मारिच के वचनों को स्मरण करते हुए, वह राक्षस विचार करने लगा कि किस उपाय से लक्ष्मण को यहाँ से दूर भेजा जाए, जिससे रावण सीता को अकेली पाकर उसका अपहरण कर सके। उपयुक्त अवसर जानकर, मारिच ने राम की वाणी की हू-ब-हू नकल करते हुए वन में जोर से पुकारा—"हाय सीते! लक्ष्मण!" इसी बीच, राम के अचूक बाण से घायल होकर मारिच ने मृग का रूप त्याग दिया और अपने असली राक्षसी स्वरूप में आ गया। उसका विशाल शरीर भूमि पर गिरा, रक्त से लथपथ, और प्राण त्याग दिए। राम ने जब उसे इस अवस्था में देखा, तो उन्हें लक्ष्मण के शब्द स्मरण हो आए कि यह सब मारिच की माया है। उन्होंने मन में कहा—"लक्ष्मण ने जैसा कहा था, वही आज घटित हुआ; मारिच मेरी बाण से मारा गया।" फिर राम ने सोचा—"इस राक्षस ने 'हाय सीते! लक्ष्मण!' कहकर इतनी जोर से पुकारा है, इसे सुनकर सीता का क्या होगा?" राम को आशंका हुई कि लक्ष्मण अवश्य ही सीता के आग्रह से यहाँ से चला जाएगा। ऐसा विचार कर राम का रोम-रोम खड़ा हो गया और उनके मन में गहरी चिंता और भय समा गया। राक्षस रूपी मृग को मारने के बाद, राम ने एक अन्य चित्तीदार मृग का मांस लिया और शीघ्रता से जनस्थान की ओर बढ़ चले। उधर, वन में उस करुण पुकार को अपने पति की आवाज़ समझकर सीता अत्यंत व्याकुल हो उठी। उसने लक्ष्मण से कहा—"लक्ष्मण! वन में जो करुण पुकार सुनाई दी है, वह निश्चित ही राघव की है। तुम जाकर पता करो कि रामजी किस दशा में हैं। मेरा जीवन अब असुरक्षित है, मेरा मन स्थिर नहीं रह पा रहा है; वह करुण पुकार मेरे हृदय को कंपा गई है।" सीता ने लक्ष्मण से आग्रह किया—"तुम्हें अपने भाई की रक्षा करनी चाहिए, जो वन में पुकार रहे हैं। शीघ्र जाओ, अपने शरणागत भाई की सहायता करो। वह राक्षसों के वश में आ गए हैं, जैसे सिंहों के बीच कोई बलवान वृषभ फँस जाए।" परन्तु लक्ष्मण, भाई की आज्ञा स्मरण कर, वहीं रुके रहे। तब, अत्यंत व्याकुल सीता ने लक्ष्मण से दुखी होकर कहा—"सुमित्रानन्दन! तुम बाहर से तो मित्र जैसे दिखते हो, परंतु अपने भाई के प्रति शत्रुता का आचरण कर रहे हो। यदि इस संकट की घड़ी में तुम अपने भाई के पास नहीं जाते, तो निश्चय ही मेरे कारण तुम राम के विनाश की इच्छा रखते हो।" सीता ने आगे कटु वचनों में कहा—"निश्चित ही, मेरे प्रति इच्छा के कारण तुम राघव के पीछे नहीं जा रहे; मुझे लगता है तुम्हें उनके संकट में सुख मिल रहा है और अपने भाई से तुम्हें कोई स्नेह नहीं। तभी तुम इतने निश्चिंत होकर यहाँ रुके हो; यदि वह तेजस्वी राम संकट में हैं, तो मेरा क्या होगा?" "तुम्हारा यहाँ रुकना किस काम का, जब तुम मुख्य रक्षक बनकर आए हो?"—ऐसा कहकर वैदेही आँसुओं और शोक से भर गईं। लक्ष्मण ने भयभीत सीता से कहा—"वैदेही! तुम्हारे पति को न तो नाग, न असुर, न गन्धर्व, न देवता, न दानव, न राक्षस—किसी से भी पराजित किया जा सकता है। देवता, मनुष्य, गन्धर्व या पक्षी भी राम का कुछ नहीं बिगाड़ सकते। राक्षस, पिशाच, किन्नर, पशु, यहाँ तक कि उग्र दानव भी राम के समक्ष टिक नहीं सकते। युद्ध में राम इन्द्र के समान हैं, उनकी विजय अवश्यंभावी है; अतः तुम इस प्रकार न कहो।" लक्ष्मण ने आगे कहा—"मैं तुम्हें इस वन में राघव के बिना छोड़कर नहीं जा सकता। राम की शक्ति को कोई भी बलशाली परास्त नहीं कर सकता। तीनों लोकों के स्वामी और देवता भी यदि एकत्र हो जाएँ, तो भी राम की शक्ति को नहीं जीत सकते। अतः अपने हृदय को शान्त रखो और चिंता त्याग दो।" "तुम्हारे पति शीघ्र ही मृग का वध कर लौट आएँगे; जो स्वर तुमने सुना, वह न तो राम का था, न किसी देवता का। वह राक्षस की माया थी, जैसे गन्धर्वों का मायावी नगर। वैदेही! तुम मुझे राम ने सौंपा है, मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जा सकता, विशेषकर जब हम इन राक्षसों के शत्रु बन चुके हैं।" "खर के वध के बाद, जनस्थान में जो कुछ हुआ, उसके विषय में राक्षस वन में अनेक बातें कर रहे हैं। वैदेही! तुम्हें इन हिंसक और क्रूर घटनाओं पर ध्यान नहीं देना चाहिए।" लक्ष्मण के इन वचनों से भी सीता का क्रोध शांत नहीं हुआ, उनके नेत्र क्रोध से रक्तिम हो उठे और उन्होंने लक्ष्मण को कठोर वचनों में कहा—"तुम नीच हो, निर्दयी हो, क्रूर और कुल का कलंक हो।" "मुझे लगता है, तुम्हें राम के बड़े संकट में सुख मिल रहा है; राम को कष्ट में देखकर ही तुम ऐसे वचन बोल रहे हो। प्रतिद्वंद्वियों में बुराई उत्पन्न होना कोई आश्चर्य की बात नहीं, विशेषकर ऐसे निर्दयी और छल-कपट से भरे लोगों में, जैसे तुम हो।" "तुम सचमुच दुष्ट हो, छिपकर मेरे लिए या भरत के कहने पर ही राम के पीछे वन में चले आए। परन्तु यह योजना तुम्हारी या भरत की सफल नहीं होगी; मैंने जिस राम को पति रूप में स्वीकार किया है, जो नील कमल के समान श्यामवर्ण और कमल-लोचन हैं, उनके रहते मैं किसी अन्य पुरुष की कामना कैसे कर सकती हूँ?" "सुमित्रानन्दन! तुम्हारे सामने ही मैं प्राण त्याग दूँगी। राम के बिना मैं एक क्षण भी पृथ्वी पर जीवित नहीं रह सकती।" ऐसे कठोर, रोमांचकारी वचनों से सीता ने लक्ष्मण को ताड़ना दी। लक्ष्मण, संयमित और विनीत भाव से, हाथ जोड़कर बोले—"मैथिली! मैं तुम्हारे उत्तर देने में असमर्थ हूँ; तुम मेरे लिए देवी के समान हो। स्त्रियों के मुख से ऐसे अनुचित वचन सुनना कोई नई बात नहीं है; यह संसार में स्त्रियों की स्वाभाविक प्रवृत्ति है।" इस प्रकार, वन में राम की करुण पुकार, सीता की व्याकुलता, और लक्ष्मण के प्रति उनके कठोर वचन, सब एक गहन, मार्मिक प्रसंग के रूप में प्रकट हुए।