राजा दशरथ ने अपने यज्ञ के विषय में विचार करते हुए कहा, ‘‘यदि कोई यज्ञ विधिपूर्वक न किया जाए तो यजमान का शीघ्र ही सर्वनाश हो जाता है; अतः मेरा यह यज्ञ नियमों के अनुसार ही पूर्ण हो।’’ उन्होंने आगे आदेश दिया, ‘‘जो सक्षम हैं, वे सभी आवश्यक व्यवस्थाएँ करें।’’ यह सुनकर सभी प्रतिष्ठित मंत्रियों ने आदरपूर्वक उत्तर दिया, ‘‘जैसा आप कहें।’’ राजा के वचनों को सुनकर, वे धर्मज्ञ द्विज—जो धर्म में निपुण थे—राजा को उत्साहित करने लगे। इसके बाद, राजा की अनुमति लेकर वे सभी ब्राह्मण वहाँ से चले गए। ब्राह्मणों को विदा करके राजा ने अपने मंत्रियों से कहा, ‘‘यज्ञ का आयोजन वैसा ही हो जैसा यज्ञ के आचार्यगण निर्देश दें।’’ मंत्रियों को भी विदा कर, बुद्धिमान राजा अपने महल में प्रवेश कर गए। वहाँ वे अपनी प्रिय रानियों के पास गए। अपने हृदय के प्रिय राजा को देखकर रानियाँ प्रसन्न हुईं। राजा ने उनसे कहा, ‘‘आप सब दीक्षा का व्रत लें; मैं पुत्र की प्राप्ति के लिए यज्ञ करूँगा।’’ राजा के मनोहर वचनों से रानियों के मुखकमल शीतकाल के अंत में खिले हुए कमलों की भाँति दमक उठे। अब श्री वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड का नवम सर्ग सुनिए। राजा के साथ एकांत में सारथी सुमंत्र ने कहा, ‘‘राजन्, मैं आपको प्राचीन समय की वह कथा सुनाता हूँ, जो मैंने पूर्वजों से सुनी है। यह कथा मैंने यज्ञ के आचार्यों के निर्देशानुसार पूर्व में सुनी थी; महर्षि सनत्कुमार ने इसे बताया था।’’ सुमंत्र ने आगे कहा, ‘‘ऋषियों की सभा में, आपके पुत्र के आगमन के संदर्भ में, यह बताया गया था कि कश्यप के पुत्र विभाण्डक नामक एक महर्षि हैं। उनके पुत्र का नाम ऋष्यशृंग होगा, जो सदा वन में रहते हुए तपस्वी जीवन व्यतीत करेगा। वह श्रेष्ठ ब्राह्मण अपने पिता के अतिरिक्त किसी को नहीं जानता, सदैव ब्रह्मचर्य का कठोर पालन करता है। यह कथा जनसामान्य में प्रसिद्ध है और ब्राह्मणों द्वारा बार-बार कही जाती है। ऐसे ही रहते हुए एक समय की बात है— जब ऋष्यशृंग अपने पिता के साथ अग्नि की सेवा कर रहा था, उस समय अंगदेश के राजा रोमपाद का बड़ा यश फैला। वह वीर्यवान राजा अंगदेश में प्रसिद्ध हुआ। लेकिन राजा के किसी अपराध के कारण वहाँ भयंकर संकट आ गया। उस विपत्ति से बचने के लिए राजा ने विद्वान ब्राह्मणों को बुलाया और उनसे कहा, ‘‘आप सब शास्त्रों के ज्ञाता हैं, मुझे उचित प्रायश्चित्त और विधान बताइए।’’ ब्राह्मणों ने उत्तर दिया, ‘‘राजन्, किसी भी उपाय से विभाण्डक के पुत्र ऋष्यशृंग को यहाँ लाएँ। फिर उनका यथोचित सम्मान करें और अपनी पुत्री शान्ता का विवाह उनसे वेदविधि से सम्पन्न करें।’’ यह सुनकर राजा सोच में पड़ गया कि उस महान ऋषि को किस प्रकार लाया जाए। मंत्रणा के बाद राजा ने अपने पुरोहित और मंत्रियों को आदरपूर्वक आज्ञा दी कि वे प्रयास करें। लेकिन राजा की आज्ञा सुनकर वे सभी भयभीत और चिंतित हो गए, क्योंकि वे ऋषि के तेज से डरते थे; अतः उन्होंने राजा को समझाने का प्रयास किया। कुछ विचार-विमर्श के बाद उन्होंने कहा, ‘‘राजन्, हम ऋषि को यहाँ लाएँगे, इसमें कोई दोष नहीं होगा।’’ इसी प्रकार अंगदेश के राजा ने विभाण्डक के पुत्र ऋष्यशृंग को गणिकाओं के माध्यम से बुलवाया; तब वर्षा हुई और शान्ता का विवाह ऋष्यशृंग से सम्पन्न हुआ। ऋष्यशृंग आपके समधी बने और वे आपको पुत्र प्राप्ति का वर देंगे—इतना सनत्कुमार द्वारा कथित मैंने आपको कह दिया। यह सुनकर दशरथ जी प्रसन्न होकर सुमंत्र से बोले, ‘‘बताओ, ऋष्यशृंग को यहाँ किस प्रकार लाया गया?’’ अब श्री वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड का दसवाँ सर्ग सुनिए। राजा की प्रेरणा पर सुमंत्र ने कहा, ‘‘हे राजन्, मैं और मंत्रीगण, सबको विस्तार से सुनाता हूँ कि ऋष्यशृंग को यहाँ कैसे लाया गया।’’ राजा रोमपाद ने अपने मंत्रियों और पुरोहित से कहा, ‘‘हमने एक ऐसा उपाय सोचा है, जिसमें कोई दोष नहीं।’’ ऋष्यशृंग, जो वन में तपस्या और वेदाध्ययन में लीन हैं, वे न स्त्री को जानते हैं, न भोग-विलास या सांसारिक सुखों का अनुभव उन्हें है। अतः हम मन को मोहित करने वाले रमणीय भोग-विलास के साधनों द्वारा, उन्हें शीघ्र नगर में लाएँगे—यही निश्चय हुआ। फिर सुंदर वस्त्राभूषणों से सजी हुई गणिकाएँ भेजी गईं; वे विविध उपायों से उन्हें आकर्षित करेंगी और आदरपूर्वक उन्हें यहाँ लाएँगी। राजा ने यह सुनकर पुरोहित से कहा, ‘‘तथास्तु।’’ पुरोहित और मंत्रीगण उसी प्रकार कार्य करने लगे। गणिकाएँ वन में पहुँचीं और आश्रम के समीप ऋष्यशृंग से मिलने का प्रयास करने लगीं। ऋष्यशृंग, जो सदैव अपने पिता के साथ आश्रम में रहते थे, कभी दूर नहीं जाते थे और बड़े संतुष्ट रहते थे। जन्म से ही उन्होंने न कभी किसी स्त्री, न पुरुष, न नगर या राज्य के किसी अन्य प्राणी को देखा था। वे सुंदर वस्त्रों में सजी, मधुर स्वर में गाने वाली स्त्रियाँ ऋष्यशृंग के पास पहुँचीं और उनसे बोलीं, ‘‘हे ब्राह्मण, आप कौन हैं? यहाँ क्या कर रहे हैं? हम जानना चाहती हैं। आप इस निर्जन, भयानक वन में अकेले घूमते हैं, बताइए।’’ उन अनुपम रूपवती स्त्रियों को देखकर, जिनका स्वरूप उन्होंने पहले कभी न देखा था, ऋष्यशृंग का मन विचलित हुआ और उन्होंने उन्हें अपने पिता के विषय में बताने का निश्चय किया।