अब मैं आपको वाल्मीकि रामायण के सुंदरकाण्ड के बारहवें और तेरहवें सर्ग की कथा एक सूत्र में सुनाता हूँ। हनुमान जी रावण के भव्य महल के बीच खड़े थे। वे लताओं से सजे कक्षों, चित्रित शयनगृहों और रात के विश्राम स्थलों में बड़ी उत्सुकता से सीता जी की खोज करते रहे, परन्तु सुंदर रूपवाली सीता कहीं भी दिखाई नहीं दीं। जब उन्होंने चारों ओर खोजा और जानकी जी का कोई पता नहीं चला, तो हनुमान जी के मन में विचार आया कि निश्चय ही सीता जी यहाँ नहीं हैं। उन्होंने सोचा—सीता, जो अपनी मर्यादा की रक्षा में अडिग थीं, कहीं रावण जैसे दुष्ट राक्षस द्वारा मार तो नहीं दी गईं? या फिर रावण की उन विकराल, विकृत और भयंकर रूपवाली राक्षस स्त्रियों को देखकर भयभीत होकर ही जनकनंदिनी का प्राणांत हो गया होगा। हनुमान जी सोचने लगे—मैंने सीता को नहीं पाया, अपना कर्तव्य भी पूरा नहीं कर सका, और वानरों के साथ जो समय बिताया, वह भी व्यर्थ गया। अब मैं सुग्रीव के पास कैसे लौटूंगा? वानरराज सुग्रीव तो अत्यंत कठोर और शक्तिशाली हैं। मैंने रावण के महल का कोना-कोना और उसकी पत्नियों को देख लिया, किंतु धर्मपरायण सीता कहीं नहीं दिखीं। मेरा सारा प्रयास व्यर्थ हो गया। वे सोचने लगे—जब मैं वापस जाऊंगा, तो सारे वानर क्या कहेंगे? वे पूछेंगे—'वहाँ जाकर तुमने क्या किया?' मैं जनकनंदिनी को देखे बिना उनसे क्या कहूंगा? निश्चय ही, समय बीतने पर मैं उपवास करके प्राण त्याग दूंगा। जाम्बवान, अंगद और अन्य वानर जब पूछेंगे कि समुद्र पार करके लौटने के बाद क्या हुआ, तो मैं क्या उत्तर दूंगा? परंतु हनुमान जी ने अपने मन को संभाला—'परिश्रम ही संपन्नता की जड़ है, वही परम आनंद है। मैं फिर से उन स्थानों में खोज करूंगा, जहाँ अभी तक नहीं देखा है।' उन्होंने निश्चय किया—'परिश्रम से ही हर कार्य में सफलता मिलती है, वही पुरुषार्थ को फलित करता है।' इसके बाद हनुमान जी ने फिर से खोज आरंभ की। उन्होंने भव्य मदिरागृह, पुष्पगृह, सुसज्जित कक्ष और रमणीय क्रीड़ागृह देखे। उन्होंने भीतरी आंगन, तंग गलियाँ और सभी महलों को ध्यान से देखा और मन ही मन विचार करते हुए पुनः खोज शुरू की। वे कभी धरातल पर बने घरों में, कभी देवालयों में, कभी बाहरी भवनों में गए—कभी उड़ते, कभी उतरते, कभी रुकते, कभी चलते। उन्होंने द्वार खोले, झरोखे हटाए, भीतर-बाहर गए, कभी गिर पड़े, कभी उड़ते हुए छलांग लगाई। हनुमान जी ने रावण के महल का एक-एक कोना छान मारा—चार अंगुल भी ऐसा स्थान नहीं बचा, जहाँ वे न पहुँचे हों। उन्होंने आंगन, गलियारे, ऊँचे मंच, देवालय, कुएँ, और कमल से भरे सरोवर सब देख डाले। वहाँ उन्हें अनेक प्रकार की विकृत, भयंकर राक्षसी स्त्रियाँ दिखीं, परंतु जनकनंदिनी कहीं नहीं दिखीं। उन्हें संसार की अनुपम सुंदर स्त्रियाँ भी दिखीं, जो अप्सराओं से भी श्रेष्ठ थीं, पर राम की प्रिय सीता नहीं मिलीं। उन्होंने सुंदर कटि वाली, पूर्णिमा के चंद्रमा के समान मुख वाली नागकन्याएँ भी देखीं, परंतु सीता नहीं दिखीं। रावण द्वारा बलात् लाई गई नागकन्याएँ भी दिखीं, लेकिन जनकनंदिनी का कोई पता नहीं चला। हनुमान जी, जो वायुपुत्र और महाबली हैं, ने उन उत्तम स्त्रियों को देखा, परंतु सीता जी को न पाकर वे अत्यंत निराश हो गए। वानर प्रमुखों के प्रयास और समुद्र पार करने के अपने परिश्रम को व्यर्थ जानकर वे फिर से गहन चिंता में डूब गए। महल से नीचे उतरकर, वायुपुत्र हनुमान शोक में डूबे, गहरे विचार में मग्न हो गए। अब सुंदरकाण्ड का तेरहवाँ सर्ग आरंभ होता है। हनुमान जी, जो वानरों के तेजस्वी नेता हैं, महल से प्राचीर पर कूद पड़े, जैसे बादलों में बिजली चमकती हो। रावण के निवास स्थानों में सीता को ढूँढ़ने के बाद भी जब वे उन्हें न देख सके, तो बोले—'मैंने लंका का कोना-कोना छान मारा, राम की प्रिय सीता को खोजा, फिर भी वह अंग-अंग से शोभायमान वैदेही मुझे नहीं दिखीं।' उन्होंने सोचा—'झील, तालाब, पोखर, नदियाँ, नाले, दलदली उपवन, पर्वतीय गढ़—सारी पृथ्वी छान डाली, फिर भी जानकी नहीं मिली। यहाँ गृध्रराज सम्पाती ने कहा था कि सीता रावण के निवास में है, परंतु वह दिखाई नहीं देती—ऐसा क्यों?' हनुमान जी के मन में संशय उठा—'कहीं ऐसा तो नहीं कि जनकनंदिनी सीता, जो रावण द्वारा बलात् लायी गई थीं और असहाय थीं, अब इस संसार में नहीं रहीं? शायद जब रावण ने उन्हें झपट्टा मारकर उठाया, और वे राम के बाणों से भयभीत थीं, तो बीच में ही वे गिर पड़ी हों। या फिर, सिद्धों के मार्ग में ले जाते समय, समुद्र को देखकर उनका हृदय डर गया हो और वे गिर पड़ी हों। अथवा रावण की भुजाओं के प्रचंड बल से दबकर, बड़ी नेत्रों वाली वह कुलीन स्त्री प्राण छोड़ चुकी हों। निश्चय ही, जब रावण उन्हें समुद्र के ऊपर से ले जा रहा था, तो संघर्ष करती हुई सीता समुद्र में गिर गई होंगी।' वे सोचने लगे—'या फिर, इस नीच रावण ने, जो धर्मनिष्ठ सीता की रक्षा करनेवाला कोई नहीं था, उसे खा ही लिया होगा। या रावण की काली नेत्रों वाली, दुष्ट प्रवृत्ति वाली पत्नियों ने, जो स्वयं भी पापी हैं, उस निर्दोष सीता को खा लिया होगा।' हनुमान जी के मन में यह भी आया—'शायद, मिथिलावासिनी वैदेही 'हे राम! हे लक्ष्मण! हे अयोध्या!' कहती हुई, अनेक प्रकार से विलाप करती हुई, अपने प्राण त्याग चुकी हैं। या फिर, वह कहीं रावण के निवास में बंदी बना दी गई हैं, और अत्यंत दुःखी होकर पिंजरे में बंद मैना की तरह विलाप कर रही हैं।' इस प्रकार हनुमान जी ने सीता माता की खोज में अथक प्रयास किया, किंतु उन्हें अभी तक सफलता नहीं मिली थी। वे गहरे शोक और चिंता में डूबे, अगला उपाय सोचने लगे।