एक समय की बात है, जब महान ऋषि विश्वामित्र ने अपनी दिव्य मंत्रों का उच्चारण किया। जैसे ही उन्होंने अपने मंत्रों का जाप किया, सभी अद्भुत अस्त्र-शस्त्र राघव के पास आए। उन अस्त्रों ने प्रसन्नता से राघव से कहा, "हे राघव, हम आपके समर्पित सेवक हैं, आप सबसे महान हैं।" उन्होंने आगे कहा, "आपकी जो भी इच्छा हो, वह आपके लिए शुभ हो; हम सब उसे पूरा करेंगे।" इस प्रकार, उन शक्तिशाली अस्त्रों की बातों को सुनकर राघव का मन शांत हो गया। फिर, आनंदित हृदय के साथ, राघव, जो ऊर्जा से भरे हुए थे, ने महान ऋषि विश्वामित्र को नमस्कार किया और वहां से प्रस्थान करने लगे। उन्होंने कहा, "हे पूज्य ऋषि, मैंने इन अस्त्रों को प्राप्त कर लिया है और अब मैं देवताओं द्वारा भी अजेय हूँ। लेकिन, मैं चाहता हूँ कि आप मुझे इन्हें वापस लेने का उपाय सिखाएं।" विश्वामित्र, जो तपस्वी और शुद्ध थे, ने राघव को उस उपाय के बारे में बताया। उन्होंने अनेक अस्त्रों के नाम बताए, जैसे सत्यवंत, सत्यकीर्ति, धृष्ट, रभस, और कई अन्य। उन्होंने राघव को उन अस्त्रों का ज्ञान दिया, जो दानवों को नष्ट करने में सक्षम थे। राघव ने उन दिव्य अस्त्रों को स्वीकार किया और उनके प्रति आभार व्यक्त किया। अस्त्रों ने राघव को कहा, "हे मानवों के सिंह, हमें आदेश दें, हम आपके लिए क्या करें?" राघव ने उन्हें कहा, "जैसा चाहें, वैसा करें; जब आवश्यकता हो, तब आप अपने मन से मेरी सहायता करेंगे।" फिर, उन्होंने राघव को प्रणाम किया और जैसे आए थे, वैसे ही चले गए। इस बीच, राघव ने ऋषि विश्वामित्र से पूछा, "हे पूज्य ऋषि, वह वृक्षों का समूह क्या है, जो बादलों की तरह काला है और पर्वत के निकट चमक रहा है?" ऋषि ने उत्तर दिया, "यहाँ, हे राघव, यह स्थान बेशकीमती है, जहाँ हिरण और विभिन्न प्रकार के पक्षी हैं।" राघव ने कहा, "मुझे बताइए, यह किसका आश्रम है, जहाँ ब्राह्मणों का वध करने वाले पापी आए थे?" विश्वामित्र ने बताया कि उन पापियों ने उनके यज्ञ को बाधित करने का प्रयास किया था। इस प्रकार, राघव ने विश्वामित्र से और भी बातें की, और ऋषि ने उन्हें बताया कि यहाँ भगवान विष्णु ने कई वर्षों तक तप किया था। कश्यप और अदिति ने भी यहाँ एक दिव्य व्रत किया था। ऋषि विश्वामित्र ने कहा, "हे राघव, आप तो स्वयं तपस्या का अवतार हैं।" इस पर राघव ने कहा, "हे ऋषि, हमें बताएं कि रात के भटकने वाले दानवों से कैसे सुरक्षित रहना है।" इस प्रकार, राघव और उनके भाई ने विश्वामित्र से ज्ञान प्राप्त किया, जिससे वे अपने यज्ञ को सफल बना सकें और दानवों से सुरक्षित रह सकें। यह कथा इस प्रकार समाप्त होती है, जिसमें राघव की महानता और विश्वामित्र की शिक्षाएँ उजागर होती हैं।