समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम् । समानं मन्त्रमभि मन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि
तुम्हारा संकल्प एक हो, सभा एक हो, मन एक हो, ताकि सबके विचार एक हों; मैं एक ही उद्देश्य और एक ही भावना से तुम्हारी आहुति अर्पित करता हूँ।
समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः । समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति
तुम्हारी भावना एक हो, तुम्हारे हृदय एक हों; तुम्हारा मन भी एक हो, ताकि तुम सब मिलजुल कर सुख से रहो।