महर्षि वाल्मीकि, जब उन्होंने उस कोयल स्वर वाली क्रौंच पक्षी के नर को अकारण मारे जाते देखा, तो अत्यंत दुःखी हो उठे। उस क्रौंची के लिए शोक करते हुए उन्होंने एक मार्मिक श्लोक गाया, जिसमें उनके हृदय का सारा दुःख उमड़ आया। बार-बार उनका मन भीतर की ओर खिंचता गया, और वे शोक में डूबे रहे। उसी समय, ब्रह्मा जी प्रकट हुए, उनके मुख पर मधुर मुस्कान थी। उन्होंने महर्षि वाल्मीकि से कहा, “हे श्रेष्ठ ऋषि, यह श्लोक जैसा रचा गया है, वैसा ही रहने दो; इसमें कोई विचार-विमर्श की आवश्यकता नहीं है। मेरे ही संकल्प से यह सरस्वती तुम्हारे भीतर प्रकट हुई है।” ब्रह्मा जी ने आदेश दिया, “हे महर्षि, तुम रामचंद्र जी की सम्पूर्ण कथा, जो धर्मनिष्ठ और बुद्धिमान हैं, संसार के कल्याण के लिए रचो। जैसा तुमने नारद जी से सुना है, उस दृढ़ प्रतिज्ञ राम की गाथा—गुप्त और प्रकट, जो भी घटनाएँ घटीं—सबका वर्णन करो। राम, सुमित्रानंदन लक्ष्मण, समस्त राक्षसों और वैदेही पर जो भी प्रकट या गुप्त घटनाएँ घटीं, वे सब तुम्हें ज्ञात होंगी। तुम्हारी वाणी में कोई असत्य प्रवेश नहीं करेगा। इस रामकथा को छंदबद्ध, मधुर और पावन रूप में रचो, जब तक पृथ्वी पर पर्वत और नदियाँ रहेंगी, तब तक यह कथा जीवित रहेगी।” फिर ब्रह्मा जी ने आशीर्वाद दिया, “जब तक तुम्हारे द्वारा रचित रामायण का पाठ होता रहेगा, तब तक यह कथा लोकों में प्रचलित रहेगी। ऊपर और नीचे, तुम लोगों के बीच प्रतिष्ठित रहोगे।” ऐसा कहकर ब्रह्मा जी अंतर्धान हो गए। महर्षि वाल्मीकि अपने शिष्यों के साथ आश्चर्य और श्रद्धा में भरकर वहाँ से लौटे। उनके शिष्यों ने उस श्लोक को बार-बार गाया, आनंदित और विस्मित होकर। महर्षि ने देखा कि उनके शोक ने छंद का रूप ले लिया है, और उसी से प्रेरित होकर उन्होंने संकल्प किया कि वे सम्पूर्ण रामायण का रचना इसी छंद में करेंगे। महर्षि वाल्मीकि ने उत्तम अर्थ, विषय और शब्दों में, मन को आनंद देने वाली राम की कीर्ति का विस्तार किया। सैकड़ों सम छंदों में, उन्होंने एक ऐसा काव्य रचा, जो राम के यश को अमर कर देता है। उन्होंने समुचित संधियों, मधुर और सुगठित वाक्यों में, रघुकुलनंदन राम की कथा—विशेषकर दशानन रावण के वध की कथा—को सुंदरता से सजाया। अब वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के तीसरे सर्ग की कथा सुनिए। महर्षि वाल्मीकि ने, सारी घटनाएँ धर्म और कल्याण के साथ सुनकर, फिर से यह जानने का प्रयास किया कि उस बुद्धिमान राम के साथ क्या-क्या घटित हुआ। उन्होंने विधिपूर्वक जल से शुद्ध होकर, कुशासन पर पूर्वमुख होकर, हाथ जोड़कर, धर्म के अनुसार घटनाओं का अनुसंधान किया। वे राम के बोल, हाव-भाव, चलन-फिरन और सारे कार्यों को धर्मबल से भली-भांति देखने लगे। राम, जो सत्य में अडिग थे, अपनी पत्नी और भाई के साथ वन में विचरते हुए जिन-जिन घटनाओं से गुजरे, उन सबका उन्होंने सूक्ष्मता से निरीक्षण किया। योग में स्थित उस धर्मात्मा ने, जैसे कोई फल अपने हाथ की हथेली में देख लेता है, वैसे ही भूतकाल की सारी घटनाएँ स्पष्ट रूप से देख लीं। सब कुछ सच्चाई से देखकर, विवेकपूर्वक, महर्षि वाल्मीकि ने रमणीय राम की सम्पूर्ण कथा रचने का संकल्प किया। यह कथा काम, अर्थ, धर्म और उद्देश्य की श्रेष्ठताओं से युक्त थी, सबके लिए मनोहर थी, जैसे रत्नों से भरा समुद्र सबको आकर्षित करता है। जैसा कि पूर्व में महर्षि नारद ने सुनाया था, उसी के अनुसार महर्षि वाल्मीकि ने रघुवंश की कथा का विस्तार किया। इसमें राम का जन्म, उनका महान पराक्रम, सबका प्रिय होना, जनसामान्य का स्नेह, उनकी सहनशीलता, कोमलता और सत्यप्रियता—सभी गुणों का वर्णन किया गया। अनेक अद्भुत कथाएँ, विश्वामित्र की सहायता, जानकी का विवाह, शिवधनुष का भंग, परशुराम-राम का संवाद, दशरथ के गुण, राम का राज्याभिषेक और कैकेयी का कपट—इन सब घटनाओं को वाल्मीकि ने सुंदरता से पिरोया। फिर राम के राज्याभिषेक में विघ्न, उनका वनवास, राजा दशरथ का शोक और मृत्यु, प्रजा का दुःख, उनका विदा होना, निषादराज से संवाद, सारथी का लौटना, गंगा पार करना, भारद्वाज से भेंट, उनकी आज्ञा, चित्रकूट का दर्शन, कुटिया निर्माण, भरत का आगमन, राम को मनाना, पिता का जलांजलि देना, पादुका राज्याभिषेक, नंदीग्राम में निवास, दंडक वन की यात्रा और विराध वध—इन सब घटनाओं का क्रमशः वर्णन किया गया। शरभंग और सुतिक्ष्ण से भेंट, अनुसूया की कथा, सुगंधित चंदन का दान, अगस्त्य से मिलना, धनुष की प्राप्ति, शूर्पणखा से संवाद और उसका विकृति होना, खर-त्रिशिरा का वध, रावण का उदय, मारीच का वध और सीता हरण—इन सबका भी विस्तार से उल्लेख हुआ। राम का विलाप, गिद्धराज जटायु की मृत्यु, कबंध से भेंट, पंपा सरोवर का दर्शन, शबरी से मिलना, फल-मूल पर निर्वाह, पंपा पर शोक, हनुमान से भेंट, ऋष्यमूक की यात्रा, सुग्रीव से मिलन, मित्रता और विश्वास की स्थापना, बालि-सुग्रीव का संघर्ष, बालि का वध, सुग्रीव का पुनः राज्यारोहण, तारा का शोक, अनुबंध, वर्षा ऋतु में निवास—इन सबका भी सुंदर वर्णन है। फिर सिंहवत् रघुकुल शिरोमणि राम का क्रोध, वानर सेनाओं का एकत्र होना, चारों दिशाओं में प्रेषण और पृथ्वी पर लौटकर समाचार देना—इन सब घटनाओं को महर्षि वाल्मीकि ने अपने दिव्य काव्य में अमर कर दिया। ऐसी है वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण की कथा, जो युगों-युगों तक लोक में गूंजती रहेगी।