कौशल्या अत्यंत दुःखी थीं, अपने पति और पुत्र से वंचित होकर शोक में डूबी हुई थीं। उस समय उन्होंने अपने मन को समझाने का प्रयास किया, लेकिन वे अपने दुःख में इतनी अभिभूत थीं कि अंततः मूर्छित होकर गिर पड़ीं। उधर, भरत भी अत्यंत पीड़ा से व्याकुल थे, उनका मन शोक से टूट चुका था। जब कौशल्या ने भरत को इस प्रकार कठोर शपथें लेते देखा, तो वे उनसे बोलीं, “पुत्र, तुम्हारी ये शपथें मेरे दुःख को और बढ़ा रही हैं, ऐसा लगता है कि तुम मेरी प्राण ही छीन रहे हो। सौभाग्य है कि तुम्हारा और लक्ष्मण का मन धर्म से नहीं डिगा। मेरे बच्चे, तुम अपनी प्रतिज्ञा में दृढ़ रहो, निश्चित ही तुम्हें पुण्यात्माओं के लोक की प्राप्ति होगी।” यह कहकर कौशल्या ने भरत को अपनी गोद में लिया, उनके बलशाली भुजाओं को गले लगाया और अश्रु बहाते हुए विलाप करने लगीं। इस प्रकार महान आत्मा भरत दुःख और पीड़ा से व्याकुल होकर विलाप करने लगे, उनका मन मोह और शोक के कारण व्याकुल हो गया। जब उन्हें सांत्वना दी जा रही थी, वे चेतना खो बैठे, बुद्धि भ्रमित हो गई, वे भूमि पर पड़े-पड़े बार-बार गहरी साँसें लेते रहे, और इसी प्रकार शोक में उनकी रात बीत गई। इस बीच, भरत के मन में यह भावना थी कि जिसने धर्मात्मा राम के वनगमन के लिए सहमति दी है, उस पर अनेक प्रकार के दोष और पाप लगें। वह निर्दयी व्यक्ति व्यर्थ ही दूध-भात खाए, अपने बड़ों का तिरस्कार करे; गायों को पाँव से छुए, अपने बड़ों की निंदा करे, मित्र से विश्वासघात करे; गुप्त दोष सबके सामने प्रकट करे; अकर्मण्य, कृतघ्न, निर्लज्ज और सबका तिरस्कृत बने; अपने घर में पुत्र, पत्नी और सेवकों से घिरा होकर भी अकेले उत्तम भोजन करे; योग्य पत्नी न पाए, संतानहीन मरे, धर्मकर्म न कर सके; अपना वंश नष्ट होते देखे, पत्नियों के कारण दुःखी रहे, पूर्ण आयु को न प्राप्त करे; राजा, स्त्री, बालक, वृद्ध की हत्या का पाप पाए, सेवक का त्याग करने का दोष लगे; सेवकों को लाक्षा, मधु, मांस, लोहा और विष देकर उनका पालन करे; युद्ध में शत्रु दल में भय उत्पन्न करके भागते हुए मारा जाए; सिर में खोपड़ी लिए, चिथड़ों में लिपटा, विक्षिप्त की भाँति भिक्षा माँगता फिरे; सदा मद्य, स्त्रियों और जुए में आसक्त रहे, काम और क्रोध से अभिभूत हो; उसका मन धर्म की ओर हो, फिर भी अधर्म का आचरण करे; अयोग्य को दान दे; जो धन उसने अनेक प्रकार से एकत्र किया हो, वह डाकुओं द्वारा लूट लिया जाए; जो दोष दोनों संध्या में सोने वाले को लगता है, वही दोष उस पर आए; जो अग्निहोत्र की उपेक्षा करता है, गुरु-पत्नी का उल्लंघन करता है या मित्र से विश्वासघात करता है, उसका पाप उसे मिले; वह देवताओं, पितरों, माता-पिता की सेवा कभी न कर सके; पुण्यात्माओं के लोक, यश और धर्म से उसी दिन गिर जाए; वह अपनी माता की सेवा छोड़ दे और व्यर्थ ही खड़ा रहे; अनेक पुत्रों के होते हुए भी निर्धन, ज्वर और रोग से पीड़ित, सदा दुःखी रहे; समान, दुःखी, आशावान और याचकों से झूठा वचन दे; छल में ही सदा आनंद ले, कठोर, निंदक, अपवित्र और राजा से भयभीत, अधार्मिक स्वभाव का हो; वह पापी शुद्ध और योग्य पत्नी के साथ पापाचार करे; अपनी धर्मपत्नी को छोड़, दूसरों की स्त्रियों में आसक्त हो, उसका मन धर्म से विमुख हो जाए; ब्राह्मण whose वंश नष्ट हो, उसका पाप उसे मिले; जल को अशुद्ध करने या विष देने का दोष उसे मिले; अपवित्र इंद्रियों से ब्राह्मण के लिए होने वाली पूजा में विघ्न डाले, बछड़े के लिए दुहाई जा रही गाय का दूध स्वयं ले ले; जल होते हुए भी प्यासे को धोखा दे; जब दूसरे लोग उसके सामने धर्म के लिए तर्क करें, वह उनके पाप का भागी बने। इस प्रकार जब कौशल्या ने भरत को इस प्रकार शोक में डूबा देखा, तो उन्होंने उसे अपनी गोद में लेकर ढाढस बंधाया। भरत, जो अपने भाइयों को अत्यंत प्रिय मानते थे, अपनी माता की गोद में सिर रखकर रो पड़े। शोक और मोह से अभिभूत भरत को जब संतावना दी जा रही थी, वे चेतना खो बैठे, भूमि पर पड़े-पड़े गहरी साँसें लेते रहे, और शोक में ही उनकी रात बीत गई। उधर, जब भरत इस प्रकार शोक से व्याकुल थे, तभी वसिष्ठ, जो वाक्-पटु और श्रेष्ठ ऋषि थे, ने भरत से कहा, “हे महाबाहु, श्रेष्ठ कुल में जन्मे भरत! अब शोक छोड़ो, क्योंकि यह उचित समय है कि तुम राजर्षि दशरथ के अंतिम संस्कार के कर्तव्य का पालन करो।” वसिष्ठ के इन वचनों को सुनकर भरत ने स्वयं को संभाला और धर्म का ज्ञान रखते हुए, पिता के अंतिम संस्कार की समस्त व्यवस्थाएँ करने लगे। यही कथा वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड के छिहत्तरवें सर्ग में विस्तार से कही गई है।