इक्ष्वाकु वंश के तेजस्वी शत्रुघ्न, जिन्होंने लवणासुर का वध कर दिया था, अपनी विजय के बाद उस रमणीय नगरी से अयोध्या पहुँचे। वे महान् बलशाली शत्रुघ्न सीधे भगवान राम के पास गए, जो अपने मंत्रियों के साथ सभा में विराजमान थे। राम का मुख पूर्णिमा के चंद्रमा के समान दीप्तिमान था, और वे अमर देवताओं से घिरे हुए थे, जैसे इंद्र अपने दरबार में रहता है। शत्रुघ्न ने उन तेजोमय, महात्मा राम को साष्टांग प्रणाम किया और हाथ जोड़कर विनम्रता से बोले, ‘‘हे महाबली राजन्! आपकी आज्ञा के अनुसार सब कार्य पूर्ण हो गया है। वह दुष्ट लवणासुर मारा गया है और उसकी नगरी भी स्थापित कर दी गई है।’’ फिर शत्रुघ्न ने भावुक होकर कहा, ‘‘हे रघुकुल भूषण! आपसे बिछुड़े बारह वर्ष बीत गए हैं। अब मैं आपके बिना रहना सहन नहीं कर सकता। मुझे अपनी कृपा दिखाइए, हे काकुत्स्थ! जैसे बछड़ा बिना माता के नहीं रह सकता, वैसे ही मैं भी आपके बिना अधिक दिन नहीं रह सकता।’’ शत्रुघ्न की ऐसी बातें सुनकर राम ने उन्हें अपने गले से लगा लिया और स्नेहपूर्वक बोले, ‘‘हे वीर, दुःखी मत हो। क्षत्रिय के लिए ऐसा व्यवहार उचित नहीं है। हे राघव! राजा कभी भी वनवास या अलगाव में मनोबल नहीं खोते। प्रजा की रक्षा करना हमारा धर्म है। समय-समय पर अयोध्या आकर मुझसे मिल लिया करो, फिर अपनी नगरी लौट जाना। तुम मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय हो, इसमें संदेह नहीं; परंतु राज्य की रक्षा करना भी आवश्यक है।’’ फिर राम ने आदेश दिया, ‘‘हे काकुत्स्थ वंशी शत्रुघ्न! यहाँ सात रात्रियाँ ठहरो, उसके बाद अपने सेवकों, सेना और रथादि के साथ मधुरा लौट जाना।’’ राम के ये धर्मयुक्त, हृदय से निकले वचन सुनकर शत्रुघ्न ने दुःखी स्वर में ‘‘तथास्तु’’ कहा। फिर शत्रुघ्न, जैसा राम ने कहा था, सात दिनों तक वहाँ रहे। सात दिन बाद उन्होंने राम, भरत और लक्ष्मण से विदा ली और अपने विशाल रथ पर चढ़कर अपनी नगरी की ओर प्रस्थान किया। भरत और लक्ष्मण ने उन्हें काफी दूर तक विदा किया, फिर शत्रुघ्न शीघ्र ही अपनी नगरी लौट गए। इस प्रकार महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित पावन रामायण के उत्तरकाण्ड का बहत्तरवाँ सर्ग समाप्त होता है। शत्रुघ्न को उनके भाइयों सहित विदा कर, राम धर्मानुसार राज्य का पालन करते हुए प्रसन्नतापूर्वक राज करने लगे। कुछ ही दिनों के बाद, गाँव से एक वृद्ध ब्राह्मण अपने मृत बालक को गोद में लेकर राजमहल के द्वार पर आया। वह ब्राह्मण बड़े दुःख और करुणा से भरे शब्दों में बार-बार विलाप करने लगा, ‘‘हाय मेरे पुत्र, मेरे पुत्र!’’ वह विलाप करता रहा, ‘‘मैंने कौन सा पाप पूर्व जन्म में किया था, जो आज मुझे अपने इकलौते पुत्र को मृत देखना पड़ रहा है? मेरा बालक, जो अभी किशोर भी नहीं हुआ था, केवल पाँच वर्ष का था, समय से पहले ही मृत्यु को प्राप्त हो गया और मुझे शोक के गर्त में डाल गया। कुछ ही दिनों में, निस्संदेह, मैं और तुम्हारी माता भी तुम्हारे वियोग में प्राण त्याग देंगे। मैंने कभी असत्य नहीं बोला, न किसी पर हिंसा की, न ही किसी जीव के प्रति कोई बुरा कार्य किया। किसके पाप से मेरा यह बालक, जो अभी बाल्यावस्था में था, अपने पिता की सेवा किए बिना ही यमलोक चला गया? मैंने न कभी सुना, न देखा कि राम के राज्य में समय से पहले किसी की मृत्यु हो जाती हो।’’ वह ब्राह्मण फिर बोला, ‘‘निश्चित ही कोई बड़ा पाप राम से हुआ है, तभी उनके राज्य में बच्चों की अकाल मृत्यु हो रही है। जिन बच्चों की मृत्यु निषिद्ध नहीं है, उन्हें कोई भय नहीं होता; हे राजन्, कृपया मेरे इस पुत्र को, जो मृत्यु के वश में चला गया है, पुनः जीवित कीजिए। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो मैं और मेरी पत्नी महल के द्वार पर ही प्राण त्याग देंगे, और तब, हे राम, ब्राह्मण-हत्या का पाप लेकर तुम सुखी रहना।’’ ‘‘हे राजन्, तुम अपने भाइयों सहित दीर्घायु होओ; हम सबने तुम्हारे बलशाली राज्य में सुखपूर्वक जीवन बिताया है। अब यह घटना घट गई है, अतः हे राम, हम सब तुम्हारे अधीन हैं; काल के वश में आकर हमारा सुख बहुत कम रह गया है। अब इक्ष्वाकु वंश का यह राज्य रक्षकविहीन हो गया है; लेकिन जब यहाँ राम स्वामी हैं, तो निश्चित ही बालकों की मृत्यु का यह क्रम रुक जाएगा।’’ ‘‘जब राजा धर्मपूर्वक राज्य नहीं करता, तब प्रजा नष्ट हो जाती है; राजा के अधर्माचरण से उसके काल में लोग मरने लगते हैं। जब नगरों और जनपदों में लोग अनुचित आचरण करते हैं और राजा सुरक्षा नहीं देता, तब कालजन्य भय उत्पन्न होता है। इसमें संदेह नहीं कि यह सब राजा के दोष से हुआ है; नगर और जनपद में बालक की मृत्यु का कारण यही है।’’ इस प्रकार वह शोकाकुल ब्राह्मण अनेक प्रकार के वचनों से बार-बार राजा को रोकता और अपने पुत्र को गले लगाकर विलाप करता रहा। यहीं इस पावन रामायण के उत्तरकाण्ड का तिहत्तरवाँ सर्ग समाप्त होता है। राम ने उस ब्राह्मण का करुण विलाप और दुःख से भरी बातें सुनीं। वे स्वयं भी शोक से व्याकुल हो गए। उन्होंने तुरंत अपने प्रमुख मंत्रियों—वशिष्ठ, वामदेव, अपने भाइयों और नगरवासियों को बुलाया। फिर वशिष्ठ के साथ आठ ब्राह्मण सभा में आए। वे सब महर्षि, जो देवताओं के समान तेजस्वी थे, राजा राम को आशीर्वाद देते हुए बोले, ‘‘आपका कल्याण हो।’’ वहाँ उन प्रमुख ब्राह्मणों—मार्कण्डेय, मौद्गल्य, वामदेव, कश्यप, कात्यायन, जाबालि, गौतम और नारद—ने अपने-अपने आसनों पर स्थान ग्रहण किया। यहीं इस महर्षि वाल्मीकि-रचित, परम पूज्यनीय रामायण के उत्तरकाण्ड का चौरहत्तरवाँ सर्ग समाप्त होता है।