श्रीवाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के तृतीय सर्ग में, जब महर्षि वाल्मीकि ने नारदजी से भगवान श्रीराम के जीवन की अद्भुत कथा सुनी, तो वे उस ज्ञानमय, धर्मयुक्त और लोकहितकारी घटनाओं को और भी विस्तार से जानने के लिए उत्सुक हो उठे। उन्होंने जल से आचमन कर, कुशासन पर पूर्वमुख होकर, श्रद्धा से हाथ जोड़कर धर्म के अनुसार उन घटनाओं का अनुसंधान किया। वाल्मीकि ऋषि ने मुस्कान, वाणी, चलन और समस्त कार्यों को धर्म के बल से भलीभाँति देखा और समझा। श्रीराम, जो सत्यनिष्ठ थे, जब अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ वन में विचरण कर रहे थे, तब उनके साथ जो-जो घटनाएँ घटित हुईं, उन सबका भी ऋषि ने गहनता से निरीक्षण किया। योग में स्थित, धर्मात्मा वाल्मीकि ने भूतकाल की समस्त घटनाओं को ऐसे स्पष्ट देख लिया, जैसे कोई फल हथेली पर रखा हुआ हो। उन्होंने विवेकपूर्वक उन सभी घटनाओं का साक्षात्कार कर, श्रीराम की रमणीय कथा को संपूर्ण रूप से रचने का निश्चय किया। यह कथा काम, अर्थ और धर्म के गुणों से युक्त थी, और धर्म व पुरुषार्थ के सद्गुणों से विस्तृत होकर, सुनने वालों के लिए मोतियों से भरे समुद्र के समान मनोहर थी। जैसे पहले महर्षि नारद ने यह कथा कही थी, वैसे ही पूज्य वाल्मीकि ने रघुवंश की इस पावन कथा की रचना की। उन्होंने राम के जन्म, उनके महान पराक्रम, सर्वत्र प्रियता, प्रजाजन में प्रियता, धैर्य, सौम्यता और सत्यशीलता का वर्णन किया। उन्होंने राम के अद्भुत कार्यों, विश्वामित्र की सहायता, जनकनन्दिनी सीता का विवाह, धनुष-भंग, परशुराम-राम संवाद, दशरथ के गुण, राम के राज्याभिषेक और कैकेयी की कुटिलता का भी विस्तार से वर्णन किया। राम के राज्याभिषेक की बाधा, उनका वनवास, राजा दशरथ का शोक और मृत्यु, प्रजाजनों का दुःख, उनके लौटाए जाने, निषादराज से संवाद और सारथी के लौटने की घटनाएँ भी कथा में आईं। गंगा पार करना, भारद्वाज से मिलना, उनकी अनुमति, चित्रकूट का दर्शन, कुटिया निर्माण, भरत का आगमन, राम को मनाना, पिता के लिए जल तर्पण, पादुका का राज्याभिषेक, नंदीग्राम में निवास, दण्डकारण्य की यात्रा और विराध वध—ये सभी प्रसंग भी वर्णित हुए। शरभंग और सुतिक्ष्ण से भेंट, अनसूया की कथा और सुगंधित चूर्ण का दान, अगस्त्य से मिलना, धनुष प्राप्ति, शूर्पणखा से संवाद और उसका विकलांग होना, खर और त्रिशिरा का वध, रावण का उदय, मारीच वध और सीता हरण—ये भी कथा के अंग बने। राघव का विलाप, गिद्धराज की मृत्यु, कबन्ध से भेंट और पम्पा सरोवर का दर्शन, शबरी से मिलना, फल-मूल पर निर्वाह, पम्पा पर शोक और हनुमान से मिलन, ऋष्यमूक की यात्रा, सुग्रीव से मित्रता, वानर-सैन्य का संगठन, वाली-सुग्रीव का युद्ध, वाली का वध, सुग्रीव का राज्याभिषेक, तारा का शोक, वर्षा ऋतु में निवास—ये घटनाएँ भी विस्तार से आईं। श्रीराम का क्रोध, सेनाओं का आयोजन, चारों दिशाओं में भेजना, पृथ्वी से समाचार पाना, मुद्रिका देना, भालू की गुफा देखना, प्राणत्याग का संकल्प, सम्पाति से मिलना, पर्वतारोहण, समुद्र लांघना, समुद्र का संवाद, मैनाक का दर्शन, राक्षसी का भय, छाया पकड़ने वाली से मुठभेड़, सिंहिका का वध, लंका और मलय का दर्शन, रात्रि में लंका प्रवेश, एकांत में विचार, मद्यस्थल जाना, रक्षित वाटिका देखना—ये सब घटनाएँ भी कथा में सम्मिलित हुईं। रावण का दर्शन, पुष्पक विमान देखना, अशोक वाटिका में प्रवेश, सीता का दर्शन, सीता को पहचानचिह्न देना, संवाद, राक्षसियों का भय, त्रिजटा के स्वप्न का वर्णन, सीता को मणि देना, वृक्ष तोड़ना, राक्षसियों का भागना, किंकरों का वध, पवनपुत्र का बंधन, लंका दहन के समय गर्जना, लौटना, मधु का पान—ये सब भी विस्तार से आए। राघव का सांत्वना पाना, मणि का सौंपना, समुद्र से मिलना, नल द्वारा सेतु निर्माण, समुद्र पार करना, रात्रि में लंका का घेराव, विभीषण से संधि, उपायों का प्रस्ताव, कुम्भकर्ण वध, मेघनाद का संहार, रावण का विनाश, समुद्रनगरी में सीता की प्राप्ति—इन सबका भी वर्णन हुआ। विभीषण का राज्याभिषेक, पुष्पक विमान का दर्शन, अयोध्या की यात्रा, भारद्वाज से भेंट, पवनपुत्र का संदेश, भरत से मिलन, श्रीराम का राज्याभिषेक, सेनाओं का विसर्जन, राज्य में हर्ष, सीता का विदा होना—ये सभी प्रसंग भी कथा में सम्मिलित हुए। और श्रीराम के जीवन में आगे जो कुछ घटित होना था, उसका भी पूज्य वाल्मीकि ने अपनी महाकाव्य की उत्तरकाण्ड में विस्तार से वर्णन किया। यह था श्रीवाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड का चतुर्थ सर्ग।