एक समय की बात है, जब राम, शत्रुओं के संहारक, अपने दरबार में बैठे थे। वहाँ उनके चारों ओर उनके सलाहकार और भाई थे। तभी उन्होंने दो कुशिलवाओं को देखा, जो अपनी संगीत कला से सभी को प्रसन्न कर रहे थे। राम ने लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न से कहा, "इन दोनों की कथा सुनो, जो देवताओं के समान तेजस्वी हैं।" उनकी प्रेरणा से, कुशिलवाओं ने अपने गीत गाने शुरू किए। उनके स्वर दिल में उतरने वाले थे, और संगीत की लय ने सभा को मंत्रमुग्ध कर दिया। हर कोई उनके गाने में खो गया, और उनकी आवाज़ ने सभा में एक अद्भुत आनंद भर दिया। राम ने उन्हें सम्मानित किया और सोने के सिंहासन पर विराजमान होकर उनकी प्रशंसा की। उस समय राम ने कहा, "इन दो तपस्वियों का अद्भुत कथा सुनो। वे राजसी गुणों से युक्त हैं और उनके गाने में गहराई और विविधता है।" कुशिलवाओं ने अपनी कला से सभी को मोहित कर दिया। अब हम उस महान कथा की ओर बढ़ते हैं, जो रामायण के रूप में जानी जाती है। यह कथा उन राजाओं की है, जिन्होंने युद्ध में विजय प्राप्त की, जिनमें प्रजापति भी शामिल थे। उनमें से एक राजा था सागर, जिसने समुद्र को खोदा और उसके साथ थे उसके साठ हजार पुत्र। इस महान कथा का आरंभ होता है अयोध्या नामक एक प्रसिद्ध नगर से, जिसे मनु ने स्वयं बनाया था। यह नगर बारह योजन लंबा और तीन योजन चौड़ा था, और यहाँ की मुख्य सड़कें सुव्यवस्थित थीं। राजा दशरथ, जो अपने साम्राज्य को बढ़ाने वाले थे, इस नगर में निवास करते थे। अयोध्या में हर दिशा में सुंदर बाग-बगिचे, नृत्यांगनाएँ और कलाकार थे। यहाँ के बाजारों में हर प्रकार के सामान और हथियार उपलब्ध थे। नगर की भव्यता अद्वितीय थी, और यह स्वर्ग के इंद्रपुरी के समान थी। राजा दशरथ, जो अपने गुणों में इंद्र और कुबेर के समान थे, ने इस नगर का कुशल शासन किया। अयोध्या में कोई भी दरिद्रता नहीं थी; हर घर में समृद्धि थी, और सभी लोग सुखी थे। यहाँ न तो कोई लालची था, न ही कोई निर्दयी, और न ही कोई अज्ञानी। इस प्रकार, अयोध्या का नगर, राजा दशरथ के नेतृत्व में, एक आदर्श स्थान बन गया, जहाँ हर कोई सुख और समृद्धि का अनुभव करता था। यह कथा हमें सिखाती है कि धर्म, अर्थ और काम के मार्ग पर चलकर ही हम एक सुखमय जीवन प्राप्त कर सकते हैं।