एक समय की बात है, जब मनुष्य अपने जीवन में अग्नि की महिमा का अनुभव करते थे। अग्नि, जो अपने तेज से बंधनों को काटता है, मनुष्यों के बीच अपने दिव्य निवास में उज्ज्वल और व्रतधारी रहता है। जब भक्तजन श्रद्धा से उसका आह्वान करते हैं और घी से भरे पात्र उसके लिए सजाते हैं, तब वह प्रसन्न होकर प्रकट होता है। अग्नि को जब आहुतियों के साथ बुलाया जाता है, तो वह अपने तेज से चमक उठता है, उसके मुख पर घी का लेप शहद-सा मधुर होता है, और उसकी आभा चारों ओर फैल जाती है। समय के साथ, अग्नि वृद्ध होता है, परंतु उसकी ज्वाला और भी प्रखर हो उठती है। मनुष्य उसे पुकारते हैं, क्योंकि वही देवताओं के लिए आहुति ले जाता है। नश्वर मानव, अमर अग्नि की पूजा करते हैं, उसे घी अर्पित करते हैं, और वह गृह का अडिग स्वामी बना रहता है। अग्नि अपनी अजेय ज्वाला से दुष्टों का दमन करता है, सत्य का रक्षक बनकर चमकता है। वह अपने तेजस्वी मुख से जादू-टोनों को दूर करता है और विशाल गृहों में उजियारा फैलाता है। जब यज्ञ के लिए उसका आह्वान होता है, तो स्तुतियों और आहुति के साथ उसे प्रज्वलित किया जाता है, क्योंकि वह मनुष्यों में यज्ञ के लिए सबसे योग्य है। इसी समय, एक जिज्ञासु मनुष्य के हृदय में विचार उठते हैं—‘क्या मैं गाय, घोड़ा प्राप्त कर सकता हूँ? क्या मैं सोमरस का पान कर सकता हूँ?’ उसके विचार वायु के समान चंचल और उत्तेजित हो जाते हैं, मानो सोमरस का प्रभाव हो। उसका मन वेगवान घोड़ों द्वारा खींचे जा रहे रथ की भांति ऊँचा उड़ता है, और उसे लगता है कि यह सब सोमरस के प्रभाव से हो रहा है। उसका विचार उसके समीप आता है, जैसे गाय अपने प्रिय बछड़े के पास जाती है। वह कारीगर की भांति अपने कार्य के चारों ओर घूमता है, हृदय से ज्ञान की खोज करता है, और वह फिर सोचता है—‘शायद यह सोमरस का प्रभाव है।’ कोई भी जाति, कोई भी बंधन उसे रोक नहीं सकता; न ही दोनों लोक, न कोई अन्य शक्ति उसे बाँध सकती है। उसका भाव है—‘मैं आकाश और पृथ्वी दोनों से बड़ा हूँ, यह भी सोमरस का प्रभाव है।’ वह सोचता है कि यदि चाहे तो पृथ्वी को कहीं भी रख सकता है, सुखा सकता है या हिला सकता है—सोमरस के प्रभाव से। उसका एक पंख आकाश में है, दूसरा नीचे; वह स्वयं को शक्तिशाली और उत्तुंग अनुभव करता है। वह अपने घर लौटता है, देवताओं के लिए आहुति ले जाने वाला बनकर—यह भी सोमरस का चमत्कार है। फिर, ऋषि कहते हैं—‘यह वही महान सत्ता है, जिससे वह तेजस्वी, वीर, और अद्भुत प्राणी उत्पन्न हुआ, जो जन्म लेते ही शत्रुओं को परास्त करता है और सभी शक्तियाँ उस पर प्रसन्न होती हैं।’ वह शक्ति निरंतर बढ़ती है, शत्रुओं में भय उत्पन्न करती है, अपने सेवकों की रक्षा और पालन करती है, और सब उसके आगे नतमस्तक होते हैं। सब उसकी बुद्धि को चुनते हैं, उसकी शक्तियाँ बार-बार जाग्रत होती हैं। वह मधुरतम है, मधुर से भी मधुर, और आनंद का स्त्रोत है। ऋषि उसकी स्तुति करते हैं—‘तुम धन के विजेता हो, हर सुख में बलवान रहो, तुम्हारा शरीर दृढ़ रहे, कोई अपकारक शक्ति तुम्हें न पराजित कर सके।’ उसके साथ हम युद्धों में विजय पाते हैं, उसकी शक्तियों को प्रार्थना से पुष्ट करते हैं। हम उसकी विविध रूपों वाली, अजेय, सहायकों के सहायक की प्रशंसा करते हैं, जो अपनी शक्ति से सात प्रकार के दान देता है और अनेक रूप प्रकट करता है। उसी ने ऊँचे-नीचे सब स्थान स्थापित किए हैं, जिनकी छाया में हम रहते हैं। वह माताओं और गतिशील शक्तियों को स्थिर करता है, और अनेक तेजस्वी वस्तुओं को आगे बढ़ाता है। ऋषि बृहद्दिव ने ये ज्ञानमयी, प्रकाशमान ऋचाएँ इन्द्र के लिए कही हैं, जो सबसे आगे, प्रकाश लाने वाला, स्वाधीन और वंश का स्वामी है, जिसने सभी दूरस्थ स्थान खोले और हमें रक्षा दी। इसी बृहद्दिव, जो अथर्वण का वंशज है, ने इन्द्र की स्तुति की है; मातरिश्वान की पुत्रियाँ, बहनें, बिना द्वेष के पास आती हैं, और उसकी शक्ति से वे उसे प्रेरित और बलवान बनाती हैं। अब ऋषि गूढ़ रहस्य की ओर संकेत करते हैं—‘प्रारंभ में हिरण्यगर्भ उत्पन्न हुआ, वही समस्त सृष्टि का एकमात्र स्वामी बना। उसी ने पृथ्वी और आकाश की स्थापना की—हम किस देवता को आहुति अर्पित करें?’ वही प्राण और बल देने वाला है, जिसे सभी देवता मानते हैं, जिसका आदेश सब पालन करते हैं, जिसकी छाया अमरता और मृत्यु दोनों है—हम किस देवता को आहुति दें? वही अपनी महानता से समस्त प्राणियों का राजा है, जो दोनों पैरों और चार पैरों वाले सभी जीवों पर शासन करता है। उसकी महिमा को बर्फ से ढकी पर्वत-श्रृंखलाएँ और नदियों वाला समुद्र भी घोषित करते हैं; उसकी बाँहें दिशाएँ हैं। उसी ने विशाल आकाश, पृथ्वी, और मध्य प्रदेश की स्थापना की है, उसी ने आकाशगंगाओं को मापा है। जब दोनों विशाल लोक काँपते हुए उसकी शक्ति से उसकी ओर देखते हैं, वहीं सूर्य उदय होता है—हम किस देवता को आहुति दें? जब महान जलराशि, सृष्टि के बीज को लिए हुए, अग्नि को जन्म देती है, तब उनमें से देवताओं का एकमात्र देवता प्रकट होता है। उसी ने अपनी महानता से जलराशि में सृजनशक्ति देखी, यज्ञ की उत्पत्ति की, और वही देवताओं से भी ऊपर है। वही पृथ्वी का स्रष्टा है, जिसने आकाश में ऋत की स्थापना की, और तेजस्वी जलों की सृष्टि की—हम किस देवता को आहुति दें, जो हमें कभी क्षति न पहुँचाए? यही है वह दिव्य कथा, जिसमें अग्नि, सोम, इन्द्र और हिरण्यगर्भ की महिमा, उनकी शक्तियाँ, और सृष्टि के रहस्य प्रकट होते हैं।