एक समय की बात है, जब ऋषि और यजमान देवताओं की स्तुति और यज्ञ में लगे थे। वे श्रद्धा से पुकारते हैं – “हे मित्र और वरुण! हम आपकी रक्षा चाहते हैं, आपकी सहायता की याचना करते हैं। जैसे भयभीत गायें अपने स्वामी का पालन करती हैं, वैसे ही युद्ध में वीर अपने शक्तिशाली घोड़े को जोतता है। आपकी छाया में हम निर्भय हैं।” फिर वे इन्द्र और वरुण की महिमा का गान करते हैं – “हमारा यह श्रद्धा से ऊँचा किया गया यज्ञ आप तक पहुँचे। हे इन्द्र, हे वरुण! आज अपने भक्तों के बीच पधारें, हम कुश बिछाकर आपकी कृपा की कामना करते हैं। आप देवताओं में श्रेष्ठ, वीरों में सबसे शक्तिशाली हैं। आप सत्य के बल से वृत्र का नाश करते हैं, सब सेनाओं के नेता हैं।” ऋषि मंत्रों और प्रार्थनाओं से इन्द्र-वरुण की स्तुति करते हैं। एक अपने वज्र से वृत्र का वध करता है, दूसरा बुद्धिमान होकर प्रतियोगिताओं में विजय प्राप्त करता है। जैसे-जैसे देवियाँ और मनुष्य बढ़े, वैसे-वैसे सभी देवता, इन्द्र-वरुण के कारण, प्रसिद्धि और शक्ति में बढ़े। उनके लिए स्वर्ग और पृथ्वी विशाल हो गई। सच्चा दाता वही है, जो सत्य से आपकी सेवा करता है, हे इन्द्र-वरुण! आपकी कृपा से वह अपने शत्रुओं पर विजय पाता है, धन और समृद्धि प्राप्त करता है। आप जिनकी उपासना से धन देते हैं, वह हमें भी मिले, ताकि हमारे शत्रु दूर हों। हे इन्द्र-वरुण! आप ऋत के रक्षक हैं, हमारे ज्ञानीजनों को विजयशाली शक्ति दें, जिससे वे युद्ध में विजयी हों। आपकी महिमा का गान करते हुए हम सभी विपत्तियों को पार करें, जैसे नाविक जल को पार करता है। अब ऋषि वरुण की विशेष स्तुति करते हैं – “हे महान, व्यापक, प्रिय स्वामी! मेरी वाणी आपके लिए निकले। आप अपनी इच्छा से चमकते हैं, अमर ज्योति की तरह।” इन्द्र-वरुण के लिए सोम रस का पान तैयार है – “हे संकल्पशील देवता! यह सोमरस पान करें, आपकी रथी यज्ञ के लिए आती है, भरे कलश के पास बैठें और आनंद लें।” फिर ऋषि इन्द्र और विष्णु का आह्वान करते हैं – “मैं एकाग्र चित्त से आपको यज्ञ समर्पित करता हूँ, जिन्होंने महान कार्य किए। हमारा यज्ञ स्वीकार करें, हमें धन और सुरक्षित मार्ग दें। आप सभी विचारों के कर्ता हैं, सोम के पात्र आपके हैं। हमारे स्तुति गीत आपको प्रिय लगें।” हे इन्द्र-विष्णु! आप आनंद के स्वामी हैं, सोम का पान करें, हमारे लिए धन लाएँ। हमारे ज्ञानीजनों के विचार आपके लिए एकत्र हों। आपके लिए तीव्र घोड़े रथ खींचते हैं, आप विरोधियों को जीतते हैं। हमारे सभी आह्वान और प्रार्थनाएँ स्वीकार करें। आपने सोम के आनंद को व्यापक किया, मध्यलोक को फैलाया, हमारे लिए निवास के क्षेत्र बनाए। आप यज्ञ से शक्तिशाली होते हैं, पूज्य हैं, हमें धन दें। आप समुद्र के पास हैं, सोम के पात्र आपके पास हैं। हे अद्भुत देवता! मधुर सोमरस पान करें, हमारे आह्वान सुनें। आप दोनों कभी पराजित नहीं हुए, जब आप दोनों मिलकर प्रयत्न करते हैं, तो तीनों लोकों में हजारों बार विजय प्राप्त करते हैं। अब ऋषि पृथ्वी और आकाश की स्तुति करते हैं – “ये दोनों विशाल, घृत से अलंकृत, मधुर और सुंदर रूपवती हैं, वरुण के नियम से स्थिर हैं, कभी बूढ़ी नहीं होतीं, सदा फलवती हैं। वे धर्मात्माओं के लिए घृत देती हैं, सबको पोषित करती हैं। जो भी श्रद्धा से आपकी कृपा चाहता है, वह संतति से घिरा रहता है। आपकी कृपा से विविध रूप की सम्पदाएँ मिलती हैं।” पृथ्वी और आकाश घृत से चमकती हैं, वे यज्ञ के लिए आहूत होती हैं। वे हमें मधुरता दें, अमृत बरसाएँ, यश, बल, और शौर्य दें। वे माता-पिता के समान, सब जानने वाली, उत्तम सलाह देने वाली हैं। हे पृथ्वी और आकाश! मिलकर हमें समृद्धि, शक्ति और धन दें। फिर ऋषि सविता देव की वंदना करते हैं – “सविता ने अपने स्वर्णिम भुजाएँ यज्ञ के लिए फैलाई हैं। वे घृत से अपने हाथों का अभिषेक करते हैं, दानशील, युवा, कुशल, और विश्व के नियमों के धारक हैं। हम सविता की कृपा में रहें, उनकी श्रेष्ठ संपत्ति पाएं। वे दो और चार पैरों वाले सभी प्राणियों के स्वामी हैं।” हे सविता! अपने शुभ रक्षकों के साथ आज हमारे गृह की रक्षा करें, हमें समृद्धि दें, कोई शत्रु हम पर शासन न करे। वे प्रत्येक प्रातः, गृहपति के समान, उदित होते हैं, अडिग भुजाओं से उपासक को उपहार देते हैं। वे स्वर्णिम भुजाएँ उठाकर, स्वर्ग-पृथ्वी के शिखर पर चढ़ते हैं, सबको गतिमान करते हैं। हे सविता! आज, कल, और प्रतिदिन अपनी कृपा दें, ताकि हम आपके दान के अधिकारी बनें। अब ऋषि इन्द्र और सोम की महिमा का गान करते हैं – “आप दोनों महान हैं, आदि से ही महान कर्म किए हैं। आपने सूर्य को प्रकट किया, प्रकाश फैलाया, अंधकार और रात्रि को दूर किया। आप दोनों उषा को जगाते हैं, सूर्य को उसकी प्रभा के साथ आगे बढ़ाते हैं। आपने आकाश को थामा, पृथ्वी को फैलाया। आपने जल प्रवाहित किया, वृत्र का वध किया, नदियों को चलाया, समुद्रों को फैलाया।” आपने गायों के थनों में दूध रखा, जो अभी बँधा नहीं था, उसे भी थाम लिया। आप दोनों रक्षक हैं, प्रसिद्ध संतानें दीं, वीरता और युद्धशक्ति दी। फिर बृहस्पति की स्तुति होती है – “जो शिला को भेदता है, प्रथम जन्मा, सत्य के पथ पर चलता है, वही बृहस्पति है। वह दो आश्रयों वाला, प्राचीन पिता, वृषभ की तरह स्वर्ग और पृथ्वी के बीच गर्जना करता है। बृहस्पति ने दिव्य सभा में स्थान बनाया, बाधाएँ तोड़ीं, शत्रुओं को युद्ध में हराया। उसने खजाने, पशुधन, और जल की प्राप्ति की, प्रकाश के लिए शत्रु का विनाश किया।” इस प्रकार, ऋषियों की वाणी में देवताओं की स्तुति, आह्वान और यज्ञ की महिमा गूँजती है। वे सभी देवता – मित्र, वरुण, इन्द्र, विष्णु, पृथ्वी, आकाश, सविता, सोम, बृहस्पति – अपने-अपने गुणों से जगत की रक्षा, पोषण और कल्याण करते हैं। उनकी कृपा से यजमानों को विजय, धन, संतति, यश, और समृद्धि प्राप्त होती है। यही सनातन धर्म की ऋग्वैदिक परंपरा का दिव्य संदेश है।