हे राघव, जब विश्वामित्र ने भयानक ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया, तब महर्षि वशिष्ठ ने अपनी ब्रह्मदण्ड की शक्ति से उस भीषण अस्त्र को पूर्णतः नष्ट कर दिया। जैसे ही वशिष्ठ जी, जिनका हृदय महान था, उस ब्रह्मास्त्र को समाहित करने लगे, उनका स्वरूप अत्यंत विकराल और तेजस्वी हो उठा, जिससे तीनों लोकों में भय और विस्मय छा गया। वशिष्ठ जी के प्रत्येक रोमकूप से, जैसे धुएँ रहित प्रज्वलित अग्नि की ज्वालाएँ निकल रही हों, वैसे ही प्रचंड प्रकाश की किरणें फूट पड़ीं। उनके हाथ में उठा हुआ ब्रह्मदण्ड भी प्रलयकालीन अग्नि के समान प्रज्वलित हो उठा, मानो यमराज का दण्ड ही उनके हाथ में हो। यह दृश्य देखकर वहाँ उपस्थित सभी ऋषि वशिष्ठ जी की स्तुति करने लगे—"हे ब्रह्मर्षि, आपकी शक्ति अचूक है। आप अपनी तेजस्विता से इस तेज को संयमित करें। आपके द्वारा महान विश्वामित्र जी पर विजय प्राप्त हुई है। आपकी शक्ति सर्वोच्च और अच्युत है—आपके रहते ये लोक निर्भय रहें।" ऋषियों के इन वचनों को सुनकर वशिष्ठ जी ने स्वयं को शांत किया। दूसरी ओर, विश्वामित्र अपनी पराजय से व्यथित होकर गहरी साँस लेते हुए बोले, "क्षत्रिय बल पर धिक्कार है; सच्ची शक्ति तो ब्रह्मतेज में ही है। एक ब्रह्मदण्ड से मेरे सारे अस्त्र-शस्त्र नष्ट हो गए।" यह सोचकर, उन्होंने मन-इंद्रियों को संयमित किया और निश्चय किया—"अब मैं महान तपस्या करूँगा, क्योंकि यही ब्रह्मत्व का एकमात्र उपाय है।" इसके बाद, हे राम, आप सुनिए वाल्मीकि रामायण के सत्तावनवें सर्ग की कथा। पराजय की स्मृति से व्यथित और दुःखी विश्वामित्र बार-बार गहरी साँस लेते हुए, मन में वशिष्ठ जी के प्रति प्रतिद्वंद्विता का भाव लेकर, अपनी पत्नी के साथ दक्षिण दिशा की ओर चले गए और वहाँ घोर तपस्या करने लगे। वे केवल फल-मूल खाते, इंद्रियों को संयमित रखते और कठोर तपस्या करते रहे। समय बीतता गया, और उनके सत्यनिष्ठ, धर्मपरायण पुत्र उत्पन्न हुए—हविष्पण्ड, मधुष्पण्ड और महाबली दृढ़नेत्र। जब हज़ार वर्ष पूर्ण हो गए, तब ब्रह्मा जी, जो सृष्टि के आदिपिता हैं, विश्वामित्र से मधुर वचन बोले—"हे कौशिक, तपस्या के द्वारा तुमने राजर्षियों के लोकों को जीत लिया है। हम तुम्हें तपस्या के कारण राजर्षि के रूप में जानते हैं।" इतना कहकर ब्रह्मा और देवता चले गए। ब्रह्मा जी के इस कथन को सुनकर विश्वामित्र कुछ निराश और लज्जित हो गए। वे मन ही मन दुःख और क्रोध से भरकर बोले, "मैंने इतनी घोर तपस्या की, फिर भी मुझे केवल राजर्षि ही कहा गया! सभी देवता और ऋषिगण—कहीं तपस्या का कोई फल ही नहीं है।" यह सोचकर, विश्वामित्र ने अपनी तपस्या और भी बढ़ा दी। इसी समय, सत्यवादी और इंद्रियों को वश में रखने वाले त्रिशंकु, जो इक्ष्वाकु वंश का गौरव बढ़ाने वाले थे, उन्होंने सोचा—"मैं अपने शरीर से ही देवताओं के लोक में जाऊँगा।" यह विचार कर वे वशिष्ठ जी के पास पहुँचे और अपनी इच्छा प्रकट की। वशिष्ठ जी ने स्पष्ट कह दिया—"यह असंभव है।" वशिष्ठ जी द्वारा अस्वीकृत होकर त्रिशंकु दक्षिण दिशा की ओर बढ़े और वहाँ वशिष्ठ जी के सौ तपस्वी पुत्रों के पास पहुँचे, जो घोर तपस्या में लीन थे। त्रिशंकु ने उन सब महान आत्माओं को नमस्कार किया, हाथ जोड़कर सिर झुकाया और विनम्रता से बोला—"मैं आप सबकी शरण में आया हूँ। वशिष्ठ जी ने मुझे अस्वीकार कर दिया है, किंतु मैं महान यज्ञ की इच्छा रखता हूँ। आप कृपा कर मुझे अनुमति दें।" उन्होंने आगे कहा—"मैं गुरु-पुत्रों का सम्मान करता हूँ, आपसे प्रार्थना करता हूँ कि मेरी यज्ञ-सिद्धि के लिए आप लोग एकाग्रचित्त होकर मेरे पुरोहित बनें, जिससे मैं अपने शरीर से स्वर्गलोक को प्राप्त कर सकूँ। वशिष्ठ जी ने मुझे अस्वीकार किया है, अब आपके अतिरिक्त मेरे लिए कोई मार्ग नहीं है। इक्ष्वाकु वंश में कुलगुरु ही सर्वोच्च मार्ग हैं; अतः उनके बाद आप सब मेरे लिए देवतुल्य हैं।" अब, हे राम, सुनिए अट्ठावनवें सर्ग की कथा। त्रिशंकु के इन वचनों को सुनकर, वशिष्ठ जी के सौ पुत्रों ने क्रोध से भरकर उत्तर दिया—"हे दुष्टबुद्धि, जब तुम्हारे सत्यवादी गुरु ने तुम्हें अस्वीकार कर दिया, तो तुम अन्यत्र क्यों गए? इक्ष्वाकु वंश में कुलगुरु ही सर्वोच्च मार्ग हैं, और सत्यवचन को कोई नहीं टाल सकता। वशिष्ठ जी ने जब असंभव कह दिया, तो हम कैसे यज्ञ कर सकते हैं?" "तुम बालवत् हो, हे श्रेष्ठ पुरुष! अपने नगर को लौट जाओ। वशिष्ठ जी तो तीनों लोकों के लिए भी यज्ञ कर सकते हैं, हम उनका अपमान कैसे कर सकते हैं?" उनके ये कठोर वचन सुनकर त्रिशंकु ने पुनः उनसे कहा—"मुझे गुरु वशिष्ठ ने अस्वीकार किया है, और अब आप गुरु-पुत्रों ने भी।" इस प्रकार, इन घटनाओं की कड़ी में, वशिष्ठ जी की ब्रह्मतेज की महिमा, विश्वामित्र की तपस्या की दृढ़ता, और त्रिशंकु की स्वर्गारोहण की अभिलाषा का अद्भुत प्रसंग प्रकट होता है।