त्रिशंकु, जो महान् इच्छा लेकर अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए निकले थे, गुरु के सभी महान् आत्माओं—गुरुपुत्रों—के पास पहुँचे। उन्होंने एक-एक करके उन सबका श्रद्धापूर्वक अभिवादन किया और विनम्रता से सिर झुकाकर खड़े हो गए। फिर, हाथ जोड़कर अत्यंत आदरपूर्वक बोले, “मैं आप सबके शरण में आया हूँ, शरण देने वालों में आप ही मेरी शरण हैं। मुझे महान् वसिष्ठ जी ने अस्वीकार कर दिया है, अब मैं महान् यज्ञ करना चाहता हूँ, कृपया मुझे इसकी अनुमति दें।” त्रिशंकु ने आगे कहा, “मैं गुरुपुत्रों का सम्मान करता हूँ और आप सबसे प्रार्थना करता हूँ। मैं तप में स्थित ब्राह्मणों से सिर झुकाकर विनती करता हूँ कि मेरी सिद्धि के लिए आप सब एकाग्र होकर मेरे लिए यज्ञ करें, जिससे मैं अपने शरीर सहित स्वर्ग को प्राप्त कर सकूँ। वसिष्ठ जी द्वारा अस्वीकार किए जाने के बाद मुझे आपके अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं दिखता। इक्ष्वाकुवंश में कुलगुरु ही परम पथ हैं, अतः उनके बाद आप ही मेरे लिए देवस्वरूप हैं।” इसी समय, वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड का अठावनवाँ सर्ग आरंभ होता है। त्रिशंकु के क्रोधित किन्तु विनीत वचनों को सुनकर, महर्षि के सौ पुत्रों ने राजा से कहा, “हे दुष्टबुद्धि! सत्यनिष्ठ गुरु ने तुम्हें अस्वीकार कर दिया, फिर तुम अन्य किसी शाखा में कैसे जा सकते हो? इक्ष्वाकुवंश में कुलगुरु ही सर्वोच्च मार्ग हैं और सत्यवादी गुरु के वचन का उल्लंघन नहीं किया जा सकता। venerable वसिष्ठ जी ने जब असंभव कह दिया, तो हम भला कैसे तुम्हारा यज्ञ कर सकते हैं?” उन्होंने आगे कहा, “हे नरश्रेष्ठ! तुम बालक हो, लौटकर अपनी नगरी चले जाओ। वसिष्ठ जी तो तीनों लोकों के लिए भी यज्ञ करने में समर्थ हैं, हम उनका अपमान कैसे कर सकते हैं?” इन कठोर वचनों को सुनकर त्रिशंकु ने फिर कहा, “मुझे venerable वसिष्ठ जी ने और उनके पुत्रों ने अस्वीकार कर दिया है। अब मैं कोई और मार्ग देखूँगा। आप सबको प्रणाम, हे तपस्वियो!” त्रिशंकु के इन शब्दों को सुनकर वे गुरुपुत्र अत्यंत क्रोध से भर गए और शाप देते हुए बोले, “तुम चांडाल बन जाओ!” ऐसा कहकर वे सभी महान् आत्माएँ अपने-अपने आश्रमों को लौट गईं। रात्रि बीतने पर त्रिशंकु सचमुच चांडाल बन गए—काले वस्त्र, काले रंग, बिखरे बाल, शरीर पर राख, गले में चिथड़ों की माला और लोहे के आभूषण। इस रूप में उन्हें देख उनके मंत्री और नगरवासी सभी भयभीत होकर भाग गए। त्रिशंकु, जो ककुत्स्थ वंश के थे, अकेले ही महान् आत्मसंयम के साथ आगे बढ़े। दिन-रात संतप्त होते हुए वे महर्षि विश्वामित्र के पास पहुँचे। विश्वामित्र जी ने त्रिशंकु को चांडाल रूप में देख कर दया से भर गए। दयावश, वे धर्मनिष्ठ महर्षि बोले, “राजन्, तुम्हारा कल्याण हो! इस भयंकर रूप में तुम किस हेतु से आए हो, हे अयोध्याधिप?” त्रिशंकु ने हाथ जोड़कर उत्तर दिया, “गुरु और उनके पुत्रों ने मुझे अस्वीकार कर दिया है। मेरी इच्छा पूरी नहीं हुई, उल्टा विपरीत फल मिला है। हे सौम्य, मैं चाहता हूँ कि अपने शरीर सहित स्वर्ग जाऊँ। मैंने सैकड़ों यज्ञ किए, फिर भी फल नहीं मिला; मैंने कभी असत्य नहीं बोला, न ही बोलूँगा। संकट में भी मैंने क्षत्रिय धर्म निभाया, अनेक यज्ञ किए, प्रजा की रक्षा की। बुजुर्गजन मेरे आचरण से प्रसन्न हुए, फिर भी वे संतुष्ट नहीं हैं। अब मैं भाग्य को ही सर्वोपरि मानता हूँ, पुरुषार्थ व्यर्थ है। सब कुछ भाग्य के अधीन है। मैं अत्यंत पीड़ित होकर आपकी शरण में आया हूँ, कृपा करके भाग्य को अपने पुरुषार्थ से परास्त करें। आपके अतिरिक्त मुझे और कोई शरण नहीं है।” अब बालकाण्ड का उनसठवाँ सर्ग आरंभ होता है। विश्वामित्र जी ने दया से भरकर, चांडाल बने त्रिशंकु से मधुर वचन कहे, “हे इक्ष्वाकुवंशी, स्वागत है पुत्र! मैं जानता हूँ, तुम वास्तव में धर्मात्मा हो। तुम मेरी शरण में आए हो, डरो मत, मैं तुम्हें शरण देता हूँ। मैं सभी पुण्यकर्मी महान् ऋषियों को, जो यज्ञ में सहायक हैं, बुलाऊँगा; तब तुम संतोषपूर्वक यज्ञ करोगे। गुरु के शाप से जो रूप तुम्हें मिला है, उसी रूप में तुम शरीर सहित स्वर्ग जाओगे। हे राजन्, जब तुम शरण देने वाले कौशिकपुत्र के पास आए हो, तो मुझे स्वर्ग तुम्हारे लिए सुलभ लगता है।” ऐसा कहकर महान् तेजस्वी विश्वामित्र ने अपने धर्मनिष्ठ, सर्वज्ञ पुत्रों को आज्ञा दी कि वे यज्ञ की सामग्री तैयार करें। फिर उन्होंने अपने सभी शिष्यों को बुलाया और कहा, “मेरे आदेश से सभी ऋषियों को, वसिष्ठजी सहित, यहाँ ले आओ।” इस प्रकार त्रिशंकु की करुण कथा आगे बढ़ी, जहाँ भाग्य और पुरुषार्थ, शाप और वरदान, और धर्म की परीक्षा, एक साथ गुँथ गई।