प्रातःकाल की शुभ बेला में, ऋषि अपने हृदय की गहराइयों से उषा देवी का आह्वान करते हैं — “हे उषा, प्रेरितों को अमर यश और धन प्रदान करो, और हमें गो-सम्पत्ति से युक्त पुरस्कार दो। दानशीलों को उत्साहित करनेवाली देवी, उठो और हमारे पथ से अंधकार को दूर करो।” इसके पश्चात् वे इन्द्र और वरुण की ओर मुड़ते हैं, प्रार्थना करते हैं — “हे इन्द्र-वरुण, हमारे यज्ञ और हमारी प्रजा के लिए महान रक्षा दो। हम जो दीर्घकाल से श्रद्धापूर्वक प्रयत्नशील हैं, वे युद्धों में विजयी हों। हे रक्षकों, हमारी रक्षा करो।” वे दोनों देवताओं को प्रकाश के अधिपति, सम्पत्ति के महान दाता और स्वामी के रूप में पुकारते हैं, जिनकी शक्ति के लिए अन्य सभी देवता भी अपने सामर्थ्य को एकत्र करते हैं। ऋषि आगे कहते हैं, “आपकी ही शक्ति से जल के मार्ग खोदे गए, सूर्य को आकाश में स्थापित किया गया। हे इन्द्र-वरुण, इस अद्भुत कार्य के उल्लास में, आपने ज्ञानीजनों के हृदय में प्रेरणा और विचार भर दिए।” युद्ध के समय, वे अग्नि के समान प्रज्वलित होते हैं, और सुरक्षा के स्रोत बनते हैं। वे दोनों प्रकार की सम्पत्ति के स्वामी हैं, अतः ऋषि उन्हें बार-बार पुकारते हैं। इन्द्र-वरुण की महिमा का गान करते हुए ऋषि कहते हैं, “आपकी ही शक्ति से समस्त प्राणी और उत्पन्न वस्तुएँ निर्मित हुईं। मित्र और वरुण सुरक्षा लाते हैं, और महाबली मरुतों के साथ शुभता की ओर अग्रसर होते हैं। वरुण का महान पुरस्कार स्थिर और मापित है; कोई अधर्मियों का नाश करता है, कोई दुर्बलों को पार करता है, कोई उत्तम को चुनता है।” ऋषि आश्वस्त करते हैं कि जिनकी रक्षा में इन्द्र-वरुण चलते हैं, उन्हें कोई अनिष्ट, विपत्ति या दुःख नहीं छूता, यज्ञ में देवताओं की अगुवाई में वे सुरक्षित रहते हैं, और मनुष्यों की त्रुटियाँ उनका नाश नहीं कर पातीं। वे सबको पुकारते हैं — “हे मनुष्यों, दिव्य सहायता के साथ समीप आओ, मेरी पुकार सुनो। हे इन्द्र-वरुण, हमें मित्रता और अनुग्रह दो, जो कल्याणकारी और योग्य हो।” युद्धों में भी वे प्रार्थना करते हैं — “हर संग्राम में, अपने जन-बल के साथ हमारे नेता बनो। यदि दोनों पक्ष तुम्हें पुकारें, तो संतान और वंश की स्पर्धा में निर्णय करो।” वे इन्द्र, वरुण, मित्र और अर्यमा से महिमा, महान और विस्तृत रक्षा की कामना करते हैं, साथ ही अदिति के सत्य-रूप प्रकाश और सविता के स्तवन का सम्मान करते हैं। ऋषि स्मरण करते हैं कि इन्द्र और वरुण ने प्राचीन मित्रता को देखते हुए, पूर्व दिशा में, विशाल सेनाओं के साथ गोधन की खोज की। उन्होंने सुदास की दासों और वृत्रों के विरुद्ध सहायता की, आर्यों की भी रक्षा की। जहाँ-जहाँ लोग एकत्र होते, जहाँ युद्ध में कोई प्रिय नहीं होता, जहाँ देवता भी भयभीत होते, वहाँ इन्द्र-वरुण उनके पक्ष में बोलते। धरती के छोर तक फैले अंधकार को भी इन्द्र-वरुण ने देखा, उनकी ध्वनि आकाश तक पहुँची। वे शत्रुओं को दृढ़ न रहने दें, सहायता के साथ समीप आएँ, क्योंकि वे पुकार सुनने वाले हैं। अपने अजेय अस्त्रों से सुदास की रक्षा की, और तृत्सुओं के सत्य यज्ञ को स्वीकार किया। शत्रुजनों के अत्याचार से रक्षा के लिए ऋषि पुनः इन्द्र-वरुण को पुकारते हैं, क्योंकि वे दोनों प्रकार की सम्पत्ति के अधिपति हैं और स्वर्ग में भी रक्षक हैं। युद्धों में, विशेषकर जब सुदास दस राजाओं से घिरा था, तृत्सुओं के साथ इन्द्र-वरुण ने उसकी रक्षा की। दस राजा, जो यज्ञ नहीं करते थे, सुदास को पराजित न कर सके, क्योंकि मनुष्यों का सच्चा स्तवन ही देवताओं के लिए बल बन गया। दशराजन के पुत्र के लिए, जो चारों ओर से घिरा था, इन्द्र-वरुण ने सुदास को शक्ति दी, और तृत्सुओं ने श्रद्धा और बुद्धि से विजय पाई। एक देवता शत्रुओं का नाश करते हैं, दूसरा व्रतों की रक्षा करता है। ऋषि दोनों को उत्तम स्तुतियों से पुकारते हैं — “हमारी रक्षा करो।” फिर वे पुनः इन्द्र, वरुण, मित्र, अर्यमा से महान कीर्ति और रक्षा की प्रार्थना करते हैं, अदिति के अवरोध-रहित सत्य-प्रकाश और सविता की दिव्य प्रभा का स्तवन करते हैं। यज्ञ के समय ऋषि कहते हैं, “हे राजाओं, हे इन्द्र-वरुण, मैं श्रद्धा से आपको अर्पण करता हूँ। घृत की धाराएँ आपकी भुजाओं पर बहती हैं, अनेक रूप धारण करती हैं।” आपका राज्य आकाश के समान विशाल, तेजस्वी और अटल है, मार्गदर्शकों से युक्त है। वे प्रार्थना करते हैं कि वरुण का कोप दूर रहे और इन्द्र संसार को विस्तृत करें। ऋषि आशा करते हैं कि उनका यज्ञ सफल हो, सभाओं में सुंदर हो, उनके स्तोत्र श्रेष्ठ जनों में प्रशंसित हों, देवताओं से युक्त सम्पत्ति मिले, और वे उत्तम सहायता से पार हों। वे इन्द्र-वरुण से सर्वसम्पन्न, असीम और वीर्यवान धन की कामना करते हैं, जो असत्य को दूर करता है और खजाने देता है। आठ श्लोकों का यह स्तोत्र इन्द्र-वरुण के लिए उच्चारित है — “हम संतान और वंश की समृद्धि चाहते हैं। उत्तम दानों से अलंकृत होकर हम देवपूजन तक पहुँचें, आप हमें सदैव आशीर्वाद से सुरक्षित रखें।” ऋषि अपनी बुद्धि को शुद्ध करते हैं, सोम को इन्द्र-वरुण को अर्पित करते हैं, और प्रार्थना करते हैं कि उषा देवी घृत से अलंकृत होकर, विशाल रक्षा के साथ आएँ। जहाँ देवताओं द्वारा आहूत वीर झंडों के संग स्पर्धा करते हैं, वहाँ इन्द्र-वरुण शत्रुओं को पराजित करें, उन्हें चारों दिशाओं में तितर-बितर करें। जल भी, अपने गौरव के साथ, अपने स्थानों में इन्द्र-वरुण की देवता रूप में पूजा करता है; एक प्रजाओं का पालन करता है, दूसरा शत्रुओं का वध करता है, अजेय है। ऋषि प्रार्थना करते हैं कि जो ब्राह्मण सत्य जानता है, वह आपकी ओर श्रद्धा और बल के साथ मुड़े; वह सहायता के लिए अर्पण लेकर आता है, समृद्धि की इच्छा से बैठता है। फिर वे पुनः आठfold स्तोत्र उच्चारित करते हैं, संतति और वंश की समृद्धि की कामना करते हैं, उत्तम दानों से अलंकृत होकर देवपूजन तक पहुँचने की प्रार्थना करते हैं और आशीर्वाद की रक्षा माँगते हैं। इसके बाद वे वरुण की महानता का वर्णन करते हैं — “उस महाज्ञानी ने सृष्टियों को फैलाया, स्वर्ग और पृथ्वी को भी संभाला, ऊँचे गगन को ऊपर उठाया, और तारों को आकाश में फैला दिया।” वे पूछते हैं, “अपने स्वरूप से वह वार्ता करता है; मैं कब वरुण में निवास करूँगा? कौन-सा अर्पण वह स्वीकार करेगा, कब वह दयालु, करुणामय मुझ पर दृष्टि डालेगा?” ऋषि वरुण से प्रश्न करते हैं — “हे वरुण, वह प्राचीन अपराध क्या था, जिसके कारण आप अपने भक्त या मित्र को पीड़ा देना चाहते हैं? हे सहज-आहूत स्वामी, मुझे बताओ, मैं श्रद्धा से शीघ्र आपके पास आया हूँ।” वे प्रार्थना करते हैं — “पूर्वजों के पापों से हमें मुक्त करो, उनसे भी जिन्हें हमने स्वयं शरीर से किया। हे राजन्, वसिष्ठ को उस दोष से छुड़ाओ, जैसे बछड़े को रस्सी से, या पशु को फंदे से मुक्त किया जाता है।” ऋषि स्वीकार करते हैं कि न तो अपनी योग्यता, न दृढ़ता, न वीरता, न चतुराई — इनमें से कुछ भी पर्याप्त नहीं; पास में बड़ा-छोटा रहता है, निद्रा और असत्य की प्रवृत्ति भी आती है। वे कहते हैं — “जैसे सेवक अपने उदार स्वामी के लिए निष्कलंक कर्म करता है, वैसे ही मैं देवता के लिए करता हूँ, समृद्धि की इच्छा से। वह ज्ञानी देवता, भले ही पहचाना न जाए, विचारशील को प्रेरित करता है, श्रेष्ठजन गायक को धन देता है।” अंत में, वे कहते हैं — “हे वरुण, यह श्रद्धापूर्ण स्तुति आपके लिए है, हृदय में स्थित है। हमारे घर में कल्याण हो, प्रयासों में भी मंगल हो, आप सदैव हमें आशीर्वाद से सुरक्षित रखें।” ऋषि बताते हैं कि वरुण ने सूर्य के लिए पथों को साफ किया, नदियाँ समुद्र की ओर प्रवाहित हुईं। जैसे बँधी हुई बाढ़ को मुक्त किया गया हो, वैसे ही वरुण ने तेजस्वी जलधाराओं को सत्य के लिए प्रवाहित किया। इस प्रकार, इन ऋचाओं के माध्यम से, ऋषि श्रद्धा, प्रार्थना, स्तुति और आत्म-शुद्धि के साथ इन्द्र, वरुण, मित्र, अर्यमा, अदिति और सविता की महिमा का गान करते हैं, और मनुष्यों के लिए दिव्य रक्षा, धन, सत्य और क्षमा की कामना करते हैं।