हे राम, अब मैं तुम्हें वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के चौवनवें और पचपनवें सर्ग की कथा सुनाता हूँ। जब महर्षि वशिष्ठ ने कामधेनु गाय को देने से इनकार कर दिया, तब विश्वामित्र ने उस चित्तीदार गाय को बलपूर्वक ले जाने का प्रयास किया। राजा के सैनिक जब उसे घसीटते हुए ले जा रहे थे, तब वह गाय अत्यंत दुःखी होकर रो रही थी और मन ही मन सोचने लगी—“धन्य महर्षि वशिष्ठ ने मुझे क्यों त्याग दिया? मैं तो निःस्वार्थ, निष्पाप और उनकी सेविका हूँ, फिर भी मुझे इस प्रकार दुःख क्यों सहना पड़ रहा है? मैंने ऐसा कौन-सा अपराध किया है कि धर्मात्मा वशिष्ठ मुझे छोड़ रहे हैं?” बार-बार यही सोचते और आहें भरते हुए, वह गाय अत्यंत वेग से, राजा के सैकड़ों सैनिकों को झटकती हुई, वायु वेग से वशिष्ठ के पास जा पहुँची। वहाँ वह रोती-बिलखती, बादलों की गर्जना जैसी आवाज में बोली—“हे ब्रह्मर्षि, हे ब्रह्मा के पुत्र! आपने मुझे क्यों छोड़ दिया कि राजा के सैनिक मुझे आपके सामने से ले जा रहे हैं?” उसके इस प्रकार कहने पर, वशिष्ठ ने मानो अपनी दुःखी बहन को सांत्वना देते हुए कहा—“शबला, न तो मैंने तुम्हें त्यागा है, न ही तुमने मुझसे कोई अपराध किया है; परन्तु यह पराक्रमी राजा बलपूर्वक तुम्हें मुझसे छीन रहा है। आज मेरी शक्ति राजा के समक्ष कम है, क्योंकि वह क्षत्रिय है, पृथ्वी का स्वामी है, और उसकी विशाल सेना हाथी, घोड़े, रथ और ध्वजाओं से भरी हुई है।” वशिष्ठ की यह बात सुनकर, शबला विनम्रता से बोली—“हे ब्रह्मर्षि, ऐसा नहीं है कि क्षत्रिय की शक्ति ब्राह्मण की शक्ति से अधिक है। ब्राह्मण तेज तो क्षत्रिय से कहीं बढ़कर है। आपकी शक्ति असीम है; विश्वामित्र चाहे जितने भी बलशाली हों, वे आपसे अधिक शक्तिशाली नहीं हैं। आप आज्ञा दें, मैं उस दुष्ट राजा के अभिमान, बल और प्रयास का नाश कर दूँगी।” तब वशिष्ठ ने उसे आज्ञा दी—“हे शत्रु दल का नाश करने वाली, अपनी शक्ति प्रकट करो।” वशिष्ठ की आज्ञा पाते ही, शबला ने अपने रंभाने से सैकड़ों पहलवों को उत्पन्न किया। उन्होंने विश्वामित्र की सेना को उसके सामने ही नष्ट कर दिया। यह देखकर विश्वामित्र अत्यंत क्रोधित हो उठे और उन्होंने अपने अस्त्र-शस्त्रों से उन पहलवों का संहार कर डाला। फिर शबला ने भयानक शक और यवन उत्पन्न किए, जिनसे पूरी पृथ्वी भर गई। वे स्वर्ण के समान दीप्तिमान, तीक्ष्ण तलवारों और भालों से सुसज्जित, स्वर्ण वस्त्रों में विभूषित थे। उन्होंने विश्वामित्र की पूरी सेना को मानो अग्नि से जला डाला। तब विश्वामित्र ने अपने अस्त्रों को चलाया, जिससे यवन, काम्बोज और बार्बर जातियाँ भी व्याकुल हो गईं। अब सुनो, आगे की कथा। जब वशिष्ठ ने देखा कि विश्वामित्र के अस्त्रों से वे जातियाँ विचलित हो गई हैं, तो उन्होंने शबला से कहा—“अपनी योगशक्ति से और जातियाँ उत्पन्न करो।” तब शबला के रंभाने से सूर्य के समान तेजस्वी काम्बोज उत्पन्न हुए; उसके स्तनों से शस्त्रधारी बार्बर निकले; उसके गर्भ से यवन, मलमूत्र से शक, और रोमकूपों से म्लेच्छ, हारित और किरात उत्पन्न हुए। इन सबने मिलकर क्षण भर में विश्वामित्र की पूरी सेना—हाथी, घोड़े, रथ सहित—नष्ट कर दी। अपनी सेना का यह हाल देखकर विश्वामित्र के सौ पुत्र विविध अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर युद्ध के लिए आगे बढ़े। तब वशिष्ठ, जो मंत्रों के श्रेष्ठ ज्ञाता और महान तपस्वी थे, अत्यंत क्रोध में भरकर आगे बढ़े और केवल एक गरज से ही विश्वामित्र के उन सौ पुत्रों को उनके रथ, घोड़े और सेना सहित भस्म कर दिया। अब विश्वामित्र ने जब अपनी सम्पूर्ण सेना और पुत्रों का नाश देखा तो वे अत्यंत लज्जित और शोकाकुल हो गए। वे जैसे तरंगहीन सागर, दंतहीन सर्प, या ग्रहणग्रस्त सूर्य की भाँति तेजहीन हो गए। अपने पुत्रों और बल से रहित, निराश और उत्साहहीन, वे पक्षी के कटे हुए पंखों की भाँति दुःखी हो गए। तब उन्होंने अपने एक पुत्र को राज्य सौंप दिया और उसे क्षत्रिय धर्म से पृथ्वी का पालन करने की आज्ञा देकर स्वयं वन की ओर प्रस्थान किया। वे हिमालय की उन कंदराओं में गए, जहाँ किन्नर और सर्प निवास करते हैं, और वहाँ महादेव की कृपा प्राप्ति के लिए घोर तपस्या करने लगे। कुछ समय पश्चात, स्वयं देवाधिदेव, वृषध्वज शिव, विश्वामित्र के सामने प्रकट हुए और बोले—“हे राजन, किस उद्देश्य से तपस्या कर रहे हो? जो भी वर चाहो, मुझसे कहो; मैं वर देने के लिए उपस्थित हूँ।” तब विश्वामित्र ने महादेव को प्रणाम कर विनम्रता से अपनी अभिलाषा प्रकट की।