एक समय की बात है, जब एक महान ऋषि, नारद, अपने शिष्य वाल्मीकि के पास आए। उन्होंने कहा, "हे ऋषि, मुझे एक ऐसे व्यक्ति के बारे में बताओ, जो आत्म-नियंत्रित हो, जिसने क्रोध पर विजय प्राप्त की हो, और जिसकी महिमा देखकर देवता भी डरते हों। मेरी जिज्ञासा बहुत बड़ी है।" नारद की बात सुनकर वाल्मीकि ने मुस्कुराते हुए कहा, "सुनो, मैं तुम्हें ऐसे व्यक्ति के बारे में बताता हूँ। वह राम है, जो इक्ष्वाकु वंश में जन्मा है। वह आत्म-नियंत्रित, शक्तिशाली, तेजस्वी और दृढ़ निश्चयी है।" राम के पास अनेक गुण हैं। वह बुद्धिमान, व्यवहार में विवेकी, भाषण में कुशल और शत्रुओं का नाशक है। उसकी काया का वर्णन करते हुए कहा गया कि उसकी छाती चौड़ी है, उसकी बाहें लंबी हैं, और उसका चेहरा चंद्रमा की तरह सुंदर है। उसके पास सभी गुण हैं, और वह सदा सत्य का पालन करता है। राम धर्म का रक्षक, जीवों का संरक्षक और ज्ञान का भंडार है। उसकी उपस्थिति में सभी लोग उसकी ओर आकर्षित होते हैं, जैसे नदियाँ समुद्र की ओर। राम के गुणों की चर्चा करते हुए वाल्मीकि ने कहा, "वह कौसल्या का आनंद है, धैर्य में हिमालय के समान है, और वीरता में विष्णु के समान है।" वह अपने पिता दशरथ का प्रिय पुत्र था, जो लोगों के कल्याण के लिए समर्पित था। दशरथ ने राम को राजगद्दी पर बैठाने की इच्छा की, लेकिन रानी कैकेयी ने अपने पूर्व में मिले वरदान का उपयोग करते हुए राम के वनवास और भरत के राजतिलक की मांग की। सत्य के बंधनों में बंधे दशरथ, अपने प्रिय पुत्र राम को वन में भेजने के लिए मजबूर हो गए। राम ने अपने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए वन में जाने का निर्णय लिया। उनके साथ उनके प्रिय भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता भी थीं। सीता, जो जनक की पुत्री थीं, राम के साथ चलने लगीं, जैसे रोहिणी चंद्रमा के साथ चलती है। वे सभी मिलकर वन की ओर बढ़े, जहाँ उन्होंने कई नदियों को पार किया और चित्रकूट पहुंचकर एक सुखद निवास बनाया। वहाँ वे देवताओं और गंधर्वों की भांति आनंदित जीवन जीने लगे। इस बीच, दशरथ अपने पुत्र के लिए दुखी होकर स्वर्ग सिधार गए। भरत, जो राज्य का उत्तराधिकारी था, राम की चरणों में जाकर उनसे अनुमति मांगने के लिए वन में गया। उसने राम से कहा, "आप ही राजा हैं, आप ही धर्म के ज्ञाता हैं।" लेकिन राम ने अपने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए राजगद्दी को अस्वीकार कर दिया। भरत ने राम के चरणों को छूकर लौटने का निश्चय किया और नंदिग्राम में राम की वापसी की प्रतीक्षा करने लगा। राम ने जब देखा कि नगरवासी उनसे मिलने आ रहे हैं, तो उन्होंने ध्यान लगाते हुए दंडक वन में प्रवेश किया। वहाँ उन्होंने वीराधा नामक राक्षस का वध किया और ऋषि शारभंग से मिले। उन्होंने ऋषि अगस्त्य से भी भेंट की और उनसे इंद्र का धनुष प्राप्त किया। राम ने वनवास के दौरान अनेक अद्भुत अनुभव किए और वनवासियों के साथ समय बिताया। इस प्रकार, राम का जीवन अनेक गुणों और घटनाओं से भरा हुआ था, जो उन्हें एक महान नायक और धर्म के रक्षक बनाता है। उनकी कथा आज भी लोगों के दिलों में जीवित है, और उनके गुणों का गुणगान किया जाता है।