एक समय की बात है, जब एक महान ऋषि, संतकुमार, ने कहा था कि एक अद्भुत कहानी है। इस कहानी में, एक राजा, जिसका नाम रोमपद था, अपने मंत्रियों और पुरोहितों के साथ बैठा था। उन्होंने यह सुना कि कश्यप नामक एक ऋषि का पुत्र है, जिसका नाम विभाण्डक है। विभाण्डक का एक पुत्र होगा, जिसे ऋष्यश्रृंग कहा जाएगा। यह बालक हमेशा जंगल में रहकर साधु की तरह जीवन बिताएगा, अपने पिता का अनुसरण करते हुए। वह एक महान ब्रह्मण होगा, जो ब्रह्मचर्य का पालन करेगा। समय बीतने के साथ, ऋष्यश्रृंग ने अपनी साधना और अग्नि की सेवा करते हुए अपने जीवन का एक हिस्सा बिताया। इसी बीच, रोमपद ने सुना कि एक शक्तिशाली राजा, जो अंग देश का था, एक भयानक संकट में पड़ने वाला है। उस राजा ने विद्वान ब्राह्मणों को बुलाया और उनसे कहा, "आप लोग मुझे सही विधि और प्रायश्चित बताएं।" ब्राह्मणों ने राजा को सलाह दी कि विभाण्डक के पुत्र ऋष्यश्रृंग को यहाँ लाने का प्रयास करें और उसकी शादी अपनी पुत्री शांता से करें। राजा रोमपद ने अपने मंत्रियों के साथ विचार-विमर्श किया, लेकिन जब उन्होंने ऋष्यश्रृंग के बारे में सुना, तो वे चिंतित हो गए। वे ऋषि के डर से वहाँ जाने में हिचकिचा रहे थे। अंत में, उन्होंने राजा से कहा कि वे ऋष्यश्रृंग को यहाँ लाने का प्रयास करेंगे। इस प्रकार, अंग के राजा ने ऋष्यश्रृंग को दरबारी नर्तकियों के माध्यम से बुलाने का निर्णय लिया। जब ऋष्यश्रृंग वहाँ पहुँचे, तो बारिश हुई और शांता का विवाह ऋष्यश्रृंग से हुआ। इस प्रकार, ऋष्यश्रृंग राजा के दामाद बने और उन्होंने राजा को पुत्र देने का आश्वासन दिया। इसके बाद, राजा दशरथ ने सुमंत्र से कहा, "मुझे बताओ कि ऋष्यश्रृंग को यहाँ कैसे लाया गया।" सुमंत्र ने राजा को बताया कि रोमपद और उसके मंत्रियों ने एक सुरक्षित योजना बनाई थी। ऋष्यश्रृंग, जो जंगल में तपस्या कर रहा था, महिलाओं और भौतिक सुखों से अनजान था। इसलिए, उन्होंने सुंदर नर्तकियों को भेजने का निश्चय किया, जो उसे आकर्षित करेंगी। जब नर्तकियाँ जंगल में पहुँचीं, तो ऋष्यश्रृंग ने उन्हें देखा। उन महिलाओं ने उसे पूछा, "हे ब्राह्मण, तुम यहाँ क्या कर रहे हो?" ऋष्यश्रृंग ने उन्हें बताया कि वह विभाण्डक का पुत्र है और अपने पिता के साथ साधना कर रहा है। उन महिलाओं ने उसके साथ आने का निश्चय किया और उसके आश्रम में पहुँचीं। वहाँ, ऋष्यश्रृंग ने उन्हें उचित आतिथ्य दिया और उन्हें फल और भोजन प्रस्तुत किया। महिलाएँ, जो पहले कभी ऋष्यश्रृंग के पास नहीं आई थीं, उनके साथ समय बिताने के बाद, उनके मन में एक नई भावना जागृत हुई। उन्होंने उसे अपने सबसे अच्छे फल भेंट किए और उसके साथ मिठाइयाँ साझा कीं। ऋष्यश्रृंग ने उन फलों का स्वाद लिया, जो उसने पहले कभी नहीं चखे थे। अंत में, उन महिलाओं ने ऋष्यश्रृंग को अलविदा कहा, और डरते-डरते वापस लौट गईं। इस प्रकार, ऋष्यश्रृंग को लाने की योजना सफल हुई और राजा रोमपद ने अपनी पुत्री का विवाह उसके साथ किया। यह सब संतानकुमार द्वारा सुनाई गई कहानी का हिस्सा था, जिसे राजा दशरथ ने ध्यान से सुना।