समान रूप वाली नरसिंही भी वहाँ प्रकट हुईं, जिनकी अयाल तारों के समूह को उड़ा रही थी। इन्द्र की शक्ति इन्द्राणी, वज्र धारण किए, ऐरावत हाथी पर विराजमान, हजार नेत्रों वाली, वहाँ उपस्थित हुईं। इन सभी देव शक्तियों से घिरी हुई चंडिका के पास भगवान ने कहा, ‘‘मेरी संतुष्टि के लिए असुरों का शीघ्र वध करो।’’ तभी भगवान के शरीर से अत्यंत भयानक और प्रचंड चंडिका की शक्ति प्रकट हुई, जो सौ वज्रों के समान गर्जना कर रही थी। वह अविजित देवी जटाजूटधारी होकर भगवान से बोली, ‘‘हे दूत, तुम शुम्भ और निशुम्भ के पास जाकर संदेश दो।’’ ‘‘शुम्भ-निशुम्भ और अन्य सभी युद्ध के लिए एकत्र असुरों से कहो—इन्द्र को तीनों लोक प्राप्त हों, देवता यज्ञभाग के अधिकारी बनें; यदि जीवन चाहते हो तो पाताल चले जाओ। यदि अपनी शक्ति के अभिमान से युद्ध की इच्छा है, तो आओ—मेरे गण तुम्हारे मांस से तृप्त हों।’’ ‘‘चूंकि स्वयं शिव को मैंने अपना दूत बनाकर भेजा है, इसी कारण मैं इस संसार में ‘शिवदूती’ के नाम से विख्यात हूँ।