राजा दशरथ के दरबार में सभी ब्राह्मणजन अत्यंत प्रसन्न होकर बोले, “हे महाराज, यज्ञ की सारी सामग्री एकत्रित की जाए और अश्व को विधिपूर्वक छोड़ दिया जाए।” वे आगे बोले, “सरयू नदी के उत्तरी तट पर यज्ञ का मंडप तैयार हो। हे राजन, इस यज्ञ के द्वारा आपको निश्चित ही पुत्र की प्राप्ति होगी, जैसा कि आप चाहते हैं।” ब्राह्मणों ने कहा, “चूंकि आपके मन में पुत्र की कामना से धर्मयुक्त संकल्प उत्पन्न हुआ है, अतः यह आपके लिए कल्याणकारी होगा।” इन शुभ वचनों को सुनकर राजा दशरथ का हृदय हर्ष और उत्साह से भर गया। उनकी आँखों में प्रसन्नता झलक उठी और उन्होंने अपने मंत्रियों से कहा, “यहाँ यज्ञ के लिए सभी आवश्यक तैयारियाँ की जाएँ, जैसा कि हमारे पूर्वजों ने बताया है।” राजा ने आदेश दिया, “अश्व को उसके आचार्य के साथ विधिपूर्वक छोड़ दिया जाए और यज्ञस्थल सरयू के उत्तरी तट पर तैयार किया जाए। सभी शांति के अनुष्ठान भी परंपरा के अनुसार संपन्न हों; यह यज्ञ कोई भी समर्थ राजा कर सकता है। इस श्रेष्ठ यज्ञ में कोई बड़ी भूल न हो, क्योंकि विद्वान ब्रह्मराक्षस सदैव त्रुटि की खोज में रहते हैं। यदि यज्ञ विधिपूर्वक न किया जाए, तो यजमान का सर्वनाश हो जाता है। अतः मेरा यह यज्ञ पूर्ण विधि-विधान से संपन्न हो।” राजा ने पुनः कहा, “जो भी योग्य हैं, वे सभी आवश्यक प्रबंध करें।” सभी सम्मानित मंत्रियों ने उत्तर दिया, “जैसा आदेश।” राजा के वचनों को सुनकर वे धर्मज्ञ द्विजाति ब्राह्मणजन भी राजा को प्रोत्साहित करने लगे। अनुमति मिलने पर वे सभी ब्राह्मण जैसे आए थे, वैसे ही विदा हो गए। तब राजा दशरथ ने अपने मंत्रियों से कहा, “यज्ञ का आयोजन यथावत् याजकों के निर्देशानुसार हो।” इसके बाद, बुद्धिमान राजा अपने महल में चले गए और अपनी प्रिय रानियों के पास गए। वहाँ उन्होंने स्नेहपूर्वक कहा, “आप सब दीक्षा का व्रत धारण करें; मैं पुत्रेष्टि यज्ञ करने जा रहा हूँ।” राजा के इन प्रिय वचनों से रानियों के मुख शरद ऋतु के अंत में खिले कमलों की भाँति दमक उठे। अब महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित पावन रामायण के बालकांड के नवम सर्ग का वर्णन सुनिए। एकांत में यह सब सुनने के बाद सारथी सुमंत्र ने राजा से कहा, “हे महाराज, प्राचीन समय की जो कथा मैंने सुनी है, वह आपको सुनाता हूँ। यह कथा मैंने पहले भी याजकों के निर्देशानुसार सुनी थी; महामुनि सनत्कुमार ने इसे बताया था।” सुमंत्र ने कहा, “हे राजन, मुनियों के समक्ष, आपके पुत्र के आगमन के विषय में, यह बताया गया था कि कश्यप के वंश में विभांडक नामक एक महर्षि हैं। उनके पुत्र का नाम ऋश्यश्रृंग होगा, जो सदा वन में रहकर तपस्वी जीवन व्यतीत करेगा। वह श्रेष्ठ ब्राह्मण अपने पिता के सिवा किसी अन्य को नहीं जानता, और दो प्रकार की ब्रह्मचर्य की कठोर साधना करता है। यह कथा लोक में प्रसिद्ध है और ब्राह्मणजन इसे सदा कहते हैं। जब वह इस प्रकार जीवन व्यतीत कर रहा था, तभी समय का चक्र आगे बढ़ा।” “उसी समय, जब वह अपने पिता के साथ अग्निसेवा में तत्पर था, अंगदेश में प्रतापी राजा रोमपाद का यश फैल गया। वह राजा बड़ा पराक्रमी था, लेकिन एक अपराध के कारण उसके राज्य में भयंकर संकट आ गया।” “राजा रोमपाद ने विद्वान ब्राह्मणों को बुलाकर कहा, ‘आप सब शास्त्रों के ज्ञाता और लोकाचार के जानकार हैं, मुझे बताइए कि मुझे कौन-सा प्रायश्चित्त और अनुष्ठान करना चाहिए।’ तब ब्राह्मणों ने उत्तर दिया, ‘हे राजन, किसी भी उपाय से विभांडक के पुत्र ऋश्यश्रृंग को यहाँ लाया जाए।’” “राजा को सलाह दी गई कि ऋश्यश्रृंग को आदर सहित आमंत्रित करें और अपनी पुत्री शांता का विवाह उनसे विधिपूर्वक संपन्न करें। यह सुनकर राजा सोच में पड़ गया कि वह महान ऋषि किस प्रकार यहाँ लाया जाए। मंत्रणा के बाद, राजा ने अपने पुरोहितों और मंत्रियों को आदरपूर्वक भेजने का निश्चय किया। परंतु जब वे लोग राजा का आदेश सुनकर वहाँ जाने लगे, तो ऋषि के तेज से भयभीत होकर वे संकोच करने लगे और राजा को समझाने लगे कि यह कार्य कठिन है। विचार-विमर्श के बाद वे बोले, ‘हम ऋषि को यहाँ ले आएँगे, इसमें कोई दोष नहीं होगा।’ इसी प्रकार अंगदेश के राजा रोमपाद ने कुछ वेश्याओं के माध्यम से ऋश्यश्रृंग को लाया; तब वर्षा हुई और शांता का विवाह ऋश्यश्रृंग से हुआ।” “ऋश्यश्रृंग आपके समधी बने और वे आपको पुत्र प्राप्ति का वर देंगे। यह कथा मैंने सनत्कुमार से सुनी थी, और अब आपको सुना दी।” यह सुनकर राजा दशरथ हर्षित हुए और सुमंत्र से बोले, “मुझे विस्तार से बताओ कि ऋश्यश्रृंग किस प्रकार यहाँ लाए गए थे।” अब वाल्मीकि रामायण के बालकांड के दशम सर्ग का वर्णन सुनिए। राजा के आग्रह पर सुमंत्र ने कहा, “हे राजन, आप और आपके मंत्रीगण सुनें, मैं बताता हूँ कि ऋश्यश्रृंग को कैसे लाया गया।” राजा रोमपाद ने अपने मंत्रियों और पुरोहित के साथ विचार कर कहा, “हमने एक ऐसा उपाय खोजा है, जिसमें कोई दोष या संकट नहीं है। ऋश्यश्रृंग वन में रहते हैं, वे तप और वेदाध्ययन में रत हैं, और स्त्रियों, भोग-विलास या सांसारिक सुखों से अनभिज्ञ हैं। हम मन को आकर्षित करने वाली, मनोहर इंद्रियों के विषयों के माध्यम से उन्हें शीघ्र नगर ला सकते हैं; यही हमारा निश्चय है।” “अतः सुंदर और अलंकारों से सुसज्जित वेश्याएँ वहाँ जाएँ और विभिन्न प्रकार के प्रलोभन और विनम्र व्यवहार से ऋश्यश्रृंग को यहाँ ले आएँ; उनका यथोचित सम्मान किया जाए।” इस प्रकार, राजा दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ की तैयारी, ऋश्यश्रृंग मुनि के आगमन की कथा, और आगे की योजना विधिपूर्वक संपन्न हुई, जैसा कि शास्त्रों में वर्णित है।