एक समय की बात है, जब रावण का आतंक चारों ओर फैला हुआ था। देवता, दानव, गंधर्व, यक्ष, पक्षी और नाग सभी उसकी शक्ति के आगे असहाय थे। ऐसे में, मनुष्य तो उसके सामने कुछ भी नहीं थे। रावण की युद्धकला और शक्ति इतनी प्रबल थी कि कोई भी उसके सामने खड़ा नहीं हो सकता था। उस समय एक महान ऋषि, कौशिक, राजा दशरथ के पास आए और अपनी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा, "हे राजन, मैं अपने बल पर या अपने पुत्रों के साथ रावण का सामना नहीं कर सकता। मेरे दो पुत्र, जो युद्ध में सुंद और उपसुंद के समान हैं, मैं उन्हें भी इस युद्ध में नहीं भेज सकता।" राजा दशरथ ने ऋषि की बातों को ध्यान से सुना और कहा, "मैं अपने पुत्रों को इस युद्ध में नहीं भेज सकता। वे मारीच और सुभाऊ जैसे शक्तिशाली और प्रशिक्षित योद्धाओं का सामना नहीं कर सकते।" यह सुनकर ऋषि कौशिक का मन क्रोध से भर गया, जैसे यज्ञ में अग्नि घी से प्रज्वलित हो जाती है। उनकी आंखों में क्रोध की चमक थी, और उन्होंने राजा से कहा, "क्या आप अपने वचन को तोड़ना चाहते हैं? यह रघु वंश के लिए उचित नहीं है। यदि यही आपका निर्णय है, तो मैं यहां से चला जाऊंगा।" इस पर, महान ऋषि वशिष्ठ ने राजा को समझाया, "हे राजन, आप इक्ष्वाकु वंश में जन्मे हैं, आप धर्म के अवतार हैं। राघव, जो धर्म के प्रति समर्पित हैं, उन्हें इस युद्ध में भेजना चाहिए। जो व्यक्ति वचन देता है और उसे पूरा नहीं करता, वह अपने पुण्य को नष्ट करता है।" उन्होंने कहा कि राघव, जो कि धर्म का अवतार हैं, राक्षसों से सुरक्षित रहेंगे। राजा दशरथ ने ऋषि की बातों को सुनकर संतोष पाया और राघव को भेजने का निर्णय लिया। उन्होंने अपने पुत्र राघव और लक्ष्मण को बुलाया। राजा ने उन्हें आशीर्वाद दिया और अपनी खुशी के साथ उन्हें ऋषि कौशिक के साथ भेजा। इस समय, जैसे ही राघव ने ऋषि के साथ यात्रा प्रारंभ की, एक हल्की, धूल रहित बयार चलने लगी। आसमान में फूलों की वर्षा होने लगी, और दिव्य ढोलों की आवाज गूंजने लगी। ऋषि वशिष्ठ के साथ चलते हुए, राघव और लक्ष्मण, धनुष और तीर लिए, युद्ध की तैयारी में थे। दोनों भाई, जो युवा और सुन्दर थे, अपनी शक्ति और तेज से भरे हुए, ऋषि के पीछे चल रहे थे। जैसे ही वे आगे बढ़े, ऐसा लगा कि समस्त सृष्टि ने उनके साथ मिलकर एक नई आशा का संचार किया। इस प्रकार, राघव और लक्ष्मण ने अपने साहस और धर्म के साथ एक नई यात्रा की शुरुआत की, जो उन्हें महानतम युद्ध की ओर ले जाने वाली थी।