एक समय की बात है, जब अंग देश के राजा, रोमपद, ने अपने मंत्रियों के साथ मिलकर एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया। उन्होंने कहा, "हम ऋष्यश्रृंग, जो एक महान ऋषि के पुत्र हैं, को यहाँ लाएंगे। इसमें कोई दोष नहीं है।" इस प्रकार, अंग के राजा ने सुंदर अप्सराओं को भेजा ताकि वे ऋष्यश्रृंग को अपने जाल में फंसा सकें। जब ऋष्यश्रृंग, जो जंगल में तप और अध्ययन में लीन थे, वहाँ आए, तो आसमान में बारिश होने लगी और शांता, जो राजा की पुत्री थी, उन्हें सौंपी गई। इस प्रकार, ऋष्यश्रृंग राजा का दामाद बन गए और राजा को पुत्रों का आशीर्वाद देने का वचन दिया। राजा दशरथ ने इस घटना से अत्यंत प्रसन्न होकर अपने मंत्री सुमंत्र से पूछा कि ऋष्यश्रृंग को यहाँ लाने का उपाय क्या था। सुमंत्र ने कहा, "मैं आपको बताता हूँ कि कैसे हमने ऋष्यश्रृंग को यहाँ लाने का उपाय किया।" राजा रोमपद और उनके मंत्रियों ने एक ऐसा उपाय निकाला जो सुरक्षित और दोषरहित था। ऋष्यश्रृंग, जो कि जंगल में तपस्वी जीवन जीते थे, महिलाओं और भौतिक सुख-सुविधाओं से अनजान थे। इसलिए, उन्होंने सोचा कि सुंदर और आकर्षक वस्तुओं के माध्यम से ऋष्यश्रृंग को शहर लाया जाएगा। इस योजना के अनुसार, अप्सराएँ, जो भव्य वस्त्रों में सजी थीं, जंगल में गईं। जब वे ऋष्यश्रृंग के पास पहुँचीं, तो उन्होंने उसे अपने स्वर से लुभाने का प्रयास किया। उन्होंने पूछा, "हे ब्राह्मण, तुम यहाँ क्या कर रहे हो? तुम इस भयावह और सुनसान जंगल में अकेले क्यों घूम रहे हो?" उन महिलाओं की सुंदरता और मधुर आवाज़ ने ऋष्यश्रृंग के मन में जिज्ञासा उत्पन्न की। उन्होंने उन्हें बताया, "मैं विभंडक का पुत्र हूँ, और मेरा नाम ऋष्यश्रृंग है। हमारा आश्रम निकट ही है, मैं तुम्हें यहाँ उचित आतिथ्य प्रदान करूँगा।" महिलाएँ उनके आतिथ्य को स्वीकार कर उनके आश्रम गईं। वहाँ ऋष्यश्रृंग ने उन्हें जल, फल और कंद-मूल प्रदान किए। उन महिलाओं ने ऋष्यश्रृंग को मिठाई और अन्य स्वादिष्ट भोजन भी दिए। ऋष्यश्रृंग ने उन फलों का स्वाद लिया, जो उन्होंने पहले कभी नहीं चखे थे। लेकिन जब उन्हें अपने पिता का भय सताने लगा, तो वे वहाँ से जल्दी चली गईं। अगले दिन, ऋष्यश्रृंग अपने मन में उन महिलाओं की यादों के साथ भ्रमण करने लगे। तभी, वह उन महिलाओं को फिर से देखते हैं, जो फिर से उसे अपने आश्रम में बुलाने आई थीं। उन्होंने कहा, "आओ, हमारे आश्रम में चलो, यहाँ कई अद्भुत फल और कंद-मूल हैं। तुम्हारे लिए यहाँ विशेष भाग्य का उदय होगा।" ऋष्यश्रृंग ने उनकी बातें सुनकर जाने का निश्चय किया और महिलाएँ उसे वहाँ ले गईं। जैसे ही ऋष्यश्रृंग वहाँ पहुँचे, आकाश में देवताओं ने वर्षा की, जिससे संसार में आनंद छा गया। राजा दशरथ ने ऋष्यश्रृंग का स्वागत किया, अपने सिर को भूमि पर झुकाते हुए। उन्होंने उन्हें उचित सम्मान के साथ जल प्रदान किया और ऋष्यश्रृंग की कृपा प्राप्त करने की प्रार्थना की। राजा ने उन्हें अपने महल के अंदर ले जाकर अपनी पुत्री शांता को उन्हें सौंप दिया। इस प्रकार, ऋष्यश्रृंग ने वहाँ निवास किया, जहाँ उन्हें हर प्रकार की इच्छाओं की पूर्ति हुई, और उन्होंने शांता के साथ सुखमय जीवन व्यतीत किया। इस प्रकार, यह कथा ऋष्यश्रृंग की और राजा दशरथ की महानता को दर्शाती है, जो सत्य और धर्म के मार्ग पर चलते हुए अपने राज्य का कल्याण चाहते थे।