रामचन्द्र जी ने विभीषण को सान्त्वना देते हुए, उनकी ओर गम्भीरता से देखते हुए कहा, "तुम मुझसे राक्षसों की वास्तविक शक्ति और दुर्बलताओं को सत्य-सत्य बताओ।" श्रीराम के इस प्रकार पूछने पर, विभीषण ने, जो स्वयं भी धर्मात्मा थे, रावण की सम्पूर्ण शक्ति का विस्तार से वर्णन करना प्रारंभ किया। विभीषण बोले, "हे राजकुमार! ब्रह्माजी के वरदान से दशग्रीव रावण किसी भी प्राणी, गन्धर्व, सर्प या पक्षी द्वारा मारा नहीं जा सकता। रावण के बाद मेरे बड़े भाई कुम्भकर्ण हैं, जो युद्ध में इन्द्र के समान पराक्रमी और तेजस्वी हैं। रावण की सेना का सेनापति प्रहस्त है, जिसके बारे में आपने सुना होगा—जिसने कैलास पर्वत पर मणिभद्र को भी युद्ध में पराजित किया था।" "इसी प्रकार, रावण का पुत्र इन्द्रजीत है, जो युद्ध में अभेद्य कवच धारण करता है और धनुष लेकर अदृश्य हो जाता है; उसे मारना असम्भव है। वह महान यज्ञ कर अग्नि को आहुति देकर अदृश्य होकर शत्रुओं का संहार करता है। महोदर, महापार्श्व और अतिकाय राक्षस अतिकाय सेनापति हैं—ये सब युद्ध में लोकपालों के समान बलशाली हैं।" "लंका नगरी में एक सौ करोड़ रूप बदलने वाले, मांस-रक्त का भक्षण करने वाले राक्षस निवास करते हैं। इन्हीं के साथ रावण ने स्वयं लोकपालों के विरुद्ध युद्ध किया था, और देवताओं सहित उन सबको रावण ने परास्त कर दिया था।" विभीषण की यह बातें सुनकर, रघुकुलश्रेष्ठ श्रीराम ने मन ही मन सब विचार किया और बोले, "हे विभीषण! तुमने रावण की जो भी दुष्कृत्य और शक्तियाँ बताईं, वे सब मुझे भलीभाँति समझ में आ गई हैं। चाहे रावण रसातल या पाताल में चला जाए, या स्वयं ब्रह्माजी के पास चला जाए, वह मेरे हाथों से जीवित नहीं बच सकता। जब तक रावण और उसके पुत्र, कुटुम्ब और संबंधी युद्ध में मारे नहीं जाएंगे, मैं अयोध्या नहीं लौटूंगा—इन तीन भाइयों की शपथ लेकर कहता हूँ।" श्रीराम के ऐसे निष्कलंक वचन सुनकर धर्मात्मा विभीषण ने सिर झुकाया और बोले, "मैं अपनी पूरी शक्ति से राक्षसों के विनाश और लंका विजय में सहायता करूंगा और आपकी सेना में सम्मिलित होऊंगा।" इतना कहते ही श्रीराम ने विभीषण को हृदय से लगा लिया और प्रसन्न होकर लक्ष्मण से कहा, "लक्ष्मण! समुद्र का जल लाओ।" फिर बोले, "इस जल से, हे सम्मानदाता, मेरी कृपा से इस बुद्धिमान विभीषण का शीघ्र अभिषेक करो और इसे राक्षसों का राजा बनाओ।" राम की आज्ञा से सौमित्रि लक्ष्मण ने वानर सेना के बीच विभीषण का विधिपूर्वक राक्षसों के राजा के रूप में अभिषेक किया। राम की इस कृपा को देखकर वानरगण आनन्द से जय-जयकार करने लगे—"बहुत अच्छा! बहुत अच्छा!" इसके बाद हनुमान और सुग्रीव ने विभीषण से पूछा, "हे विभीषण! बताओ, हम सब बलशाली वानरों के साथ इस अपार, अचल और अगम्य समुद्र को कैसे पार करें, जो वरुण का निवास है?" विभीषण ने उत्तर दिया, "हमें किसी उपाय से नदियों के अधिपति, समुद्र से प्रार्थना करनी चाहिए, जिससे हमारी विशाल सेना सहित हम सब शीघ्र ही लंका पहुँच सकें।" विभीषण ने आगे कहा, "रघुनाथ श्रीराम को स्वयं समुद्र की शरण लेनी चाहिए। यह महान अपार समुद्र सगर द्वारा खोदा गया था; अतः सगर के वंशज राम के लिए समुद्र को अवश्य कार्य करना चाहिए।" विभीषण की बात सुनकर सुग्रीव और लक्ष्मण श्रीराम के पास आए और समुद्र तट पर बैठकर विभीषण के शुभ वचन कह सुनाए। यह प्रस्ताव श्रीराम, लक्ष्मण और वानरराज सुग्रीव को स्वभाव से ही उचित और प्रिय लगा। श्रीराम ने मुस्कराकर कहा, "लक्ष्मण! विभीषण की यह सलाह मुझे बहुत पसंद आई। सुग्रीव सदा बुद्धिमान हैं और तुम भी विवेकी हो; जो तुम दोनों को विचारने पर उचित लगे, वह कहो।" तब सुग्रीव और लक्ष्मण दोनों ने मर्यादा के साथ उत्तर दिया, "हे पुरुषसिंह! विभीषण ने जो उचित समय पर विजयदायक बात कही, वह हमें क्यों न भाए? इस भयंकर समुद्र पर सेतु बनाए बिना लंका पहुँचना देवता और दानवों के लिए भी असम्भव है। अतः वीर विभीषण के वचनानुसार ही कार्य हो; अब और विलम्ब न हो, समुद्र को आज्ञा दी जाए ताकि हमारी सेना शीघ्र रावण की लंका पहुँच सके।" यह सुनकर श्रीराम समुद्र के किनारे घास बिछाकर यज्ञ वेदी के समान लेट गए। इसी समय, लंका में एक बलशाली राक्षस शार्दूल, जो रावण का गुप्तचर था, सुग्रीव की रक्षा में स्थित वानरसेना को देखकर लौटा। उसने लंका पहुँचकर रावण से कहा, "हे राक्षसराज! वानर और रीछों की विशाल सेना लंका की ओर बढ़ रही है। दशरथनन्दन राम और लक्ष्मण, ये दोनों समुद्र के समान अगम्य और अपार हैं। वे दोनों रूप-तेज में अद्वितीय हैं और सीता की खोज में यहाँ आ पहुँचे हैं। वे दोनों समुद्र के पास आकर डेरा डाले हुए हैं।" इस प्रकार वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड के इन प्रसंगों में श्रीराम, विभीषण, वानर और राक्षसों के संवाद, योजनाएँ और समुद्र पर सेतु निर्माण की भूमिका अत्यंत भावपूर्ण ढंग से सामने आती है।