अब मैं आपको वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के बाईसवें और तेईसवें सर्ग की कथा एक प्रवाहमयी, भावपूर्ण शैली में सुनाता हूँ। जब महर्षि वशिष्ठ ने अपनी बात पूरी की, तब अयोध्या के महाराज दशरथ अपने हर्ष से दमकते हुए मुख के साथ स्वयं राम और लक्ष्मण को बुलाते हैं। उस समय राम को उनकी माता, पिता दशरथ और कुलगुरु वशिष्ठ से मंगलमय संस्कार और आशीर्वाद प्राप्त होते हैं। पवित्र मंत्रों से उन्हें सुसज्जित कर, दशरथ अत्यंत प्रसन्न होकर राम को अपने अंक में भर लेते हैं, उनके सिर को सूँघते हैं और फिर उन्हें महर्षि विश्वामित्र के सुपुर्द कर देते हैं। जैसे ही कमलनयन राम विश्वामित्र के साथ चलने लगते हैं, एक शीतल और निर्मल वायु बहने लगती है। आकाश से पुष्पों की वर्षा होती है, दिव्य डुण्डुभियाँ बज उठती हैं, शंख और नगाड़ों की गूंज से वातावरण गूंज उठता है। विश्वामित्र आगे-आगे चलते हैं, उनके पीछे राम अपने धनुष के साथ, बाल्यावस्था के अनुरूप जटाजूट बांधे हुए चलते हैं, और उनके पीछे सौमित्रि लक्ष्मण चलते हैं। दोनों भाइयों के कंधों पर तरकश और हाथों में धनुष सुशोभित हैं, वे दसों दिशाओं को शोभित करते हुए विश्वामित्र के पीछे-पीछे ऐसे बढ़ रहे हैं जैसे तीन फनों वाले दो नाग हों। दोनों युवा, तेजस्वी और अनुपम सौन्दर्य से युक्त हैं, वे विश्वामित्र के पीछे-पीछे ऐसे चल रहे हैं जैसे अश्विनीकुमार अपने प्रपितामह के पीछे चलते हैं। वे दोनों, कलाई पर कड़े बांधे, कमर में तलवारें सजाए, धनुष-बाण से सुसज्जित, महर्षि विश्वामित्र के पीछे चलते हैं, और उनका तेज सम्पूर्ण वातावरण को आलोकित कर देता है। यात्रा करते हुए, वे शिव के समान अचिन्त्य और अग्निपुत्रों के समान तेजस्वी प्रतीत होते हैं। लगभग आधा योजन चलने के बाद वे सरयू नदी के दक्षिण तट पर पहुँचते हैं। वहाँ महर्षि विश्वामित्र स्नेहपूर्वक राम से कहते हैं, "पुत्र! समय व्यर्थ न जाए, अतः जल ग्रहण करो।" फिर वे राम को दो दिव्य विद्याएँ—बल और अतिबल—प्रदान करने का प्रस्ताव रखते हैं। वे कहते हैं, "इन विद्या के प्रभाव से तुम्हें कभी थकान, ज्वर या रूप में कोई विकार नहीं आएगा। कोई भी दुष्टात्मा तुम्हें सोते या असावधान अवस्था में भी परास्त नहीं कर सकेगा। तीनों लोकों में तुम्हारे समान कोई नहीं होगा।" विश्वामित्र आगे बताते हैं, "हे रघुनन्दन! बल और अतिबल समस्त विद्याओं की जननी हैं। जब तुम इनका अभ्यास करोगे, तब भूख-प्यास भी तुम्हें नहीं सताएगी और तुम्हारी कीर्ति पृथ्वी पर फैल जाएगी। ये दोनों ब्रह्मा की पुत्रियाँ हैं और इन्हें पाने योग्य केवल तुम ही हो, क्योंकि समस्त सद्गुण तुम में विद्यमान हैं।" विश्वामित्र की आज्ञा पाकर, निर्मल हृदय और प्रसन्न मुख वाले राम जल स्पर्श करते हैं और इन दोनों विद्याओं का ग्रहण करते हैं। उस समय सूर्य अपने सहस्त्र किरणों के साथ शरद ऋतु के समान प्रकाशित होता है। विश्वामित्र को समस्त कार्य सौंपकर वे तीनों—विश्वामित्र, राम और लक्ष्मण—सरयू के तट पर वह रात अत्यंत सुखपूर्वक व्यतीत करते हैं। राजा दशरथ के दोनों पुत्र उस तृणशय्या पर शयन करते हैं, विश्वामित्र उन्हें स्नेहपूर्वक वचन कहकर सेवा करते हैं, और वह रात मानो स्वयं आनंदमयी प्रतीत होती है। रात बीतने के बाद, महर्षि विश्वामित्र पत्तों की शय्या पर पड़े हुए राम को जगाते हैं और कहते हैं, "हे कौसल्या नंदन! प्रभात हो रहा है, उठो, नरश्रेष्ठ! अब दिव्य कृत्य करने का समय है।" मुनि के इस स्नेहपूर्ण आह्वान को सुनकर दोनों वीर कुमार जल से स्नान करते हैं, अर्घ्य अर्पित करते हैं और परम प्रार्थना का उच्चारण करते हैं। फिर वे अपने प्रातःकालीन कर्तव्यों को संपन्न कर, प्रसन्नचित्त होकर महर्षि विश्वामित्र को प्रणाम करते हैं और यात्रा के लिए तैयार हो जाते हैं। जब वे आगे बढ़ते हैं, तो सरयू के पवित्र संगम पर दिव्य त्रिवेणी नदी के दर्शन करते हैं। वहाँ उन्हें एक परम पवित्र आश्रम दिखाई पड़ता है, जहाँ ऋषि, जिन्होंने हजारों वर्षों तक कठिन तप किया था, निवास करते थे। उस आश्रम को देखकर दोनों रघुकुल कुमार अत्यंत प्रसन्न होते हैं और विश्वामित्र से पूछते हैं, "हे भगवन्! यह पावन आश्रम किसका है? यहाँ कौन निवास करता है? कृपया हमें बताइए, हमारी जिज्ञासा अत्यंत है।" ऋषि विश्वामित्र मुस्कराते हैं और कहते हैं, "राम! सुनो, यह प्राचीन आश्रम कामदेव का है, जिन्हें विद्वान लोग मन का देवता कहते हैं। एक समय शिवजी यहाँ कठोर तपस्या में लीन थे, तब नवविवाहित शिव जब मरुतों के साथ जा रहे थे, तब कामदेव ने उन्हें विचलित करने का प्रयास किया। शिव ने क्रोध में आकर केवल दृष्टिपात से कामदेव के सारे अंग भस्म कर दिए। उसी क्षण से कामदेव 'अनंग'—अशरीरी—कहलाए। जिस स्थान पर उनका शरीर गिरा, वह 'अंगविषय' नाम से प्रसिद्ध हुआ। यह वही पावन आश्रम है, यहाँ उनके प्राचीन शिष्य वास करते हैं, जो धर्मनिष्ठ और निष्पाप हैं।" इस प्रकार, विश्वामित्र की वाणी से राम और लक्ष्मण को उस पावन स्थान की महिमा और इतिहास का ज्ञान हुआ।